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समग्र शिक्षा और चुनौतियां

भारत को एशियाई देशों से ही सबक लेकर अपनी तकनीकी कुशलता में विस्तार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, क्षमतावर्धन, उच्च कौशल प्रशिक्षण, उन्नत शैक्षिक विकल्पों की खोज, प्रौद्योगिकी उन्नयन और आधारभूत संरचना सहित प्रयोगशालाओं की मौजूदा स्थिति में सुधार के जरिए खुद को इस स्थिति से उबारने में तेजी से पहल करनी चाहिए।

Author Updated: February 24, 2021 9:02 AM
New educationसांकेतिक फोटो।

दर्शनी प्रिय

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों को समग्र शिक्षा अभियान के संशोधित रूप के साथ जोड़ने की तैयारी शुरू हो गई है। इसका उद्देश्य स्कूली शिक्षा में सीखने के समान अवसरों के रूप में विद्यार्थियों के लिए स्कूल की गुणवत्ता में सुधार करना और शिक्षण के समान परिणामों को प्राप्त करना है। कोरोना महामारी के दौरान स्कूल बंद रहने की वजह से विद्यार्थियों को घर पर ही आॅनलाइन शिक्षा प्रदान करने के लिए डिजिटल शिक्षा पर भी दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं।

इसमें सीखने की प्रक्रिया की निगरानी, बच्चों के स्कूल से दूसरे स्कूल में प्रवेश को सुगम बनाने के साथ उर्दू और हिंदी भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति और शिक्षकों के क्षमता विकास प्रशिक्षण कार्य पर खास ध्यान दिया जाएगा। प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्षन का कहना था- शिक्षा का अंतिम उत्पाद, एक मुक्त रचनात्मक मानव होना चाहिए, जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ाई लड़ सके, साथ ही व्यक्ति को व्यावसायिक तौर पर खड़ा कर सके। दरअसल असली शिक्षा यही है।

वास्तव में शिक्षा ऐसी हो जो न केवल व्यावसायिकता से जोड़े, बल्कि स्वावलंबन से भी जोड़े। अगर इस उक्ति के आलोक में देखें तो ई-शिक्षा का उचित उपयोग शहरी और ग्रामीण, स्त्री-पुरुष, उम्र और विभिन्न आय समूहों के बीच डिजिटल भेदभाव और शैक्षिक परिणाम में अंतर को समाप्त करेगा।

भारत में शिक्षा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21(ए) के तहत मूल अधिकार के रुप में शामिल है। दो दिसंबर, 2002 को संविधान में छियासीवां संशोधन किया गया था जिसके तहत शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया। आजादी के बाद से देश में राधाकृष्णन आयोग (1948-49) से लेकर कोठारी आयोग (1964) की सिफारिशों के आलोक में देश में शिक्षा की रीति-नीति में आधारभूत विस्तार होते रहे, जिसके मूल में कभी सामाजिक व नैतिक शिक्षा, तो कभी माध्यमिक शिक्षा को विस्तारवादी आधार बनाया गया।

शिक्षा नीति का निर्धारण करने के लिए 1964 में गठित कोठारी आयोग का सबसे प्रमुख सुझाव था कि देश के सकल घरेलू उत्पाद का छह फीसद शिक्षा पर खर्च किया जाए। वर्ष 2014-15 से 2019-20 तक शिक्षा पर खर्च कुल केंद्रीय बजट का साढ़े तीन से साढ़े चार फीसद के बीच रहा। बहुत से ऐसे क्षेत्र है जहां नई शिक्षा नीति से बड़े बदलाव की उम्मीद है। मसलन- नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को मजबूत बनाने की दिशा में काम किया जा सकेगा, जिससे कॉलेज और यूनिवर्सिटी प्रवेश परीक्षाओं को आयोजित करने में आसानी होगी।

भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों में शोध संबंधी कई समस्याएं हैं। इसमें पारदर्शिता का अभाव और प्रतिस्पर्धी-समीक्षा और शोध निधियों की कमी प्रमुख है। इससे छात्रों सहित शोध की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ रहा है। इस पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। योग्यता के आधार पर नियुक्तियों और कैरियर प्रबंधन के माध्यम से संकाय स्थिति और संस्थागत नेतृत्व की अखंडता की पुन: पुष्टि करना भी एक चुनौती है।

देश भर में उच्च शिक्षा के तीस प्रतिशत खाली पड़े पदों को भरना, शिक्षण केंद्रों में आधारभूत संरचना का त्वरित विकास, योग्य शिक्षकों की भर्ती सहित भारी फीस आदि में कटौती भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। आज भी हमारा तंत्र संसाधन और रोजगारपरक शिक्षा के अभाव से जूझ रहा है। कई विश्वविद्यालयों में पिछले तीन दशकों से पाठ्यक्रमों में कोई बदलाव ही नहीं किया गया है।

ऐसा नहीं है कि इसे सुधारने के प्रयास नहीं किए जा रहे। पिछले चार सालों में सालों में सात भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), सात भारतीय प्रंबध संस्थान (आइआइएम), चौदह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) या तो स्थापित किए गए हैं या स्थापनाधीन हैं। लेकिन इनमें से भी ज्यादातर संस्थान अभी तक शुरू ही नहीं हुए हैं और अगर शुरू भी हो गए हैं तो शिक्षकों की भारी कमी झेल रहे हैं।

