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राजनीति: दीर्घकालिक विकास की चुनौतियां

एक महामारी भी हमें दीर्घकालिक विकास के प्रति सचेत कर सकती है और उसका रास्ता दिखा सकती है। इसलिए अब हमें विकास के उन तरीकों को त्यागने में देर नहीं करनी चाहिए जो जीवन के लिए संकट का कारण बन रहे हैं। जैसे हमें प्लास्टिक उपयोग से बचना होगा और पर्यावरण को बचाना होगा।

Author Updated: January 12, 2021 9:42 AM
Developmentसांकेतिक फोटो।

लालजी जायसवाल

विश्व के अनेक देशों ने अगले एक दशक यानी सन 2030 तक विश्व का परिदृश्य बदलने के उद्देश्य से दीर्घकालिक विकास के लक्ष्यों को अपनाया है। हालांकि दीर्घकालिक या कहें टिकाऊ विकास का ढांचा एक जटिल जरूरत है, परंतु यह कुछ विशेष लक्ष्यों की पूर्ति के लिए वरदान भी है। विकास के इस स्वरूप को सैद्धांतिक रूप में तो अपना लिया गया है, लेकिन व्यावहारिक रुप को अपनाने में हम आज भी लक्ष्य से कोसों दूर हैं।

टिकाऊ विकास का व्यावहारिक लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब हम अपने संसाधनों का परीक्षण करेंगे। उदारीकरण के युग में विकास एक बदलाव है, समाजों का बदलाव, संस्कृति का बदलाव, अर्थव्यवस्थाओं का बदलाव और मानव विकास का बदलाव। इसलिए विकास पोषणीय होना चाहिए, यानी हम विकास करते समय पर्यावरण का ध्यान रखें और संसाधनों को आगामी पीढ़ियों के लिए छोड़ दें।

आज जब समूचा विश्व कोरोना महामारी से प्रभावित है, तब दीर्घकालिक विकास के लक्ष्यों की चर्चा चारों ओर हो रही है। 1908 में गांधीजी ने हमें इसी का मार्ग दिखाया था। अपने ‘हिंद स्वराज’ में उन्होंने भौतिक वस्तुओं और सेवाओं के लिए हमारी खोज को देखते हुए मानव के भविष्य के लिए उत्पन्न खतरों को भी रेखांकित किया था।

उन्होंने कहा था कि प्रकृति हमें अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराती है, लेकिन लालच को पूरा करने के लिए नहीं। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि मनुष्य का लालच विकास के सभी पहलुओं को विकृत करता जा रहा है और जीवनशैली से स्थायित्व की अवधारणा पृथक होती जा रही है।

धारणीय जीवनशैली का अर्थ जीवन से उपभोक्तावाद को कम करना और सुख की जगह आनंद को तरजीह देना है, क्योंकि मनुष्य स्वभाव से सुखवादी और उपयोगितावादी होता है और ये दोनो ही प्रवृत्तियां दीर्घकालिक विकास के राह में बाधक है। आज मनुष्य के जीवन में उपभोक्तावाद का जहर इतना ज्यादा घुल चुका है कि वह प्रकृति के संसाधनों का अधिकतम दोहन कर लेना चाहता है, भले मानव जाति को इसके परिणाम कुछ भी क्यों न भुगतने पड़ें।

गौरतलब है कि उदारीकरण के बाद का युग आर्थिक संवृद्धि और प्रतिस्पर्धा का युग है, जिसमें केवल आर्थिक वृद्धि पर ही ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। लेकिन ध्यातव्य है कि दीर्घकालिक विकास के दो प्रमुख शत्रु हैं, एक आर्थिक वृद्धि की होड़ और दूसरा- तेजी से बढ़ती जनसंख्या। इसी का परिणाम है कि आज दीर्घकालिक विकास की अवधारणा और प्रयास वाधित हो रहे हैं और इसी वजह से समय-समय पर मनुष्य को प्रकृति का कोपभाजन भी होना पड़ रहा है, क्योंकि प्रकृति का दोहन करना मनुष्य अपना अधिकार मान बैठा है।

