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सफेद हाथी या विकास के सारथी

क्या देश को सार्वजिनक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) की जरूरत है? क्या ये सफेद हाथी साबित हो रहे हैं? क्या इनकी देश को जरूरत नहीं है? मांग उठती है कि इन्हें निजी हाथों में सौंप दिया जाना चाहिए...

Author नई दिल्ली | December 24, 2015 12:04 AM
सेल

क्या देश को सार्वजिनक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) की जरूरत है? क्या ये सफेद हाथी साबित हो रहे हैं? क्या इनकी देश को जरूरत नहीं है? मांग उठती है कि इन्हें निजी हाथों में सौंप दिया जाना चाहिए। लेकिन इनकी निंदा करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इनमें से कई पीएसयू ने अपनी स्थापना के बाद से ही बेहतर प्रदर्शन करके देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है। इनमें कोल इंडिया, एनटीपीसी, बीएचइएल, ओएनजीसी, इंडियन आयल वगैरह शामिल हैं।

पहली पंचवर्षीय योजना के साथ केंद्र और राज्यों के पीएसयू स्थापित करने की आवश्यकता महसूस की गई थी। ये विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं। इन्होंने देश में आधारभूत ढांचा खड़ा करने में शानदार योगदान दिया है। केंद्र के कई पीएसयू तो अपने-अपने क्षेत्रों में दुनिया में बड़े खिलाड़ी के रूप में पहचान बना चुके हैं। इन्हें महारत्न कंपनियों का दर्जा मिल चुका है।

दरअसल, भारत सरकार द्वारा नियंत्रित और संचालित उद्यमों और उपक्रमों को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या पीएसयू कहा जाता है। केंद्र या किसी राज्य सरकार के आधिपत्य वाले सार्वजनिक उपक्रम में सरकारी पूंजी की हिस्सेदारी इक्यावन प्रतिशत या इससे अधिक होती है।

जब से सरकार ने पीएसयू बोर्ड को अपने फैसले खुद लेने के अधिकार दिए हैं तब से इनके मुनाफे और कामकाज में गुणात्मक सुधार हो रहा है। राजग सरकार बनने के बाद एक तरह से सभी पीएसयू बोर्ड अपनी योजनाओं को लेकर फैसले करने को स्वतंत्र हैं। इसका ताजा उदाहरण है महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल)। यह लंबे समय से घाटे में चल रहा था। लेकिन, अब इसने टेलीकॉम सेक्टर की कड़ी प्रतिस्पर्धा में अपने लिए जगह बनानी शुरू कर दी है। हालांकि इसे भारती एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया जैसी निजी क्षेत्र की नामवर कंपनियों से कड़ी चुनौती मिल रही है। भारत में 1951 में मात्र पांच पीएसयू थे। अब इनकी तादाद लगभग ढाई सौ हो चुकी है। पीएसयू के सफर को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला, स्वतंत्रता से पूर्व। दूसरा, स्वतंत्रता के बाद। तीसरा, आर्थिक उदारीकरण के बाद।

आजादी के पहले देश आय में असमानता और रोजगार के निम्न स्तर, आर्थिक विकास और प्रशिक्षित जनशक्ति, कमजोर औद्योगिक आधार, अपर्याप्त निवेश और बुनियादी सुविधाओं आदि के अभाव में क्षेत्रीय असंतुलन जैसी गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा था। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र का खाका आत्मनिर्भर आर्थिक विकास के लिए एक साधन के रूप में विकसित किया गया था। शुरुआती दौर में पीएसयू कुछ खास और सामरिक उद्योगों तक ही सीमित थे। दूसरे चरण में उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, बीमार इकाइयों के निजी क्षेत्र द्वारा अधिग्रहण और सार्वजनिक क्षेत्र का नए उपक्रमों में प्रवेश जैसे, उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण, सलाहकारी संस्था, करार और परिवहन आदि देखा गया।