देश की आबादी में युवाओं की बड़ी भूमिका है। लगभग इक्यावन प्रतिशत आबादी युवा वर्ग की है, लेकिन हालत यह है कि बारह-चौदह प्रतिशत ही उच्च शिक्षा के लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेते हैं। उच्च शिक्षा के लिए बजट का यदि चौबीस प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र को दिया जाए तो काफी सुधार होने की संभावना है।

भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए हर साल सात अरब डॉलर यानी करीब तियालीस हजार करोड़ रुपए खर्च करते हैं। हमारे यहां मौलिक शोध पर बहुत कम खर्च होता है और तमाम शैक्षिक संस्थान भ्रष्टाचार से जूझ रहे है। आंकड़े बताते हैं कि इतने भारी-भरकम रकम खर्च और व्यापक शैक्षिक नीति के बावजूद अठारह से चौबीस वर्ष के महज 12.4 प्रतिशत विद्यार्थी ही विश्वविद्यालयों में प्रवेश पा रहे हैं। देश के बेरोजगार युवाओं की फौज को नवाचार और कौशलयुक्त ज्ञान देकर डिग्री के साथ-साथ तकनीकी और व्यावसायिक कौशल से भी युक्त करना होगा, ताकि वे स्वावलंबन की दिशा में बढ़ सके।

इसके लिए उच्च शिक्षण संस्थानों, सांयकाल कोर्स, आॅनलाइन कोर्स इत्यादि के माध्यम से इस जरूरत को पूरा करने के तरीकों पर विचार किया जा सकता है। देश भर में पैरा-टीचर्स (शिक्षाकर्मी, शिक्षामित्र) व्यवस्था को बंद कर स्थायी शिक्षकों की भर्ती सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसी प्रकार व्यावसायिक शिक्षा को सभी शैक्षिक संस्थानों- स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के साथ एकीकृत किया जाए।

भारत को उन सभी तकनीकी क्षेत्रों में बढ़त लेने का प्रयास करना होगा जो वर्तमान में तेजी से विकसित हो रहे हैं, जैसे- कृत्रिम बौद्धिकता, 3-डी तकनीक, तकनीकी शिक्षा में बड़े डेटा का विश्लेषण और मशीनों से सीखना, जैव तकनीक, नैनो तकनीक, तंत्रिका विज्ञान और ऐसे ही अन्य क्षेत्र। इन विषयों को विज्ञान की तीनों राष्ट्रीय अकादमियों और इंडियन नेशनल एकेडमी आॅफ इंजीनियरिंग के सहयोग से पाठ्यक्रम में शामिल करते हुए एक प्रभावशाली पाठ्यक्रम बनाने की जरूरत है। इसके लिए कार्यरत और सेवा निवृत वैज्ञानिकों की सेवाएं ली जानी चाहिए।

हालांकि शिक्षा की वर्तमान स्थिति में क्रमिक परिवर्तन के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, मसलन- ब्लैक बोर्ड से डिजिटल बोर्ड की ओर बढ़ना, सर्वशिक्षा अभियान का दायरा आठवीं कक्षा से बढ़ा कर बारहवीं कक्षा तक करना, शिक्षा बजट में वृद्धि, शैक्षिक आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भारी राशि का आवंटन और राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार प्रधानमंत्री शोध फेलोशिप योजना की शुरुआत आदि।

लेकिन उचित क्रियान्वयन, अनुरक्षण और विकास की मंद गति के चलते स्थितियां जस की तस हैं। निजी उच्च शिक्षा संस्थानों को समान प्रोत्साहन और सशक्तीकरण, खुले और दूरस्थ शिक्षण की गुणवत्ता में परिवर्तनकारी बदलाव और उपलब्धता का प्रसार, नई संस्थागत वास्तुकला को उत्प्रेरित करने के लिए मिशन नालंदा और तक्षशिला बहु-अनुशासनिकता और अंतर-अनुशासनिकता के लिए आवश्यक विभागों को स्थापित करना  है।

और इन्हें सशक्त बनाना, उदार शिक्षा के साथ गहन विशेषज्ञता पर जोर, सार्वजनिक धन का निर्धारण करने के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी प्रणाली, नए संस्थागत ढ़ांचे का विकास, विश्वविद्यालयों में विषयों के बीच बढ़ती खाई को पाटना, भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित करना और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा हेतु एक अंतर विश्वविद्यालय केंद्र खोलना जैसे कई ऐसे कार्य हैं, जिन्हें लेकर सरकारी नीतियों में व्यापक बदलाव की जरुरत थी।

उम्मीद है कि नई समग्र शिक्षा नीति की पहल से ये बड़े बदलाव लाए जा सकेंगे। भारत को एशियाई देशों से ही सबक लेकर अपनी तकनीकी कुशलता में विस्तार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, क्षमतावर्धन, उच्च कौशल प्रशिक्षण, उन्नत शैक्षिक विकल्पों की खोज, प्रौद्योगिकी उन्नयन और आधारभूत संरचना सहित प्रयोगशालाओं की मौजूदा स्थिति में सुधार के जरिए खुद को इस स्थिति से उबारने में तेजी से पहल करनी चाहिए। तभी त्वरित शैक्षिक विकास की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।

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