बाढ़ में तैरते सवाल

पर्यावरण और मौसम विषेशज्ञों की सलाह और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञों के सुझाव पर केंद्र और राज्य सरकारों ने बाढ़ की विकट समस्या के समाधान के लिए कोई इच्छाशक्ति दिखाई हो, ऐसा देखने को मिलता नहीं है।

पर्यावरण में परिवर्तन होना चिंता की बात। फाइल फोटो।

अखिलेश आर्येंदु

पर्यावरण और मौसम विषेशज्ञों की सलाह और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञों के सुझाव पर केंद्र और राज्य सरकारों ने बाढ़ की विकट समस्या के समाधान के लिए कोई इच्छाशक्ति दिखाई हो, ऐसा देखने को मिलता नहीं है। इस बार भी देश के तमाम इलाकों में बारिश के कारण तबाही का मंजर देखने को मिला। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बादल फटने, पहाड़ों के टूट कर गिरने और जमीन धंसकने जैसी घटनाओं में जान-माल का खासा नुकसान हुआ। उधर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, असम जैसे राज्यों में भी बरसात के तेवर चौंकाने वाले रहे।

राजस्थान के कोटा, बारां, जोधपुर सहित बारह जिलों में पंद्रह दिन तक बारिश होती रही। इससे खरीफ की फसल तबाह हो गई। इस साल देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश जैसी तबाही मचा रही है, उससे तो लगता है कि अब बरसात से पैदा होने वाले हालात कई मामलों में पहले के मुकाबले काफी बदल चुके हैं।

समझने वाली बात यह है कि पर्वतीय राज्यों में बाढ़ ने जिस तरह से कहर ढाया और देखते ही देखते हजारों लोगों व लाखों जीव-जंतुओं को अपनी चपेट में ले लिया, उससे अब बदलते ऋतु चक्र से डर लगने लगा है। हिमाचल में भूस्खलन व बादल फटने की घटनाएं सामने आईं। लेकिन इस बार बादल फटने की सबसे ज्यादा घटनाएं उस उत्तरांचल में हुईं जहां पहले कभी-कभार ही ऐसा होता था। पूर्व में ऐसी घटनाएं लोगों में दहशत पैदा नहीं करती थीं, जिससे लोगों को अपने पुश्तैनी घर छोड़ कर सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन को मजबूर होना पड़े। इसी तरह मानसून के बाद उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बाढ़ का खतरा पैदा हो गया और अब तक बाढ़, बिजली गिरने और बरसात के कारण हुए हादसों में कई लोग अपनी प्राण गवां चुके हैं।

सवाल है कि क्या इन प्राकृतिक हादसों को जलवायु परिवर्तन का नतीजा मान कर बैठ जाएं या फिर इनका मुकाबला करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाएं? जिस महाराष्ट्र के ज्यादातर इलाकों में पिछले कई सालों से जहां अकाल की स्थिति बनी हुई थी, वहां बरसात ने रिकार्ड तोड़ दिए। कुछ ऐसी ही स्थिति मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार और असम की बन गई है। बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और कमोवेश मध्यप्रदेश में बाढ़ हर साल लाखों लोगों को उजाड़ देती है। बड़े पैमाने पर जन और धन की हानि होती है।

हर साल जैसे ही मानसून आता है, निचले इलाकों में पानी भरने लगता है। सरकारी खजाने से राहत के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। यह आवंटित राशि बाढ़ में कहां बह जाती है, कोई पूछने वाला नहीं होता है। हर साल यह कहा जाता है कि बाढ़ का स्थायी समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन इसे कभी भी अमल में नहीं लाया जाता है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल का अभाव होने की वजह से बाढ़ की समस्या बढ़ती जाती है। उसी अनुपात में ‘राहत धनराशि’ भी बढ़ती जाती है। लेकिन जन-धन की हानि बड़े पैमाने पर होने के बावजूद सरकारी समाधान उसी परंपरा में ही किया जाता है, जिससे इस समस्या का कोई स्थायी समाधान न निकल सके। ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि सरकारें देश के बाढ़ प्रबंध विषेशज्ञों की राय को अमल में लाकर इसका स्थायी समाधान करने की बात तो करती हैं, लेकिन उनके सुझावों पर कभी अमल करती नहीं दिखतीं। इसी का नतीजा है कि हर साल बाढ़ आती है और फिर वही हायतौबा मचती है।

