सवाल चुनावी खर्च का

भारत के लोकतंत्र को धन-बल के प्रभाव से कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

सांकेतिक फोटो।

शिवेंद्र राणा

भारत के लोकतंत्र को धन-बल के प्रभाव से कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसका सबसे बुरा और परोक्ष प्रभाव है भ्रष्टाचार में वृद्धि या कहें कि भ्रष्टाचार को अघोषित मान्यता मिलना। करोड़ों खर्च कर चुनाव जीतने वाले जनसेवा के भाव से तो आते नहीं हैं। उनका प्राथमिक मकसद होता है अपने खर्च हुए रुपए बटोरना और अगले चुनाव की लागत वसूलना।

चुनावी खर्च एक ऐसा मुद्दा है जिसमें निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दल और भारत सरकार तीनों के ही अपने-अपने दृष्टिकोण हैं। सैद्धांतिक रूप से यह माना गया है कि चुनाव में भागीदारी करने या निर्वाचित होने का अधिकार देश के हर नागरिक को है। इसलिए सबको एक समान अवसर प्रदान करने के लिहाज से चुनाव संहिता के तहत उम्मीदवारों के खर्च की सीमा निर्धारित की गई थी, ताकि ऐसा न हो कि आर्थिक ताकत के बूते धनाढ्य वर्ग चुनाव जीत जाए और अपेक्षाकृत गरीब या सामान्य तबके का व्यक्ति इसमें पिछड़ जाए।

केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय ने निर्वाचन नियम-1961 के प्रावधान-90 में संशोधन करते हुए चुनाव खर्च सीमा में दस फीसद इजाफा करने का फैसला किया है। इसके पीछे कोरोना महामारी को कारण बताया गया है। इसके अनुसार लोकसभा चुनाव के लिए अब खर्च की अधिकतम सीमा सत्तर लाख से बढ़ा कर सतहत्तर लाख और विधानसभा चुनाव के लिए अट्ठाईस लाख से बढ़ा कर इकतीस लाख पचहत्तर हजार रुपए की जा सकती है। इससे पहले फरवरी 2014 में चुनाव खर्च सीमा बढ़ाई गई थी। चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाने के फैसले पर अमल के लिए निर्वाचन आयोग ने कमेटी बनाई है।

निर्वाचन आयोग ने चुनाव खर्च सीमा का अनुपालन कराने के लिए कई उपाय कर रखे हैं, जैसे कि खर्च की स्वीकार्य लागत को तय करना, खर्च पर निगरानी के लिए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति करना, उम्मीदवार के खर्च संबंधी रजिस्टर की जांच और पर्यवेक्षकों के आकलन से उनकी तुलना, यहां तक कि उम्मीदवारों के प्रमुख चुनावी कार्यक्रमों की वीडियोग्राफी करवाना आदि। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन सारे उपायों के बावजूद चुनावों में धन के बढ़ते इस्तेमाल को रोकने या खर्च की असलियत का पता लगाने में कोई विशेष सफलता नहीं मिली है।

जैसे-जैसे धन खर्च के नियमन का प्रयास हुआ, वैसे-वैसे इन नियमों को अप्रभावी बनाने के लिए नए-नए तरीके भी खोज लिए गए। इसके लिए राजनीतिक दलों का आपसी सामंजस्य, पार्टियों का इस मुद्दे पर सुविधापूर्ण विरोध, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के साथ ही प्रशासनिक शिथिलता भी दोषी है। राजनीतिक दलों का तर्क होता है कि चुनावी खर्च की अब तक निर्धारित सीमा अव्यावहारिक है। उम्मीदवारों पर तय सीमा से अधिक खर्च करने के मामले में उनका तर्क होता है कि यदि चुनावी खर्च की सीमा को बढ़ा दिया जाए तो उम्मीदवारों को अपने हलफनामे में झूठ नहीं बोलना पड़ेगा।

इसके बावजूद यथार्थ कुछ अलग है। आजादी के बाद भारत के लोकतंत्र पर धन का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। लोकतंत्र पर धन के प्रभाव को देखना हो तो कुछ आंकड़ों पर गौर करना होगा। देश के पहले तीन लोकसभा चुनावों में सरकारी खर्च प्रति वर्ष लगभग दस करोड़ रुपए था। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में यह एक हजार चार सौ तिरासी करोड़ था, जो वर्ष 2014 में बढ़ कर ढाई गुने से ज्यादा यानी तीन हजार आठ सौ सत्तर करोड़ रुपए हो गया। एक करोड़ से अधिक की संपत्ति वाले सांसदों का प्रतिशत सन 2009 में अट्ठावन फीसद, 2014 में बयासी फीसद और 2019 में बढ़ कर अट्ठासी फीसद हो गया।

एक अन्य आंकड़े के अनुसार दुबारा निर्वाचित (2019) सांसदों की संपत्ति में उनतीस फीसद की औसतन वृद्धि हुई है। वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव में खर्च की सीमा पच्चीस लाख रुपए, 2011 में चालीस लाख रुपए और 2014 में सत्तर लाख रुपए कर दी गई थी। इन आंकड़ों से प्रतीत होता है कि अगर कोई सामान्य या निम्न आर्थिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति जन सेवा के लिए राजनीति को माध्यम बनाना चाहे तो उसके निर्वाचित होने के आसार दुर्लभ हैं।

