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राजनीतिः पूर्वोत्तर की नई पीड़ा

लगता है पूर्वोत्तर के कथित विकास के नाम पर केंद्र की ज्यादा दिलचस्पी यहां के खनिज भंडारों को निजी कंपनियों को सौंपने में है। पर जहां भी आगा-पीछा सोचे बिना बेतहाशा खनन हुआ है, पर्यावरण की बर्बादी हुई है। जैसे, कर्नाटक के बेल्लारी में। पूर्वोत्तर की पारिस्थतिकी से ज्यादा छेड़छाड़ कई तरह की समस्याएं खड़ी कर सकती है।

Author July 16, 2016 3:10 AM

असम के बारह तेल क्षेत्रों की नीलामी की घोषणा के बाद राज्य के नागरिक संगठन विरोध जताने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। लोग आशंकित हो रहे हैं कि राज्य की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदाओं के निजीकरण का सिलसिला तेज किया जा सकता है। मोदी सरकार ने सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देते हुए जिस तरह विदेशी कंपनियों का स्वागत करने के लिए लाल कालीन बिछा दिया है, उसे देखते हुए पूर्वोत्तर की प्राकृतिक संपदाओं पर कॉरपोरेट की गिद्धदृष्टि होने से इनकार नहीं किया जा सकता। असम के बारह तेल क्षेत्रों को सरकारी कंपनी ओएनजीसी (तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग) के हवाले करने की जगह उनको निजी कंपनियों के हवाले करने की तैयारी चल रही है।
गौरतलब है कि प्राकृतिक संपदा के दोहन के खिलाफ असम में पहले कई जन आंदोलन हो चुके हैं और इसी मुद््दे पर कई उग्रवादी संगठन भी हिंसात्मक गतिविधियां करते रहे हैं। अब असम में भाजपा की अगुआई में गठबंधन सरकार है और जन भावनाओं को नजरअंदाज करते हुए केंद्र सरकार ने संपदाओं के निजीकरण की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। ऐसा केवल असम में नहीं हो रहा है, बल्कि समूचे पूर्वोत्तर में यह खेल शुरू हो चुका है।
मोदी सरकार ने 24 जून 2015 को पूर्वोत्तर के सभी राज्यों को एक पत्र लिख कर निर्देश दिया कि जिन वन क्षेत्रों में खनिज संपदाएं हैं, उनको वन क्षेत्र से बाहरी इलाका घोषित किया जाए। पत्र में यह भी निर्देश दिया गया कि जिन स्थानों पर तेल का पता लगाया गया है, उन स्थानों को वन क्षेत्र से पृथक क्षेत्र घोषित किया जाए। इससे संकेत मिलता है कि पूर्वोत्तर की प्राकृतिक संपदाओं को केंद्र सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने की योजना बना रही है।
मेघालय की कई कोयला खदानों पर पूंजीपतियों का पहले ही अधिकार हो चुका है और उन खदानों से कोयला निकालने का काम जोर-शोर से चलाया जाता रहा है। मेघालय में चूना पत्थर के भंडारों को इस बीच सोलह कंपनियों को बेचा जा चुका है। मेघालय में ग्रेनाइट, बॉक्साइट, लोहे आदि का विशाल भंडार है। मोटे अनुमान के मुताबिक मेघालय की धरती के गर्भ में 5 करोड़ टन ग्रेनाइट, 14.5 लाख टनबॉक्साइट और 1510 करोड़ टन कोयले का भंडार है। इसके अलावा मेघालय के पश्चिमी खासी पहाड़ जिले में धरती के नीचे उच्च गुणवत्ता वाला यूरेनियम मौजूद है, जिसकी मात्रा 9.22 मीट्रिक टन है। केंद्र की तरफ से बीच-बीच में यूरेनियम के खनन का काम शुरू करने की कोशिश होती रही है, लेकिन हर बार प्रबल नागरिक आंदोलन के चलते खनन का काम रोकना पड़ा है। कई निजी कंपनियां मेघालय की खदानों को लीज पर लेने की कोशिश कर रही हैं। माना जा रहा है कि अगर आने वाले समय में मेघालय में भाजपा की सरकार बन गई तो प्राकृतिक संपदाओं के निजीकरण की रफ्तार भी तेज हो जाएगी।
