सवाल हिंदी के हक का

हिंदी कागजों में भले ही राजभाषा बन गई हो, पर हमारी आत्महीनता की वजह से आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी यह अपने अधिकार से महरूम है।

सांकेतिक फोटो।

साकेत सहाय

हिंदी कागजों में भले ही राजभाषा बन गई हो, पर हमारी आत्महीनता की वजह से आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी यह अपने अधिकार से महरूम है। यह सिद्ध सत्य है कि कोई भी भाषा अपने मूल स्वरूप में कभी भी हीन नहीं होती। परंतु सरकार की नीतियों के तहत हिंदी सहित भारत की सभी भाषाएं व्यावहारिक तौर पर हीन होती चली गर्इं, बल्कि सच कहें तो जानबूझ कर बना दी गर्इं।

हिंदी दिवस के साथ ही सरकारी और निजी कार्यालयों में हिंदी पखवाड़ा, हिंदी माह जैसे आयोजन शुरू हो गए हैं। फिर से वही वादे, वही अंदाज, पर आगे फिर से वही अंग्रेजी का राज। इसे देख मन में यह टीस पैदा होना स्वाभाविक ही है कि आखिर कब तक हिंदी को बढ़ावा देने के ऐसे कागजी और दिखावटी प्रयास चलते रहेंगे। आयोजन करना या उत्सव मनाना गलत नहीं है। भारत तो देश ही उत्सवों और आयोजनों का है।

फिर हमें राष्ट्रभाषा, राजभाषा के उत्सव से परहेज-खीज क्यों? पर पीड़ादायक तो यह है कि आजादी के अमृत वर्ष में भी भारत की राजभाषा की बुनियादी स्थिति बहुत हद तक संक्रमण की बनी हुई है। यह दुर्भाग्य ही है कि हिंदी के मामले में भारत की पूरी व्यवस्था संतुलित और प्रगामी सोच के अभाव में काम करती आई है। यह भी स्थापित सत्य है कि भाषा का मामला मात्र भावुकता का नहीं, बल्कि ठोस यथार्थ का है। पर हिंदी के मामले में आज भी हम सभी भावुक होकर काम करते हैं। इसका नतीजा यह है कि यथार्थ में राज व्यवस्था पर अंग्रेजी का राज ही कायम है। सबसे दुखद स्थिति यह है कि जिस हिंदी ने अपने ठोस सामाजिक एवं राजनीतिक यथार्थ के बल पर पूरे देश में स्वीकार्यता हासिल की थी, उसे व्यवस्था के घालमेल ने पीछे धकेल दिया।

भारत की भाषाई विडंबना यह है कि हम एक विदेशी भाषा के कुचक्र से अपने को निकाल पाने में दीर्घ काल से असफल ही रहे हैं। दोष किसी एक को देने से क्या होगा? क्योंकि इस कुचक्र को बनाए रखने में समाज और व्यवस्था की भूमिका ही रही है। हिंदी कागजों में भले ही राजभाषा बन गई हो, पर हमारी आत्महीनता की वजह से आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी यह अपने अधिकार से महरूम है।

यह सिद्ध सत्य है कि कोई भी भाषा अपने मूल स्वरूप में कभी भी हीन नहीं होती। परंतु सरकार की नीतियों के तहत हिंदी सहित भारत की सभी भाषाएं व्यावहारिक तौर पर हीन होती चली गईं, बल्कि सच कहें तो जानबूझ कर बना दी गईं। और एक पूरी प्रक्रिया के तहत अंग्रेजी को बतौर श्रेष्ठ भाषा के रूप में स्थापित कर दिया गया। चूंकि यह व्यवस्था एक खास वर्ग के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हुई है, इसलिए इसे बनाए रखने के लिए सभी प्रकार की नीतियां अपनाई गईं। क्या यह देश का दुर्भाग्य नहीं है कि आज भी उच्चतम न्यायालय और देश के चौबीस में से बीस उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं का प्रयोग कोसों दूर है?

भारत में हिंदी अथवा दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा का यह द्वंद्व बहुत हद तक भावुकता बनाम यथार्थ का ही है। अर्थात यह कि भावुकता में हम भले ही कह लें कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं किसी भी मामले में अंग्रेजी से कमतर नहीं है, पर दुखद सच्चाई यही है कि हमने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की ऐसी स्थिति खुद ही बनाई है। एक विदेशी भाषा के प्रति यह अंतहीन प्रेम एवं हीनता-बोध की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है कि तमाम दुश्वारियों के बीच यदि अधिकारी से लेकर क्लर्क और कार्यालय सेवक तक अपना पेट काट कर बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजना चाहते हैं और भेज भी रहे है तो इसके गहरे अर्थ हैं।