पीएसयू ने भारत के औद्योगिक विकास के लिए एक मजबूत नींव रखी है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम सरकार को लाभ प्रदान करने (उनके नियंत्रित शेयरधारक) और अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वांछित सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों और लंबी अवधि के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अहम भूमिका अदा करते हैं। एक दौर में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को आधुनिक भारत का मंदिर भी कहा जाता था। पहली पंचवर्षीय योजना में उनतीस करोड़ रुपए के कुल निवेश से पांच केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम स्थापित किए गए। इन उपक्रमों ने भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में अहम भूमिका निभाई है। आज इन उपक्रमों का कुल कारोबार देश की जीडीपी का करीब पच्चीस प्रतिशत और निर्यात आय में इनकी हिस्सेदारी आठ प्रतिशत है। इन इकाइयों में कुल मिला कर 13.9 लाख लोग काम करते हैं। ये सभी आयकर दाता होंगे। अगर हरेक कर्मी पर पांच लोग निर्भर हैं तो ये उपक्रम सत्तर लाख लोगों को बेहतर जिंदगी दे रहे हैं। इनसे देश को हर साल करोड़ों रुपए का कर भी मिलता है।

हालांकि जहां कई पीएसयू ने देश और समाज के लिए बेहतर काम करके दिखाया है, वहीं पीएसयू बैंकों को अपने कामकाज में तेजी से सुधार करना होगा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) से सरकार चिंतित है। इनका हजारों करोड़ रुपये का कर्ज डूब रहा है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बैंक प्रमुखों से एनपीए कम करने और कारोबार को गति देने के लिए कर्ज (के्रडिट) का प्रवाह बढ़ाने को कहा है। कुछ समय पहले सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों को संबोधित करते हुए जेटली ने कहा कि जिस तरह से इनका एनपीए बढ़ रहा है, वह खतरनाक है। इन बैंकों को पेशेवराना अंदाज में काम करना चाहिए।

बेशक, पीएसयू को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पेट्रोलियम, खनन, बिजली उत्पादन, बिजली संप्रेषण, परमाणु ऊर्जा, भारी इंजीनियरिंग और विमानन जैसे क्षेत्रों पर हावी रहे केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को 1991 में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के साथ ही निजी कंपनियों से कड़ी टक्कर मिल रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने खुद 22 जुलाई को राज्यसभा में यह बात स्वीकार की कि, ‘सरकारी कंपनियों को स्पर्धा के माहौल में किसी भी अन्य कारोबारी संगठन की तरह काम करना सीखना चाहिए। उन्हें सरकारी विभाग की तरह काम नहीं करना चाहिए।’ उन्होंने बताया कि घाटे में चल रहे 79 पीएसयू में से 49 बीमार हैं।

इसके बावजूद राष्ट्र निर्माण में सरकारी क्षेत्र के इन विशाल प्रतिष्ठानों के योगदान को मान्यता मिलनी चाहिए। इनमें भारत की सबसे बड़े सकल कारोबार वाली इंडियन आॅयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनी तेल और प्राकृतिक गैस निगम, सबसे बड़ी पब्लिक यूटिलिटी कंपनी राष्ट्रीय पन बिजली निगम और सबसे ज्यादा बाजार पूंजीकरण वाली कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड शामिल हैं। इनमें से कुछ कंपनियां विश्व की पांच सौ सबसे बड़ी कपंनियों में शामिल हैं।

पीएसयू की कुल बाजार पूंजीकरण में हिस्सेदारी इक्कीस प्रतिशत है। मुंबई शेयर बाजार में सूचीबद्ध पांच सौ सबसे बड़ी कंपनियों में साठ से अधिक पीएसयू हैं। कुछ पीएसयू का तो अपने कारोबार के मूल क्षेत्रों में लगभग एकाधिकार है। मिसाल के तौर पर भारत के कुल कोयला उत्पादन का करीब 81.1 प्रतिशत कोल इंडिया के हाथ में है और 74 प्रतिशत कोयला बाजार उसकी मुट्ठी में है। इसी तरह भारत में लौह अयस्क का खनन करने वाली सबसे बड़ी कंपनी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम है।

