कालेधन की समस्या

कर वंचना के लिए मुफीद देशों में पैसा रखने से दुनियाभर में सरकारों को हर साल चार सौ सत्ताईस अरब डालर के कर का नुकसान होता है।

सांकेतिक फोटो।

जयंतीलाल भंडारी

कर वंचना के लिए मुफीद देशों में पैसा रखने से दुनियाभर में सरकारों को हर साल चार सौ सत्ताईस अरब डालर के कर का नुकसान होता है। विकासशील देशों से बेईमानी का पैसा बाहर जाने की रफ्तार बढ़ती जा रही है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था और विकास पर देखने को मिलता है।

कर के लिहाज से जन्नत माने जाने वाले देशों में कालाधन जमा करने का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि कालेधन पर काबू पाने के लिए दुनिया भर में वैश्विक वित्तीय संगठन और सरकारें काम भी कम रही है, कड़े कानून बनाए जा रहे हैं, इस मुद्दे पर सहयोग के लिए देशों के बीच करार हो रहे हैं, पर समस्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों समूह-20 देशों के शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच न्यूनतम वैश्विक कारपोरेट कर पंद्रह फीसद किए जाने की सहमति कर वंचना के लिए अनुकूल देशों में कालेधन के बढ़ने पर लगाम लगाने का महत्त्वपूर्ण उपाय बन सकती है। सभी देशों में कर की न्यूनतम दर एक समान सुनिश्चित हो जाने से बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक देश को छोड़ कर कम या शून्य कर दर वाले देशों में अपना कारोबार और अपनी आमदनी को नहीं ले जा पाएगी। इससे कालेधन पर बड़ा नियंत्रण हो सकेगा।

इस साल अक्तूबर में दुनिया में कालेधन के खुलासे का सबसे बड़ा मामला पेंडोरा पेपर्स लीक के रूप में सामने आया। इसमें दुनिया भर के रसूखदार लोगों के वित्तीय लेन-देन को लेकर बड़े खुलासे हुए। इंटरनेशनल कंसोर्टियम आफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्टस (आइसीआइजे) ने गहरी छानबीन के बाद पैंडोरा पेपर्स रिपोर्ट तैयार की थी। यह रिपोर्ट लगभग एक करोड़ बीस लाख दस्तावेजों की पड़ताल है, जिसे एक सौ सत्रह देशों के छह सौ खोजी पत्रकारों की मदद से बनाया गया है। इस पड़ताल में पाया गया कि भारत सहित दुनियाभर के दो सौ से ज्यादा देशों के बड़े नेताओं, धन कुबेरों और मशहूर हास्तियों ने धन बचाने और अपने कालेधन के गोपनीय निवेश के लिए किस तरह ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, सेशल्स, हांगकांग और बेलीज आदि में पैसा रखा है। इस रिपोर्ट में तीन सौ से अधिक भारतीयों के नाम भी शामिल हैं।

ऐसे में पैंडोरा पेपर्स के संबंध में मल्टी एजेंसी ग्रुप (एमएजी) ने अपनी सतत बैठकें आयोजित करके जांच शुरू कर दी है। इस बहु-एजंसी समूह में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के प्रमुख की अध्यक्षता में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), रिजर्व बैंक और वित्तीय खुफिया इकाई के अधिकारी शामिल हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2017 में पैराडाइज पेपर्स के तहत एक करोड़ चौंतीस लाख से अधिक गोपनीय इलेक्ट्रानिक दस्तावेजों के माध्यम से ने सत्तर लाख ऋण समझौते, वित्तीय विवरण, ई-मेल और ट्रस्ट डीड उजागर किए गए थे। इनमें सात सौ चौदह भारतीयों के नाम भी उजागर हुए थे। इसके पहले वर्ष 2016 में पनामा पेपर्स के तहत एक करोड़ पंद्रह लाख संवेदनशील वित्तीय दस्तावेज सामने आए थे, जिनमें वैश्विक कारपोरेटों के धनशोधन संबंधी रिकार्ड थे। तब पांच सौ भारतीयों के नामों का खुलासा हुआ था।

कर वंचना और कालेधन के शोधन से जुड़े मामले बताते हैं कि कैसे दुनिया के कुछ सर्वाधिक शक्तिशाली लोग अपनी संपत्ति छिपाने के लिए ऐसे छोटे देशों में फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल करते हैं। कर हैवन देश उन देशों को कहा जाता है जहां नकली कंपनियां बनाना आसान होता है और बहुत कम कर या शून्य कर लगता है। इन देशों में ऐसे कानून होते हैं, जिससे कंपनी के मालिक की पहचान का पता लगा पाना मुश्किल होता है। कालाधन वह धन होता है, जिस पर आयकर की देनदारी होती है, लेकिन उसकी जानकारी सरकार को नहीं दी जाती है। कालेधन का स्रोत कानूनी और गैर-कानूनी कोई भी हो सकता है। आपराधिक गतिविधियां जैसे अपहरण, तस्करी या जालसाजी इत्यादि के माध्यम से अर्जित धन भी कालाधन कहलाता है। मादक पदार्थों के कारोबार, अवैध हथियारों के व्यापार, जबरन वसूली, फिरौती और साइबर अपराध से कमाया गया पैसा भी इन नकली कंपनियों में सुरक्षित कर दिया जाता है, ताकि यह कालाधन अपने देश में सफेद धन में बदल जाए।