समय-समय पर प्रकाशित संचार माध्यमों की रिपोर्टों से यह भी स्पष्ट है कि देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। भले ही हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में पढ़ने वालों की कुल संख्या अब भी बहुत अधिक है। लेकिन यह भी दुर्भाग्य की बात है कि सफल और संपन्न वर्ग के ऐसे व्यक्ति विरले ही होंगे जो अपने बच्चों की पढ़ाई स्वेच्छा से अंग्रेजी माध्यम में नहीं करवा रहे हैं। यह भी सत्य है कि जैसे-जैसे मध्य वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ेगी, हिंदी या भारतीय भाषाओं की स्थिति में कमी ही दर्ज की जाएगी। क्योंकि माहौल भी यही है।

ऐसे में नई शिक्षा नीति आशा की किरण जगाती है, पर तब जब व्यवस्था और लोग में भाषिक आत्मविश्वास का संचार होगा। तभी लोग और व्यवस्था हिंदी को तरजीह देंगे। अब समय आ गया है जब सरकार को कोरी भावुकता से ऊपर उठ कर हिंदी एवं भारतीय भाषाओं को उनका उचित अधिकार दिलाने के लिए कदम उठाना होगा। सरकारों को भी यह समझना होगा कि भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन मात्र नहीं है। यह एक जीवन व्यवस्था भी है और जब तक उस जीवन व्यवस्था पर निर्णायक प्रहार नहीं किया जाएगा, जिसमें अंग्रेजी को फूलने-फलने का खतरनाक अवसर मिल रहा है, तब तक हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के बलवती होने की आशा दिवा-स्वप्न मात्र है।

यह हिंदी की सामर्थ्य ही है कि इसने अर्थ जगत के बदलते स्वरूप के अनुसार स्वयं को ढाल लिया है। आज हिंदी का अपना व्यावसायिक मूल्य है, इसलिए कारोबार, मनोरंजन, परस्पर संवाद और संचार जगत में हिंदी ने अंग्रेजी को चुनौती दी है। पिछले कुछ वर्षों में हिंदी भाषा की शब्द संपदा का जितना विस्तार हुआ है, उतना विश्व की शायद ही किसी भाषा का हुआ हो। आज इंटरनेट पर हिंदी की पर्याप्त उपस्थिति है।

गूगल ने हिंदी की ताकत को पहचान कर इसे तकनीकी क्षेत्र में सशक्त भाषा के रूप में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। आज हिंदी विश्व की समृद्ध भाषाओं में गिनी जाती है। अंग्रेजी जिसे महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय भाषा होने का गौरव प्राप्त है, उसके मूल में कुल शब्द जहां मात्र दस हजार हैं, वहीं हिंदी के पास संस्कृत एवं देश की समरूपी भाषाओं की कुल ताकत से दस लाख से भी अधिक शब्द संख्या की ताकत है। संख्या बल के आधार पर आज हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा होने का हक मांग रही है। पर इसके पहले यह जरूरी है कि हिंदी को उसके घर मेँ उसका वास्तविक हक मिले।

नवोन्मेषी सोच में भी हिंदी व भारतीय भाषाओं की भूमिका कम नहीं है। यह चिंता का विषय है कि तकनीक के क्षेत्र में हिंदी और भारतीय भाषाएं जुगाड़ के स्तर तक ही उपलब्ध हैं। ऐसे में डिजिटल क्रांति की सार्थकता पर भी प्रश्न चिह्न खड़े हो जाते हैं। हिंदी की भूमिका की संवृद्धि के लिए यह जरूरी है कि भारत में इसे ज्ञान-विज्ञान में शिक्षण और संप्रेषण के रूप में विकसित होने वाली भाषा के रूप में स्थापित किया जाए। इसके लिए विश्वविद्यालयों को बीड़ा उठाना होगा। आज भारत में उच्च शिक्षा में हिंदी अल्पांश रूप में ही उपस्थित है। इस स्थिति को बदलने के लिए सभी को समवेत होकर कार्य करना होगा।

आजादी के अमृत वर्ष में यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि आत्मनिर्भरता एवं सांविधानिक हितों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी व औद्योगिक व्यवस्था से जोड़ना ही एकमात्र विकल्प है। इस दिशा में हिंदी भाषी राज्यों के साथ ही देश के सभी राज्यों को पहल करनी होगी। अन्यथा वही ढाक के तीन पात। हिंदी को लागू करने के लिए सबसे बड़ी जरूरत है सामाजिक व्यवस्था को बदलने की। यह तथ्य है कि हिंदी की जमीन सामान्य जन से जुड़ी है, तो अंग्रेजी का संबंध भारत में शोषण और संग्रह की प्रक्रिया से है। इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से शामिल हुए बगैर संपन्नता की सीढ़ियां कभी नहीं चढ़ी जा सकतीं।

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