दरअसल, राजनीतिक दलों के कोष एवं उनके वित्तीय स्रोतों के नियमन को लेकर कभी भी गंभीर प्रयास नहीं किए गए। अगर हुए भी हैं तो उन्हें पूर्ण रूप से या तो परिभाषित नहीं किया गया या उनमें ऐसी खामियां छोड़ दी गर्इं कि जिनका प्रयोग राजनीतिकों द्वारा आसानी से अपने अनुकूल किया जा सके। जैसे बीस हजार रुपए से अधिक के दान का विवरण देने के कानून से बचने के राजनीतिक दलों द्वारा अपने नब्बे फीसद तक के चंदे को इस निर्धारित सीमा के भीतर बताया जाता रहा।

वर्ष 2003 में संसद द्वारा यह उपबंध किया गया था कि किसी प्रत्याशी के पक्ष में यदि कोई बड़ा नेता उस निर्वाचन क्षेत्र का दौरा करता है तो उसे उस प्रत्याशी के निर्वाचन खर्च में नहीं जोड़ा जाएगा। इसके अलावा प्रत्याशी के अतिरिक्त उसके मित्रों, परिजनों, किसी निजी संस्था या निगम द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देकर अथवा किसी अन्य माध्यम से किए जाने वाले खर्च को प्रत्याशी के चुनावी खर्च में जोड़ा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले के अंतर्गत राजनीतिक दलों द्वारा किए गए खर्च को चुनावी खर्च में शामिल करने का आदेश दिया था। किंतु यहां भी सरकार ने अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग कर इस निर्णय को पलट दिया।

वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने चुनावी बांड योजना की अधिसूचना जारी की थी। इसे राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले नगद दान के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्ष 2018 के बजट में राजनीतिक दलों को विदेशी स्रोतों से चंदा /अंशदान प्राप्त करने की अनुमति दी गई थी। उसी अनुरूप विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन कर दिया गया। इस संशोधन के तहत विदेशी कंपनी की परिभाषा को संशोधित कर दिया गया है। इसके माध्यम से कंपनियों के लिए राजनीतिक चंदे पर लगी अधिकतम सीमा हटा ली गई। इससे पूर्व कंपनियां अपने तीन साल के शुद्ध लाभ का अधिकतम साढ़े सात फीसद हिस्सा ही राजनीतिक चंदे के तौर पर दे सकती थीं। साथ ही, उन्हें यह बताने की शर्त से भी छूट मिल गई कि उन्होंने किस दल को कितना चंदा दिया है।

भारत के लोकतंत्र को धन-बल के प्रभाव से कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसका सबसे बुरा और परोक्ष प्रभाव है भ्रष्टाचार में वृद्धि या कहें कि भ्रष्टाचार को अघोषित मान्यता मिलना। करोड़ों खर्च कर चुनाव जीतने वाले जनसेवा के भाव से तो आते नहीं हैं। उनका प्राथमिक मकसद होता है अपने खर्च हुए रुपए बटोरना और अगले चुनाव की लागत वसूलना। दूसरा नुकसान यह है कि अपराधियों को भी इससे प्रोत्साहन मिलता है। राजनीति के माध्यम से असमाजिक तत्व और अपराधी ‘माननीय’ बन जाते हैं जिससे उन्हें कानून और प्रशासन से प्राथमिकता मिल जाती है और इसका प्रभाव वे अपना वर्चस्व बढ़ाने में करते हैं। वर्ष 2009 के चुनाव में आपराधिक मामलों के आरोपी उनतीस फीसद उम्मीदवार विजयी रहे। 2014 में यह आंकड़ा चौंतीस फीसद था और 2019 में बढ़ कर तियालीस फीसद हो गया था।

पिछले दो-तीन दशकों से भारतीय चुनावी परिदृश्य में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले और अच्छी आर्थिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के निर्वाचित होने का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। इन दोनों तथ्यों के बीच एक प्रकार संबंध प्रतीत होता है और यह गंभीर चिंता का विषय है। इसके लिए सबसे बड़ा दोष राजनीतिक दलों का है, क्योंकि जब तक वे आर्थिक सक्षमता एवं बाहुबल के प्रभाव के बजाय व्यक्ति की योग्यता को प्रत्याशी बनने के लिए अधिमान नहीं देंगे, तब तक ये परिस्थितियां यथावत बनी रहेंगी।

कंवरलाल गुप्ता बनाम अमरनाथ चावला (1974) मामले में उच्चतम न्यायालय ने उम्मीद व्यक्त कि थी कि कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक दल चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उसे यह छूट होनी चाहिए कि वह किसी अन्य व्यक्ति या राजनीतिक दल के साथ समानता के आधार पर चुनाव लड़ सके, चाहे वह कितना भी समृद्ध हो। किसी भी व्यक्तिया राजनीतिक दल को उसकी बेहतर वित्तीय स्थिति के कारण दूसरों से अधिक लाभ नहीं मिलना चाहिए।’ हालांकि वर्तमान में यह उम्मीद पूरी होती तो नहीं दिखती।

पढें राजनीति समाचार (Politics News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट