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नागालैंड में अमन की राह के कांटे

इस बार प्रेस दिवस पर नगालैंड के समाचारपत्रों ने संपादकीय का स्थान खाली छोड़ कर और तख्तियां लहरा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असम राइफल्स की तरफ से किए गए हमले के प्रति विरोध प्रदर्शित किया।

इस बार प्रेस दिवस पर नगालैंड के समाचारपत्रों ने संपादकीय का स्थान खाली छोड़ कर और तख्तियां लहरा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असम राइफल्स की तरफ से किए गए हमले के प्रति विरोध प्रदर्शित किया। मीडिया के लोगों ने इस अवसर पर खुल कर अपना क्षोभ उजागर किया। पच्चीस अक्तूबर को असम राइफल्स ने नगालैंड के पांच समाचारपत्रों के नाम एक निर्देश जारी करते हुए उन पर उग्रवादी संगठन एनएससीएन (खापलांग) की गैरकानूनी धन-उगाही को प्रोत्साहित करने का इलजाम लगाया और कहा कि ये अखबार खुल कर उग्रवादियों का समर्थन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, असम राइफल्स ने राज्य सरकार से अनुरोध किया कि वह स्वत:स्फूर्त रूप से इन अखबारों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि (निवारक) कानून,1967 के तहत सख्त कदम उठाए।

हो सकता है कि असम राइफल्स ने गृह मंत्रालय के अपने आला अधिकारियों को खुश करने और नगालैंड में मीडिया का गला घोंटने के लिए इस तरह का निर्देश जारी किया हो, लेकिन इसकी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। इस निर्देश की वजह से असम राइफल्स के आला अधिकारियों, गृह मंत्रालय और राज्य सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी, चूंकि हर जगह मीडिया के साथ-साथ आम लोगों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया। इस निर्देश के जरिए असम राइफल्स ने लोकतंत्र के मूल्यों को कुचलते हुए अपने निरंकुश चरित्र का प्रदर्शन किया।

असम राइफल्स केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय की जगह गृह मंत्रालय के अधीन आता है। नियमित सेना इकाई से सैनिक इसमें डेपुटेशन पर आते हैं और अपने सेवा-काल में गृह मंत्रालय के ही अधीन रहते हैं। इस तरह उनके किसी भी कदम के लिए जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की बनती है। इस मामले में असम राइफल्स ने जहां गृह मंत्रालय के दामन को दागदार बनाया, वहीं संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करते हुए सीधे मीडिया को नियंत्रित करने की भी कोशिश की। इस तरह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया की आवाज को दबाने की कोशिश की गई।

असम राइफल्स ने दूसरे अर्थों में नगालैंड की चुनी हुई सरकार को मीडिया के खिलाफ कदम उठाने की हिदायत देकर अपमानित किया। नगालैंड में पुलिस और अर्धसैनिक बलों को इसलिए तैनात नहीं किया गया है कि वे चुनी हुई सरकार को अपनी अंगुली पर नचाएं। अगर ऐसी बात है तो राज्य में उनकी उपस्थिति का कोई मतलब नहीं है। राज्य सरकार को आदेश देकर असम राइफल्स ने जनता के गुस्से को बढ़ा दिया है। वह राज्य में शासन करने के लिए या अपनी मनमर्जी चलाने के लिए तैनात नहीं है। उसने अपने निर्देश के जरिए राज्य सरकार के वजूद और अधिकारों को चुनौती देने का काम किया है। स्वाभाविक ही था कि नगालैंड सरकार ने असम राइफल्स के निर्देश का तीव्र विरोध किया और गृह मंत्रालय को चेताया कि भविष्य में इस तरह का व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

नगा राजनीतिक मुद्दा संभवत: विश्व का सबसे पुराना अनसुलझा राजनीतिक और सशस्त्र संघर्ष का मसला है। कई दशकों से कई पीढ़ियां इस संघर्ष के साथ जीती रही हैं। काफी लोग इस संघर्ष में मारे जा चुके हैं, जिनमें भारतीय सेना के जवान भी शामिल रहे हैं। लोगों को काफी तकलीफ उठानी पड़ी है। लोग खूनखराबे से तंग आकर शांति की बहाली चाहते हैं। जब कभी शांति की कोई उम्मीद दिखती है या समाधान का कोई प्रयत्न दिखाई देता है तो लोग उसमें मदद करने के लिए कदम बढ़ाते हैं। आपसी समझ और सौहार्द की सहायता से अमन कायम किया जा सकता है, जबकि असम राइफल्स ने अपने निर्देश के जरिए माहौल को बिगाड़ने का ही काम किया है।

कई दशकों से जारी उग्रवादी हिंसा के दौरान नगालैंड में मीडिया को परस्पर विरोधी ताकतों के बीच गेहूं के बीच घुन की तरह पिसना पड़ा है। इसके बावजूद मीडिया अपने कर्तव्य का पालन निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ करता रहा है। मीडिया के सामने हमेशा संकट की स्थिति बनी रही है और पत्रकारों को समय-समय पर अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा है। पत्रकारों को हमेशा काफी सावधानी के साथ अपना काम करना पड़ा है और जान जोखिम में डाल कर भी पत्रकारिता के धर्म का निर्वाह करना पड़ा है। सूचना जनता तक पहुंचाना और उग्रवादी संगठन का समर्थन करना दो अलग-अलग बातें हैं। सही और सटीक जानकारी के बगैर जनता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकती और न ही कोई निर्णय ले सकती है। मीडिया रिपोर्टों का ही प्रभाव है जो अब नगा जनता धन-उगाही के खिलाफ मुखर होने लगी है। मीडिया की ऐसी भूमिका के लिए असम राइफल्स ने उसकी सराहना करने की जगह उसकी आवाज बंद करने की कोशिश की।

