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राजनीतिः मिलावटखोरों पर कसती नकेल

जांच में पाया है कि इस्तेमाल होने वाले अधिकांश ब्रेड ब्रांडों में पोटेशियम ब्रोमेट और पोटेशियम आयोडेट की मौजूदगी सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। विश्व के कई देशों में इन रसायनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है और इनकी बिक्री पर सजा का प्रावधान है। इनके इस्तेमाल से मुंह, सिर, गर्दन में जलन और त्वचा संबंधी बीमारियां पैदा होती हैं और पेट दर्द, तंत्रिका तंत्र व अन्य संवेदनशील अंगों को भी नुकसान पहुंचता है।

Author July 12, 2018 5:02 AM
आज जरूरत इस बात की है कि विकसित देशों की तरह भारत में भी खाद्य संरक्षा के मानक तय हों, ताकि लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

अभिजीत मोहन

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) ने खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों को न्यूनतम सात वर्ष और अधिकतम उम्रकैद की सजा के साथ न्यूनतम दस लाख रुपए तक दंड देने का प्रावधान सुनिश्चित किए जाने की सिफारिश की है। यह एक स्वागतयोग्य कदम है। एफएसएसएआइ ने खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए नई धारा को शामिल करने के प्रस्ताव के साथ यह भी कहा है कि कोई भी व्यक्ति, जो खाद्य पदार्थ में किसी ऐसे पदार्थ की मिलावट करता है जिससे मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो वह कड़ी सजा का हकदार है। गौरतलब है कि प्राधिकरण ने खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए कड़ी सजा का प्रस्ताव उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के बाद किया है। प्रस्ताव में खाद्य सुरक्षा एवं मानक कानून में कुल एक सौ संशोधन सुझाए गए हैं और प्रस्तावित अन्य संशोधनों में राज्य खाद्य सुरक्षा प्राधिकरणों का गठन भी शामिल है, ताकि कानून पर सख्ती से अमल हो सके। प्रस्ताव में सिफारिश की गई है कि निर्यात किए जाने वाले खाद्य पदार्थ भी खाद्य सुरक्षा एवं मानक कानून के दायरे में लाए जाएं। बता दें कि अभी सिर्फ वही खाद्य पदार्थ इस दायरे में हैं जिनकी बिक्री घरेलू बाजार में की जाती है।

पिछले साल विधि आयोग ने भी खाद्य पदार्थों में मिलावट को गंभीर मानते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, जिसमें मिलावट के अपराध में कड़े दंड का प्रावधान किया गया था। विधि आयोग ने यह रिपोर्ट सरकार द्वारा खाद्य पदार्थों में मिलावट संबंधी आइपीसी की धारा 272 और 273 में संशोधन पर विचार करने के निर्देश के उपरांत तैयार की थी, जिसमें मिलावटखोरी के पैमाने के मुताबिक सजा और आर्थिक दंड का प्रावधान है। इस सिफारिश में कहा गया है कि अगर मिलावट से कोई नुकसान नहीं होता है तब भी छह महीने तक की कैद और एक लाख रुपए का जुर्माना होगा। अगर मिलावट से थोड़ी क्षति पहुंचती है तो एक साल तक का कारावास और तीन लाख तक जुर्माने की सजा होगी। इसी तरह अगर मिलावट से ज्यादा नुकसान होता है तो छह साल तक का कारावास और पांच लाख रुपए का जुर्माना होगा। मिलावट से मौत के मामले में कम से कम सात साल का कारावास, जिसे उम्रकैद में भी तब्दील किया जा सकता है और दस लाख रुपए का जुर्माना भी होगा।

विधि आयोग ने यह भी सुनिश्चित किया कि अगर अदालत मौत के मामले में उम्रकैद से कम सजा देती है तो उसे अपने फैसले में इसका कारण दर्ज कराना होगा। यही नहीं, जुर्माना व्यक्ति को हुए नुकसान और चिकित्सा खर्च और पुनर्वास की जरूरत को पूरा करने लायक होना चाहिए और इस कानून में अभियुक्त पर लगाए गए जुर्माने का भुगतान भी पीड़ित को होना चाहिए। अब अगर सरकार एफएसएसएआइ और विधि आयोग की सिफारिशों को स्वीकार लेती है तो मिलावटखोरी के खेल पर नकेल कसेगी और मिलावाटखोरों को कड़ी सजा और आर्थिक दंड भुगतना होगा।

