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राजनीति: बचाना होगा कुटीर उद्योगों को

वास्तव में तो मांग बढ़ने से ही हमारी समस्या हल होगी। किंतु मांग सहज ही नहीं बढ़ती है। यह हमारी क्रय शक्ति पर निर्भर करती है। अत: शासन को देश की क्रय शक्ति बढ़ाने का भी प्रयास करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले देश के अंतिम व्यक्ति को कुटीर उद्योगों से जोड़ा जाए। आम व्यक्ति जो भी उत्पादन करता है, उसे कच्चे माल के रूप में या फिर उत्पाद के रूप में शासन को खपाने का प्रयास करना होगा।

कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने से बढ़ती बेरोजगारी पर लगाम कसी जा सकती है।

राजकुमार भारद्वाज
बेरोजगारी के संदर्भ में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के ताजा आंकड़े कहते हैं कि मई-अगस्त, 2017 में बेरोजगारी की दर 3.8 फीसद और सितंबर से दिसंबर, 2019 के चार महीनों में साढ़े सात फीसद पर पहुंच गई थी। उच्च शिक्षित लोगों की बेरोजगारी दर में साठ फीसद तक की वृद्धि हुई है। यदि एक सौ तीस करोड़ जनसंख्या वाले राष्ट्र के विषय में बेरोजगारी का चिंतन करें, तो यह आंकड़े सुखद तस्वीर पेश नहीं करते। बनारस की साड़ी हो, भदोही का कालीन, मुरादाबाद, रेवाड़ी या यमुनानगर के पीतल के बर्तन या कश्मीरी शॉल, इनका डंका कभी अरब से फारस की खाड़ी से सुदूर भूमध्य सागर तक बजता था। हमारी ग्राम्य व्यवस्था अपने आप में संपूर्ण अर्थव्यवस्था संजोए हुए थी।

ग्राम अपनी मांग, खपत और उत्पादन के लिए आत्मनिर्भर थे। किंतु उनसे पहले और बाद के भारत में जो परिवर्तन हुए, उनका क्रम अभी भी नहीं टूटा है। अंग्रेजों ने तैयार माल लाकर भारत में खपाने की नीति से यहां के कुटीर उद्योगों को चौपट कर दिया। और आज स्वतंत्र भारत में चीन हमारे बाजार को स्वनिर्मित वस्तुओं से पाटे हुए है।

यह पूरा परिदृश्य स्पष्ट संकेत करता है कि स्वतंत्र भारत में भी शासकीय स्तर पर भारी चूक हुई है। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी से यह तो स्पष्ट है कि शासन और लोकतांत्रिक शासकों ने कहीं न कहीं अपने हितों और स्वार्थों को प्राथमिकता पर रख कर प्रजा के हितों को निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। उद्यमिता के उन्नयन के लिए जिस स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए, उसका सर्वथा अभाव दिखता है। अनुत्थाने ध्रुव नाश: प्राप्तस्य अनागतस्य च, प्राप्यते फलम् उत्थानात् लभते च अर्थ-सम्पदाम्ह्, अर्थात उद्यमशीलता के अभाव में पहले से जो प्राप्त है और भविष्य में जो प्राप्त हो पाता, उन दोनों का ही नाश निश्चित है। उद्यम करने से ही वांछित फल प्राप्त होता है और उसी से आर्थिक संपन्नता मिलती है। उद्यमिता को बढ़ावा दिए बिना भारत के विकास की यात्रा संभव नहीं।

भारत में बेरोजगारी खत्म करने के लिए जब भी प्रयास किए गए, तो उनका स्थान आयातित विचारधारा, संकल्पना और तकनीक ने ले लिया। जबकि सच्चाई यह है कि विचारधारा और तकनीक के आयात से किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का कभी भला नहीं हुआ है। भारत के परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज, तकनीक और संसाधनों की प्रचुरता है। बस, उसे व्यवस्थित किए जाने की आवश्यकता है। स्वदेशी मांग के अनुरूप तकनीक का विकास किया जाना चाहिए, न कि बिना आवश्यकता के स्वचालन पर बल दिया जाए। ऐसी तकनीकी का प्रयोग किया जाए, जिसमें अधिकाधिक मानव श्रम बल का उपयोग हो सके। जब मांग में वृद्धि हो जाए और मानव श्रम बल से उत्पादन बढ़ाना संभव न हो, तब केवल आवश्यक यांत्रिकीकरण को अपनाया जाए।

पश्चिम में मानव श्रम उपलब्ध न होने के कारण वहां मशीनों का बहुतायत प्रयोग होता है। किंतु वह मॉडल भारत के संदर्भों में अपेक्षित नहीं है। सबको काम ही भारतीय अर्थनीति का एकमेव मूलाधार है। कार्यकुशल व्यक्तियों के लिए मांग के अनुरूप काम करने की अवस्था और यंत्रों में बदलाव हो सकता है। वास्तव में तो मांग बढ़ने से ही हमारी समस्या हल होगी। किंतु मांग सहज ही नहीं बढ़ती है। यह हमारी क्रय शक्ति पर निर्भर करती है। अत: शासन को देश की क्रय शक्ति बढ़ाने का भी प्रयास करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले देश के अंतिम व्यक्ति को कुटीर उद्योगों से जोड़ा जाए। आम व्यक्ति जो भी उत्पादन करता है, उसे कच्चे माल के रूप में या फिर उत्पाद के रूप में शासन को खपाने का प्रयास करना होगा। आम व्यक्ति के उत्पाद को पूर्ण शासकीय संरक्षण प्रदान किया जाए।