आक्सफेम इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कर वंचना के लिए मुफीद देशों में पैसा रखने से दुनियाभर में सरकारों को हर साल चार सौ सत्ताईस अरब डालर के कर का नुकसान होता है। सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों पर होता है। विकासशील देशों से बेईमानी का पैसा बाहर जाने की रफ्तार बढ़ती जा रही है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था और विकास पर देखने को मिलता है। विदेशों में गोपनीय रूप से धन छुपा कर रखे जाने का सीधा असर आम आदमी के कल्याण पर भी पड़ता है।

भारत में कालेधन को लेकर बहस दशकों पुरानी है। विदेशी बैंकों में भारतीयों के कालेधन से संबंधित अधिकृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन अर्थविशेषज्ञों का मानना है कि यह करीब तिहत्तर लाख करोड़ रुपए हो सकता है। स्विस नेशनल बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 तक स्विस बैंकों में भारतीय नागरिकों और कंपनियों का जमा धन बीस हजार सात सौ करोड़ रुपए से अधिक था। नेशनल काउंसिल आफ अप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च के मुताबिक साल 1980 से 2010 के बीच भारत के बाहर जमा होने वाला काला धन तीन सौ चौरासी अरब डालर से लेकर चार सौ नब्बे अरब डालर के बीच था।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि देश में भी कालेधन से निपटने के लिए अब से पहले आय घोषमा योजना, स्वैच्छिक घोषणा योजना, कर दर कम करने, 1991 के बाद व्यापार पर नियंत्रण हटाने, कर कानूनों में बदलाव जैसे कई कदम उठाए गए। हाल के वर्षों में ऐसे विधान बनाए गए हैं जो कर अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने की अनुमति देते हैं कि करदाता कर चोरी नहीं करें। इसमें ‘अपने ग्राहक को जानिए’ (केवाईसी) की व्यवस्था जोड़ी गई जिसमें किसी विशेष क्षेत्र में लेनदेन करने वालों को अपनी पूरी पहचान बतानी होती है, ताकि दूसरे कार्यक्षेत्रों के साथ उस सूचना को साझा किया जा सके। लेकिन फिर भी कालेधन की बढ़ोतरी और देश से कालाधन विदेश भेजे जाने को लेकर कमी नहीं आई है। विदेशी बैंकों में जमा कालेधन के खाताधारकों की सूची मिलने की खबर मात्र को बड़ी सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता है। सफलता तभी मानी जाएगी जब विदेशों में जमा अधिकांश कालाधन सरकारी खातों में वापस आ जाएगा।

जिस तरह से पनामा पेपर्स और पैराडाइज पेपर्स के खुलासे होने पर केंद्र सरकार ने देश की मशूहर हस्तियों की विदेश में गोपनीय वित्तीय संपत्तियों का खुलासा करने के लिए बहु-एजंसी जांच कराने के आदेश दिए थे, अब इस बार भी पैंडोरा पेपर्स की भी बहु एजंसी जांच सुनिश्चित की गई है। लेकिन अब पैंडोरा पेपर्स लीक मामले में जांच का काम पुराने और सामान्य ढर्रे वाला नहीं रहना चाहिए। चूंकि ये मामले प्रभावशाली तबके से संबंध रखते हैं, अतएव जांच संबंधी कार्रवाई कठोर होनी चाहिए। विदेशों में निवेश संबंधी मानकों को तोड़ने वालों के लिए कठोर कानून बनाए जाने की जरूरत है।

कालेधन की समस्या सीधे तौर भ्रष्टाचार से जुड़ी है। जाहिर है, जब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी, कालेधन की समस्या से निपट पाना संभव नहीं है। भारत 2020 के ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक में छियासिवें स्थान पर रहा। निश्चित रूप से अभी भ्रष्टाचार कालेधन और विदेशी बैंकों में चोरी से धन जमा किए जाने पर नियंत्रण के लिए मीलों चलना जरूरी है।

चूंकि भारत में भ्रष्टाचार और कालेधन के नियंत्रण की सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक वित्त पोषण से है, अतएव राजनीतिक पार्टियों के वित्त पोषण में कालेधन के प्रयोग को रोकने हेतु कठोर कदम उठाने होंगे। अब भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए नौकरशाही में सुधार, भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों के क्रियान्वयन में कठोरता, न्यायालयों में त्वारित निपटान, प्रशासनिक मामलों में पारदर्शिता सहित भ्रष्टाचार दूर करने और कालेधन पर नियंत्रण के विभिन्न ठोस उपायों की डगर पर आगे बढ़ा जाना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि समूह -20 शिखर सम्मेलन में जो फैसले किए गए उनसे कुछ तो कालेधन के प्रवाह में कमी आएगी।

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