नगालैंड में कोई बड़ा प्रकाशन-गृह नहीं है। छोटी पूंजी और कम संसाधन के सहारे अखबार निकाले जाते रहे हैं। पत्रकारों को कम वेतन के सहारे प्रतिकूल हालात में काम करना पड़ता है। यह पेशे के प्रति उनका जुनून ही है कि वे रोज पाठकों तक खबरें पहुंचाने का काम करते रहे हैं। असम राइफल्स को कोई हक नहीं जो पत्रकारों के घाव पर नमक छिड़कने की कोशिश करे।
एनएससीएन (खापलांग) पर सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है। इस संगठन की खबरें नगालैंड के अखबारों में प्रकाशित होती रही हैं। नगा समाज इस संगठन को भी शांति प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिश करता रहा है ताकि नगा मसले का स्थायी समाधान संभव हो सके। भारत सरकार की तरफ से इस दिशा में कोई गंभीर कोशिश दिखाई नहीं देती। एनएससीएन (खापलांग) के साथ बातचीत की पहल नहीं हो रही है। सवाल यह भी पैदा होता है- क्या असम राइफल्स नगालैंड में शांति की बहाली के पक्ष में नहीं है? वह खुद को पहाड़ी लोगों का मित्र बताता है तो जरूर उसे शांति बहाली का समर्थन करना चाहिए।

मीडिया को नियंत्रित करने के कदम के जवाब में नगालैंड के अखबारों ने परिपक्वता का परिचय दिया और यह जता दिया कि उन्हें किन प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा है। इन अखबारों ने असम राइफल्स के पत्र को अविकल प्रकाशित किया। अगर वे चाहते तो आसानी से उस पत्र को नजरअंदाज कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने सब्र के साथ पत्र पर विचार किया और सोलह नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर अपना संतुलित विरोध प्रदर्शित किया। मीडिया के जख्म पर नमक छिड़कने का काम असम और नगालैंड के राज्यपाल पीबी आचार्य ने किया। संघ और भाजपा के कार्यकर्ता रह चुके राज्यपाल ने बयान दिया कि असम राइफल्स को पूरा अधिकार है कि वह मीडिया को प्रतिबंधित संगठन की खबरें न छापने की हिदायत दे और जो ऐसा करते हैं उन्हें दोषी ठहराए।

नगालैंड के अखबारों के संपादकों का कहना है कि असम राइफल्स ने तीन मुद््दे उठाए हैं- ‘एक, एनएससीएन (खापलांग) की खबरों का प्रकाशन कर हमने जान-बूझ कर या अनजाने में प्रतिबंधित संगठन का समर्थन किया है। दो, हम लोगों ने गैर-कानूनी गतिविधि (निवारक) अधिनियम,1967 का उल्लंघन किया है। तीन, प्रतिबंधित संगठन की खबरें प्रकाशित कर हमने उसकी गैर-कानूनी गतिविधियों का समर्थन किया है। ये ऐसे गंभीर आरोप हैं जिनके जरिए असम राइफल्स नगालैंड के पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आजादी छीन लेना चाहता है।’

संपादकों ने कहा- ‘हमने प्रतिबंधित संगठन की खबरों का प्रकाशन करते समय अपने पेशे के मूल्यों का सम्मान किया है। हमारा काम सभी पक्षों की खबरों को प्रकाशित करना है।’ मीडिया के तीव्र विरोध को देखते हुए असम राइफल्स ने बीते सत्रह नवंबर को स्पष्टीकरण जारी किया कि उसने मीडिया की आजादी पर अंकुश लगाने की कोई कोशिश नहीं की है। उसने तो केवल संपादकों से अनुरोध किया है कि गैर-कानूनी गतिविधि(निवारक) अधिनियम का सम्मान करते हुए समाचारों का प्रकाशन करें।

जब ‘नगालैंड पेज’ के संपादकमोनालिसा चांगकीजा से पूछा गया कि संपादकों ने असम राइफल्स की हिदायत पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने में एक महीने का वक्त क्यों लगाया तो उन्होंने कहा- मैंने इस मसले पर निर्देश जारी करने वाले अधिकारी राजेश गुप्ता से संपर्क किया और उनको बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने हामी तो भरी लेकिन सामने नहीं आए। उसके बाद हम संपादकों ने मिल कर सार्वजनिक बयान जारी करने और संपादकीय का स्थान खाली छोड़ने का निर्णय लिया।’
चानकीजा ने बताया, नगालैंड जैसे अशांत राज्य में पत्रकारिता करना आग पर नंगे पैर चलने के समान है। संघर्ष में शामिल हर पक्ष पत्रकारों पर विरोधी पक्ष का साथ देने का आरोप लगाता रहता है। हम लोग जब प्रतिबंधित संगठन की खबरें प्रकाशित करते हैं तो हमारा मकसद निष्पक्षता के साथ सच को पाठकों के सामने परोसना होता है और इस तरह हम नगालैंड के परस्पर विरोधी संगठनों के बीच संवाद का अनुकूल माहौल तैयार करना चाहते हैं।

गौरतलब है कि पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों में गैर-कानूनी गतिविधि निवारक कानून की तरह अफस्पा जैसे कठोर कानून उग्रवाद का दमन करने के लिए 1958 से लागू हैं। 27 नवंबर, 1990 को असम में यह कानून लागू किया गया। उसके बाद कम से कम तीन संपादकों को उग्रवादी संगठन उल्फा का समर्थन करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इससे भी पता चलता है कि इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को किस हद तक निरंकुशता हासिल है। यह जरूरी है कि उन प्रावधानों के औचित्य पर पुनर्विचार किया जाए जो इस तरह की घटनाओं के लिए गुंजाइश पैदा करते हैं।

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