अरुणाचल प्रदेश के जंगलों में भी केंद्र सरकार खनन का काम शुरू करना चाहती है। अब तक राष्ट्रीय हरित पंचाट (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के हस्तक्षेप के चलते खनन का काम शुरू नहीं हो पाया है। राज्य के सांग्लांग और लोहित जिलों में कोयला खनन की तैयारी की जा रही है। नगालैंड के उखा जिले के तेल क्षेत्रों को नीलाम करने की बात चल रही है। अरुणाचल प्रदेश के जंगलों में लकड़ी का व्यवसाय धड़ल्ले से चलाया जा रहा है और जंगल की संपदा के निजीकरण के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया जा रहा है। नगालैंड में कोयला खदानों के अलावा तेल क्षेत्रों को निजी कंपनियों को सौंपने के लिए केंद्र राजनीतिक रूप से रास्ता तैयार कर रहा है।
मिजोरम की प्राकृतिक संपदाओं के दोहन के मामले में भी सरकार पीछे नहीं है। मिजोरम में मैंगनीज, जिंक, ग्रेफाइट, जिप्सम, क्रोमियम, बॉक्साइट, तांबा के खदानों में कई पूंजीपतियों ने निवेश किया है। एक तरफ संपदा के दोहन के बदले राज्यों को रॉयल्टी देने की बात हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ पूंजीपतियों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने की कोशिश हो रही है।
पूर्वोत्तर के प्रमुख शहर गुवाहाटी में पेयजल आपूर्ति योजना का काम एक विदेशी कंपनी जायका को सौंपा गया है और इसे जल के निजीकरण की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यह कंपनी अधिक कीमत लेकर लोगों को ब्रह्मपुत्र का पानी मुहैया कराएगी। केंद्र को असम में भाजपा की सरकार बन जाने से निजीकरण करने में आसानी होने वाली है। यही वजह है कि सोनोवाल सरकार के गठन के एक महीने बाद ही बारह तेल क्षेत्रों को बेचने की घोषणा कर दी गई।
पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा ठोस रणनीति बना रही है। इसके लिए उसने पूर्वोत्तर के राज्यों में पैर पसारने का जिम्मा असम के वित्तमंत्री हिमंत विश्व शर्मा को सौंपा है और उनकी अगुवाई में कई दलों का एक संयुक्तमोर्चा तैयार किया है। असम के लोग तेल सहित सभी प्राकृतिक संपदाओं के प्रति जज्बाती लगाव महसूस करते हैं। वे इस तर्क को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि घाटे से निपटने के लिए सरकार ने बारह तेल क्षेत्रों को बेचने का फैसला किया है। गठबंधन सरकार में शामिल असम गण परिषद इस फैसले का विरोध कर रही है। सोनोवाल मंत्रिमंडल में असम गण परिषद के दो मंत्री भी शामिल हैं। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में दोनों मंत्री क्या रुख अपनाते हैं।
जानकारों का मानना है कि अगर केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों की प्राकृतिक संपदाओं का निजीकरण शुरू करेगी तो इन राज्यों में राजनीतिक रूप से तीखी प्रतिक्रिया सामने आएगी और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए नए सिरे से उग्रवादी संगठन हथियार उठा लेंगे।