यह किसी से छिपा नहीं है कि दूध सहित तकरीबन सभी खाद्य पदार्थों में धड़ल्ले से मिलावट होती है। सिंथेटिक और मिलावटी दूध और उसके उत्पाद यूरिया, डिटर्जेंट, रिफाइंड आयल, कास्टिक सोडा और सफेद पेंट से बनाए जाते हैं। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने माना है कि दूध में घातक रसायन मिलाए जा रहे हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायर्नमेंट (सीएसई) भी खुलासा कर चुका है कि डबल रोटी में भी कैंसर पैदा करने वाले पोटेशियम ब्रोमेट जैसे खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है। सीएसई ने जांच में पाया है कि इस्तेमाल होने वाले अधिकांश बे्रड ब्रांडों में पोटेशियम ब्रोमेट और पोटेशियम आयोडेट की मौजूदगी सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। विश्व के कई देशों में इन रसायनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है और इनकी बिक्री पर सजा का प्रावधान है। इनके इस्तेमाल से मुंह, सिर, गर्दन में जलन और त्वचा संबंधी बीमारियां पैदा होती हैं और पेट दर्द, तंत्रिका तंत्र व अन्य संवेदनशील अंगों को भी नुकसान पहुंचता है। अच्छी बात है कि सीएसई के इस खुलासे के बाद भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) ने पोटेशियम ब्रोमेट को खाद्य कारोबार में प्रयुक्त होने वाले ग्यारह हजार मिश्रणों की सूची से हटा कर इस पर प्रतिबंध का फैसला किया है।

एसोचैम अपनी रिपोर्ट में कह चुका है कि देश में बिक रहे साठ से सत्तर फीसद फिटनेस या फूड सप्लीमेंट नकली हैं और वे बिना रोक-टोक के बाजार में बेचे जा रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक देश की तकरीबन अठहत्तर फीसद युवा इस पूरक आहार का इस्तेमाल भोजन, दवा और चूर्ण के रूप में कर रहे हैं। पूरक आहार से जुड़ी कंपनियां अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए किस्म-किस्म के हथकंडे अपना रही हैं। उनकी ओर से दावा किया जाता है कि उनके उत्पादों के इस्तेमाल से बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर को ऊर्जा व ताकत मिलती है। चूंकि देश का युवा वर्ग अपनी सेहत के लिए काफी संजीदा है, ऐसे में कंपनियां अपने दावे और दलीलों के जरिए उन्हें लुभाने में सफल हो रही हैं।

नतीजा उनका बाजार लगातार बढ़ रहा है। एक शोध के मुताबिक इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए विटामिन और खनिजों के पूरक आहार में आने वाले वर्षों में काफी संभावनाएं हैं। इसलिए और भी जरूरी हो जाता है कि उन उत्पादों का व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से परीक्षण हो। वर्तमान में इस बाजार में विटामिन और खनिजों वाले पूरक आहार की हिस्सेदारी चालीस फीसद, औषधीय पूरक आहारों की तीस फीसद और प्रो-बायोटिक की दस फीसद है। इन उत्पादों की बढ़ती मांग के परिणामस्वरूप ही नकली खाद्य पदार्थों की खपत धड़ल्ले से हो रही है। यही नहीं, ये उत्पाद बिना किसी सरकारी संस्थान से मान्यता लिए ही बेचे जा रहे हैं। इन उत्पादों की पहचान करना बहुत आसान नहीं है। कुछ साल पहले मैगी में भी सीसा और मोनोसोडियम ग्लूटामैट जैसे घातक रसायन पाए गए थे और परीक्षण के बाद अंतत: सरकार को बिक्री पर रोक लगानी पड़ी।

खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए खाद्य संरक्षा और मानक कानून 2006 में पारित हुआ था और इसके नियमन को 2011 में अधिसूचित किया गया। इस कानून के मुताबिक मिलावटी व नकली माल की बिक्री करने और भ्रामक विज्ञापन पर संबंधित प्राधिकारी जुर्माना कर सकता है। यही नहीं, अप्राकृतिक और खराब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर आर्थिक दंड का भी प्रावधान है। मिलावटखोरी के विरुद्ध दुनिया के कई देशों में कड़े दंड का प्रावधान है। अमेरिका की खाद्य संरक्षा व्यवस्था दुनिया के बेहतरीन तंत्रों में शामिल है। इसे स्थानीय, राज्य और केंद्रीय स्तर पर लागू किया गया है। यहां का फूड एंड ड्रग एडमिनिस्टेशन फूड कोड प्रकाशित करता है।

इसमें खाद्य संरक्षा के मानक तय किए गए हैं, जिनका उल्लंघन गैरकानूनी है। इसी तरह आस्ट्रेलियाई फूड अथॉरिटी उपभोक्ताओं तक शुद्ध खाद्य पदार्थ पहुंचाने के लिए खाद्य कारोबार पर खाद्य संरक्षा मानकों को प्रभावपूर्ण तरीके से लागू करने का काम करती है। जर्मनी में उपभोक्ता अधिकार और खाद्य संरक्षा विभाग इस मामले को देखता है। पूरे जर्मनी में भोज्य पदार्थ बेचने पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है, लेकिन वह कानून के मुताबिक तय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन भारत में स्थिति उलट है। खाद्य संरक्षा और मानक कानून मजाक बन कर रह गया है और तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण मिलावटखोरों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। इससे उनके हौसले बुलंद हैं। आज जरूरत इस बात की है कि विकसित देशों की तरह भारत में भी खाद्य संरक्षा के मानक तय हों, ताकि लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

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