भारत में बाढ़ की समस्या कोई नई नहीं है। आजादी के बाद से लेकर अब तक न जाने कितनी बार इसके स्थायी समाधान के लिए सुझाव आए, लेकिन आज तक कुछ छोटे-मोटे राज्यों को छोड़ कर देश के किसी राज्य में बाढ़ के संकट से निपटने के लिए कोई ढांचा तैयार नहीं किया जा सका है। पर्यावरण विषेशज्ञों और मौसम विषेशज्ञों की सलाह और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञों के सुझाव पर केंद्र और राज्य सरकारों ने बाढ़ की विकट समस्या के समाधान के लिए कोई इच्छाशक्ति दिखाई हो, ऐसा देखने को मिलता नहीं है। जब तक बरसात होती रहती है और बाढ़ का खतरा मौजूद रहता है, तब तक बाढ़ से निपटने के लिए बड़े-बड़े फामूर्लों पर अमल की प्रक्रिया दिखाने के लिए चलती रहती है। लेकिन जैसे ही बाढ़ का खुमार उतरा और मानसून जाने को होता है, बाढ़ की समस्या को सिरे से भुला दिया जाता है।

बाढ़ से जन-धन की होने वाली हानि को लेकर यों तो सरकारी आंकड़े आते ही हैं। पर हकीकत में हानि का दायरा काफी ज्यादा होता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आजादी के बाद 1951 में एक करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित हुई थी। अगले दस साल यानी 1960 में यह आंकड़ा बढ़ कर लगभग ढाई करोड़ हेक्टेयर हो गया। यह सिलसिला यहीं नहीं थमा और 1978 में यह आंकड़ा बढ़ता हुआ साढे़ तीन करोड़ हेक्टेयर हो गया। 1980 के बाद तो इसमें लगातार वृद्धि होती रही और मौजूदा वक्त में यह आंकड़ा चार करोड़ हेक्टेयर के पार निकल गया है। बिहार में सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं। आंकड़ों के मुताबिक राज्य का 73.06 फीसद इलाका बाढ़ प्रभावित है।

ये आंकड़े बताते हैं कि बाढ़ की ताबाही से निजात पाने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर किसी तरह के ठोस प्रयास नहीं किए गए। वैज्ञानिकों के मुताबिक विकास के नए-नए और अव्यावहारिक मॉडल अपनाने और प्रकृति के बेइंतहा दोहन की वजह से पारिस्थितिकीय संतुलन गड़बड़ाने लगा है। इससे धरती का तापमान बढ़ रहा है। जहरीली गैसों, वृक्षों की कटाई, बड़े-बड़े बांधों के निर्माण, नदियों की अविरल धारा को रोकने और नदियों के किनारे बड़े-बड़े निर्माण की वजह से पर्यावरण पर काफी बुरा असर पड़ा है।

इसके अलावा हर साल लाखों टन मिट्टी और कचरा नदियों में डालने की वजह से नदियों में गाद बढ़ती जा रही है। इससे नदियों के प्रवाह अवरुद्ध हो रहा है। जो नदियां गहरी थीं वे उथली होती जा रही हैं। पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड, हिमाचल और असम की नदियों में तबाही मचाने वाले जो विध्वंसकारी तेवर देखने को मिले हैं उनके पीछे यही कारण हैं। पहाड़ी राज्यों में जो बरसात होती है, उससे पहाड़ों का कटाव होता है। बादल फटने से यह स्थिति और भंयकर हो जाती है। ऊपर से पहाड़ों का मलबा इतना अधिक गिरता है कि गांव के गांव उसमें समा जाते हैं।

देश की बड़ी नदियों ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, महानंदा, गंडक, कमला और कोसी हर साल तबाही का कारण बनती हैं। इसके अलावा छोटी-छोटी आंचलिक नदियां भी गाद के कारण अधिक वर्षा होने पर तबाही मचाने लगती हैं। बाढ़ आने पर बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और उत्तरांलच में बड़ी संख्या में गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। उस हालत में यहां के लाखों लोग पलायन कर जाते हैं।

इनके सामने पुनर्वास और आजीविका की गंभीर समस्या होती है। उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, असम सहित दूसरे राज्यों में नदियों पर बड़े पैमाने पर बांध बनाए जा रहे हैं। जब मूसलाधार बारिश होती है और पानी अपने पूरे वेग से आगे बढ़ता है तो बांधों के फाटक खोल दिए जाते हैं और अचानक से छोड़ा गया पानी गांवों को अपने में समा लेता है। लाखों हेक्टेयर भूमि की फसल पूरी तरह नष्ट हो जाती है। केरल इसका उदाहरण रहा है। बाढ़ महज अधिक बरसात के कारण नहीं, बल्कि कुप्रबंधन, अधिक खनन और वनों की कटाई के कारण आती है। इसलिए जब तक ये कारण मौजूद रहेंगे, तब तक बाढ़ की विभीषिका से छुटकारा नहीं पाया जा सकता।

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