गौरतलब है कि तेल की रॉयल्टी के तौर पर असम को अब तक बकाया दस हजार करोड़ रुपए नहीं दिए गए हैं। हाल में केंद्र ने इस बकाया राशि का दस प्रतिशत मुहैया कराने का आश्वासन दिया है। यह हाल सरकारी कंपनी की तरफ से निकाले गए तेल की रॉयल्टी का है। जब निजी कंपनियां तेल निकालेंगी तब रॉयल्टी के नाम पर मनमानी ही करेंगी। असम की धरती के अंदर 1.3 अरब टन कच्चा तेल मौजूद है और 156 अरब क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस का भंडार है। भारत में हर साल तीन करोड़ टन तेल का उत्पादन होता है। इसमें असम की भागीदारी पचास लाख टन की है। अब भी असम के तेल भंडार से तिरपन प्रतिशत तेल निकाला जाना बाकी है। नगालैंड में मौजूद साठ करोड़ टन तेल और गैस की कीमत कम से कम 2520000 करोड़ रुपए है। मेघालय में मौजूद कोयले की कीमत कम से कम 201600 करोड़ रुपए है। इन संपदाओं पर निजी कंपनियां कब्जा करना चाहती हैं और केंद्र सरकार उनकी राह को आसान बनाने की कोशिश कर रही है। पूर्वोत्तर की प्राकृतिक संपदा पर अगर निजी कंपनियों का कब्जा हो गया तो पर्यावरण को बहुत नुकसान होगा और प्रकृति के साथ रहने वाली जनजातीय आबादी को विस्थापित होना पड़ेगा।
अरुणाचल प्रदेश में 67 लाख हेक्टेअर वनक्षेत्र है। मिजोरम में 19 लाख हेक्टेयर वनक्षेत्र है। इन वनक्षेत्रों की संपदा को भी निजी कंपनियों के हवाले करने की तैयारी चल रही है। असम में तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम को पेट्रोल की खोज करते हुए यूरेनियम का पता लगा है। इस तरह की प्राकृतिक संपदा का अगर निजी कंपनियां दोहन करना शुरू कर देंगी तो पूर्वोत्तर की जैव विविधता खतरे में पड़ सकती है।
वैसे ही पूर्वोत्तर के लोगों के मन में आजादी के बाद से ही केंद्र के प्रति शिकायत का भाव बना रहा है। भारत के कुल क्षेत्रफल का आठ फीसद हिस्सा पूर्वोत्तर कहलाता है। मुख्यधारा के भारत के अवचेतन के लिए पूर्वोत्तर का इलाका कोई खास अहमियत नहीं रखता। पूर्वोत्तर इस कदर उपेक्षा और भेदभाव का शिकार होता रहा है कि शेष भारत के साथ उसका कदम मिलाकर चलना संभव नहीं हो पाता। केंद्र ने कभी भी पूर्वोत्तर को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा, समय-समय पर पूर्वोत्तर की दशा सुधारने के बड़े-बड़े वादे जरूर किए गए। अब पूर्वोत्तर की संपदा को निजी कंपनियों के हवाले करने की जो तैयारी की जा रही है, उससे पूर्वोत्तर के लोगों के मन में क्षोभ और बेगानेपन की भावना और भी बढ़ जाएगी।
पूर्वोत्तर में देश के कुल चाय उत्पादन में से दो तिहाई चाय और पेट्रोलियम पदार्थों का उत्पादन होता है, लेकिन इससे होने वाले मुनाफे के मामूली हिस्से का भी इस क्षेत्र में निवेश नहीं किया जाता। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और दूरसंचार जैसी अहम सुविधाओं के मामले में भी पूर्वोत्तर के राज्य पिछड़े हुए हैं।
लेकिन लगता है, पूर्वोत्तर के कथित विकास के नाम पर केंद्र की ज्यादा दिलचस्पी यहां के खनिज भंडारों को निजी कंपनियों को सौंपने में है। पर जहां भी आगा-पीछा सोचे बिना बेतहाशा खनन हुआ है, पर्यावरण की बर्बादी हुई है। जैसे, कर्नाटक के बेल्लारी में। पूर्वोत्तर की पारिस्थतिकी से ज्यादा छेड़छाड़ करना कई तरह की समस्याएं खड़ी कर सकती है। इस इलाके में यों भी शेष भारत के प्रति किसी हद तक बेगानेपन का भाव रहा है। इसे दूर करने के लिए यह जरूरी है कि पूर्वोत्तर के लिए विकास की जो प्रक्रिया चलाई जाए वह ऊपर से थोपी हुई न जान पड़े, बल्कि उसमें पूर्वोत्तर के लोगों की रजामंदी और भागीदारी हो।

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