लघु, मझोले और बड़े उद्योगों को स्पष्ट आदेश हों कि वे अपने से क्रम में छोटे उद्योगों के उत्पादों को कच्चे माल या आवश्यक उत्पाद के रूप में खरीदेंगे, ताकि कुटीर उद्योगों से बड़े उद्योगों तक आपूर्ति की एक शृंखला बन जाए। इससे जन साधारण की क्रय शक्ति में वृद्धि होगी और इस क्रय शक्ति में वृद्धि ही दीर्घ मांग को उत्पन्न करेगी और बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सकेगा। शासन को इसके लिए सुस्पष्ट कार्य वर्गीकरण करना होगा कि कुटीर, लघु, मध्यम और बड़े उद्योग किस-किस कार्य को करेंगे या कौन से उत्पाद बनाएंगे। जब बिस्कुट, ब्रेड, अचार, पापड़ और नमक जैसी लघु उत्पाद शृंखला में भी भीमकाय उद्योगों को प्रवेश मिल जाएगा, तो निश्चित ही लघु उद्योग उनके सामने प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाएंगे। लंबे समय से देश में यही हो रहा है। इसके लिए एक मानक एवं स्पष्ट नीति की आवयकता है।

अर्थ नीति के केंद्र में मानव श्रम बल को स्थान देकर हमें अपनी आवश्यकताओं को सूचीबद्ध करना होगा। उन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किन उत्पादों और उनकी उपलब्धता की गणना करनी होगी। उन उत्पादों के अनुसार ही कितने संसाधनों की और आवश्यकता है या कितने संसाधनों का उपयोग नहीं हो पा रहा है, इसकी सुस्पष्ट नीति बनानी होगी। इसके अलावा नए संसाधनों का विकास किया जाए और अनुपयोगी संसाधनों का उपयोग किया जाए। जैसे, उत्तर-पूर्व में बांस की खेती प्रचुरता में होती है। किंतु बांस के उत्पादों का उत्तर, मध्य और दक्षिण भारत में प्रचलन नाममात्र को है। केवल भवन निर्माण में बांस का पांरपरिक उपयोग होता रहा है, लेकिन अब उसमें भी लोहे का प्रयोग होने लगा है। जबकि बांस के खाद्य पदार्थ, रसोई घर के उपकरण, बांस के बर्तन, बांस का फर्नीचर बहुत ही प्राकृतिक और सुखदायी होता है। कभी सार्थक शासकीय प्रयास नहीं हुआ कि उत्तर-पूर्व के इस कच्चे माल का बड़े पैमाने पर उपयोग करके उत्तर-पूर्व की अर्थव्यवस्था को सुदृड़ बनाया जाए।

सुनने में बड़ा अटपटा लगता है कि नारियल पानी को दिल्ली तक पहुंचने में सत्तर साल लग गए। किंतु यह सत्य है कि हाल के वर्षों में ही नारियल पानी उत्तर भारत के बाजारों में पहुंचना शुरू हुआ। अन्यथा उत्तर भारतीय केवल मुंबई या दक्षिण भारत की यात्राओं में नारियल पानी की सुखद अनुभूति प्राप्त कर पाते थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के सत्तू और बेल रस को हरियाणा और पंजाब में पहुंचने में कई दशक लगे। ऐसे ही अन्य ग्रामीण उत्पाद उद्योगों के लिए संजीवनी का काम कर सकते हैं। इसके लिए सरकारों को बस प्रयास भर करने की आवश्यकता है। तकनीक के स्तर पर बात की जाए, तो हम अरबों की विदेशी मुद्रा से अरब देशों के कोषागार भरते हैं और बदले में कच्चा तेल लाते हैं। हम अपनी ऊर्जा मांग के अनुरूप उपलब्ध वैकल्पिक ऊर्जा के माध्यमों को विकसित कर सकते हैं। सौर ऊर्जा का नया तंत्र विकसित किया जा सकता है।

हाल में सौर ऊर्जा में आत्मनिर्भरता के लिए कुछ प्रयास देखने को मिले हैं, लेकिन इन प्रयासों में आयातित तत्वों की ही प्रधानता है। अब हम अपनी विदेशी मुद्रा इस्लामिक विचारधारा वाले अरब राष्ट्रों के बजाय दंभी चीन को सौंप रहे हैं। सौर पैनल और लीथियम बैटरियां कोई रॉकेट विज्ञान नहीं हैं। जब हमें क्रायोजनिक इंजन देने से मना कर दिया गया तो हमने उसका स्वयं ही विकास किया और हम मंगल ग्रह तक पहुंचने के प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में सौर पैनल और लीथियम बैटरियों का भी विकास और उत्पादन अपने स्तर पर कर सकते हैं। इससे हम ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी होकर भारी स्तर पर विदेशी मुद्रा की बचत कर सकेंगे। लेकिन इस सब के लिए कुटीर, लघु, मध्यम और बड़े उद्योगों के क्रम में आवश्यकता, मांग, उपलब्ध संसाधनों के उपयोग के साथ समन्वयकारी नीतियों की आवश्यकता है। इस पूरे उद्यम में साधारण व्यक्ति को केंद्र में रखना होगा। तभी भारत बेरोजगारी के रोग से मुक्त हो सकेगा।

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