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संपादकीय: लापरवाही की हद

चीन के बाद इटली, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन सहित कई देशों में कोरोना जिस तरह से कहर बरपा रहा है, उससे पूरी दुनिया ने सबक लिया और महामारी को फैलने से रोकने के लिए सबसे पहले पूर्ण बंदी जैसा कदम उठाया। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अभी भी पूर्ण बंदी को फिजूल की कवायद करार दे रहे हैं।

Author Published on: March 31, 2020 3:03 AM
डोनाल्ड ट्रंप (एएनआई इमेज)

कोरोना महामारी से निपटने को लेकर अमेरिकी प्रशासन जिस रास्ते पर चल रहा है, उससे तो यह लग रहा है कि दुनिया में इस मुल्क से ज्यादा लापरवाह शायद ही कोई देश होगा, जो अपने हजारों लोगों की जान की कीमत पर अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के सपने देख रहा है। अमेरिका में कोरोना संक्रमित लोगों का आंकड़ा डेढ़ लाख की संख्या को छूने जा रहा है और मरने वालों की संख्या तीन हजार के पास पहुंच चुकी है।

फिर भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप देश में लॉकडाउन यानी पूर्ण बंदी करने के पक्ष में नहीं हैं। ट्रंप को लग रहा है और जैसा कि वे साफ कह भी चुके हैं कि पूर्ण बंदी का मतलब है अमेरिका की अर्थव्यवस्था को भारी धक्का लगना, जो पहले ही से संकटों का सामना कर रही है। इसलिए नागरिकों के जीवन की कीमत पर देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने का फैसला न केवल अमानवीय है, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति के अविवेकी फैसले का परिचायक भी माना जाएगा। इस वक्त दुनिया में कुछ ही देश होंगे जो पूर्ण बंदी जैसे अहम कदम को उठाने से बचना चाह रहे हैं।

चीन के बाद इटली, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन सहित कई देशों में कोरोना जिस तरह से कहर बरपा रहा है, उससे पूरी दुनिया ने सबक लिया और महामारी को फैलने से रोकने के लिए सबसे पहले पूर्ण बंदी जैसा कदम उठाया। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अभी भी पूर्ण बंदी को फिजूल की कवायद करार दे रहे हैं। उन्होंने बचाव के लिए सिर्फ लोगों से दूरी बनाए रखने और बिना काम बाहर न निकलने जैसे कदम को ही पर्याप्त माना है। और सामाजिक दूरी का यह कदम भी सिर्फ पंद्रह अप्रैल तक के लिए था, जिसे हालात की गंभीरता को देखते हुए तीस अप्रैल तक बढ़ाना पड़ा है। जबकि हकीकत यह है कि दुनिया के सबसे ताकतवर इस मुल्क की हालत इटली से भी बदतर होने के स्पष्ट संकेत हैं।

वाइट हाउस के चिकित्सा सलाहकार डॉक्टर एंथनी फॉसी साफ कह चुके हैं कि पूर्ण बंदी नहीं होने से अमेरिका में कोरोना से मरने वालों की संख्या दो लाख तक पहुंच सकती है। अमेरिकी प्रशासन के एक शीर्ष अधिकारी की यह चेतावनी कंपकंपी पैदा कर देने वाली है। जाहिर है, अमेरिका सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है और अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी तबाही देख सकता है। ट्रंप भी इस बात को समझ चुके हैं और इसीलिए उन्होंने कहा भी है कि अगर हम मरने वालों की संख्या को एक लाख पर भी रोक पाए तो यह बड़ी उपलब्धि होगी।

कोरोना फैलने और इसकी गंभीरता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सबसे पहले पूर्ण बंदी करने का ही सुझाव दिया था। लेकिन इटली, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों ने इसे तवज्जो नहीं दी। अब ब्रिटेन में संकट गहराता जा रहा है और वहां के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन कह भी चुके हैं कि अभी हालात और बदतर हो सकते हैं। ब्रिटेन में जिस तेजी से कोरोना के मामले सामने आ रहे हैं और मरने वालों का आंकड़ा बढ़ रहा है, वह बड़ी आपदा की ओर इशारा कर रहा है।

सवाल यह है कि जानते-बूझते भी अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने आखिर पूर्ण बंदी को अहमियत क्यों नहीं दी? दुनिया में जब ऐसी संक्रामक महामारियों ने हमला किया है तो उन देशों ने बचाव का पहला उपाय संक्रमित लोगों को दूसरों से अलग करने का अपनाया। यह हैरत की बात है कि ज्ञान-विज्ञान से लेकर हर से संपन्न ये देश अपनी ही लापरवाही का खमियाजा भुगत रहे हैं।

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