कुछ पीएसयू सफेद हाथी हो चुके हैं, लेकिन कई अन्य कंपनियां उम्मीदों पर खरी उतरी हैं और आर्थिक वृद्धि में उल्लेखनीय योगदान करती रही हैं। अच्छा प्रदर्शन करने वाली सभी पीएसयू में तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। ये पहलू हैं- दक्ष मानव संसाधन, ठोस प्रबंधन और नित नई सोच। कुछ जानकार सफल पीएसयू की सफलता का श्रेय इनकी उम्दा कार्यशैली को देते हैं, जिसमें सारा ध्यान परिणामों और स्मार्ट प्रक्रियाओं के विकास पर है।

इस बीच, कुछ पीएसयू की हालत सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने विनिवेश का विकल्प चुना है। सत्ता में आने के पहले सप्ताह में राजग सरकार ने हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड और बाल्को में अपने बचे-खुचे शेयर बेचने की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया। उसने 19 मार्च, 2015 को सार्वजनिक क्षेत्र के सात ऐसे उपक्रमों को बंद करने का निर्णय किया, जिन्हें पटरी पर लाने की कोई संभावना नहीं है। लगभग 3,139 करोड़ रुपए का संचित घाटा अर्जित करने वाले ये सात उपक्रम हैं एचएमटी बियरिंग्स, तुंगभद्रा स्टील प्रोडक्ट्स, हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स, एचएमटी वॉचेज, एचएमटी चिनार वॉचेज, हिंदुस्तान केबल्स और स्पाइसेज ट्रेडिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड।

निर्विवाद रूप से कुछ पीएसयू वक्त के साथ नहीं चल सके, पर कई शानदार काम कर रहे हैं। बेशक, ये देश की आर्थिक गतिविधियों में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। 1947 के बाद बुनियादी वर्षों में हमारी अर्थव्यवस्था के औद्योगीकरण की जिम्मेदारी में उन्होंने बहुत बड़ा हिस्सा संभाला और वे आज भी राष्ट्र निर्माण की प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।

अच्छी बात है कि सरकार देश में सार्वजनिक क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उसका नजरिया स्पष्ट है कि हमारी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की मांग पूरी करने के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को मिल कर और एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करने की जरूरत है। हमारे देश को सार्वजनिक और निजी, खासकर ढांचागत क्षेत्र में भारी निवेश की जरूरत है। खासकर ऐसे समय सार्वजनिक निवेश की जरूरत है, जब देश मुश्किल वैश्विक माहौल का सामना और विविधतापूर्ण घरेलू वृद्धि की उम्मीद कर रहा है।
एक राय यह भी है कि सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में निवेश मुख्य रूप से विनिर्माण, खनन, बिजली और सेवाओं में केंद्रित है। इन्हें विनिर्माण क्षेत्र में भी ज्यादा बेहतर कार्य करने की जरूरत है। यही नहीं, इन्हें अपने जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में विनिर्माण क्षेत्र के हिस्से को वर्तमान पंद्रह प्रतिशत के असंतोषजनक स्तर से बढ़ाना चाहिए।

सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम पुनर्संरचना कार्यालय 2004 में बनाया गया था। तब से केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के तिरालीस उपक्रमों के जीर्णोद्धार के प्रस्तावों का अनुमोदन किया गया है। बेहतर बात यह है कि उनमें से केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के चौबीस उपक्रम मुनाफा कमाने लगे हैं और तेरह में क्रांतिकारी बदलाव आ चुका है, वे तीन या अधिक वर्ष से निरंतर मुनाफा कमा रहे हैं। तेजी से बदलाव के इस दौर में प्रतिस्पर्द्धा में टिके रहने के लिए केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कॉरपोरेट सुशासन, रणनीतिक नियोजन, अनुसंधान और विकास तथा गुणवत्ता नियंत्रण पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। उधर सरकार को भी उन्हें अपेक्षित स्वायत्तता देनी होगी।

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