प्रकृति में आज ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसका मानव ने व्यापार न किया हो, फिर वह चाहे हवा हो अथवा पानी। उसका यही लालच आज समस्त मानव जाति के लिए काल बन कर अब तक विश्व भर में अठारह लाख लोगों की जान लील चुका है। मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया, यहां तक तो ठीक था, लेकिन पिछली तीन सदियों में प्रकृति का दोहन इतना ज्यादा बढ़ गया कि आज समूची धरती के लिए गंभीर संकट खड़ा हो गया है। मनुष्य ने बस्तियां बसाने के लिए धरती से जंगलों का सफाया कर दिया।

खेती तथा जमीन के लिए जंगलों में आग लगाई, प्राकृतिक संसाधनों का स्वामी बनने के लिए धरती को खोद डाला। जनसंख्या वृद्धि ने प्रदूषण फैलाया, पवन ऊर्जा के लिए पवन की गति को बाधित किया और अपनी आवश्यकता के लिए उद्योग-धंधे लगा कर प्रदूषण की समस्या खड़ी कर दी। आज दुनियाभर में नदियों का अस्तित्व गंभीर संकट में है।

एक वक्त में जल का सबसे बड़ा स्रोत रहीं नदियां आज विलुप्त होने के कगार पर हैं। बड़ी संख्या में नदियां प्रदूषण का संकट झेल रही हैं। प्रकृति के दोहन से मनुष्य को यह भरोसा हो गया था कि उसने प्रकृति को पूरी तरह पराजित कर दिया है। इन सभी प्रकृति विरोधी कार्यों से हम आर्थिक संबृद्धि तो दे सकते हैं लेकिन टिकाऊ विकास नहीं।

आज का दौर विशुद्ध उपभोक्तावाद का है, जिसकी वजह से मनुष्य अपना स्वत्व खोता चला जा रहा है और अर्थ केंद्रित हो गया है। हम पूंजीवाद को अपना सर्वस्व मान बैठे हैं, जिसमें प्रकृति के विनाश पर आर्थिक विकास की इमारत खड़ी होती है। ऐसे में यह दौर इस बात पर आत्मचिंतन करने का भी है कि आखिर हकीकत में पूंजीवाद ने हमें क्या प्रदान किया है? अगर वाकई गंभीरता से विचार करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि नतीजा यह निकलेगा कि वैश्वीकरण और इसकी आड़ में पनपी नई अर्थव्यवस्था की अवधारणा घातक ज्यादा साबित हुई है।

वैश्वीकरण ने ओजोन परत क्षरण, भूमंडलीय ताप में वृद्धि, विलुप्त होते प्राकृतिक संसाधन, वातावरण प्रदूषण और छद्म आर्थिक वृद्धि व प्रतिस्पर्धा और मानव विनाशक विषाणुओं के अलावा और कुछ नहीं दिया है। लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि कोरोना जैसी विनाशक महामारियों और आपदाओं ने मानव को चेतावनियां भी दी हैं। लेकिन लगता है हमने भी तक भी अपनी आंखें खोली नहीं हैं।

कोरोना महामारी से दुनिया में लाखों लोग मारे जा चुके हैं। करोड़ों इसकी चपेट में हैं। लेकिन ऐसी आपदाएं दुनिया का स्वरूप भी बदल रही हैं। आज कुछ ही समय में भारत सहित कई देश डिजिटल युग में प्रवेश कर चुके हैं। भारत जैसे देश ने संकट को अवसर में बदलते हुए आत्मनिर्भरता का रास्ता खोजने की कोशिश की।

देश में कई विशेष उत्पाद सामने आए, जिनका हम पहले आयात करते थे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मंद पड़ी अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना महामारी से ही आत्मनिर्भता का रास्ता अपनाने और जीवनशैली में बदलाव लाने की भी भरपूर सीख मिली है। लेकिन कहीं हम इस सबक को आने वाले समय में भुला न बैठें। यह भी सत्य है कि अगर मनुष्य इस महामारी से हासिल सबक को अपना लेता है तो समूचा जीवन एक आदर्शतम रूप में होगा और विकास भी आर्थिक संवृद्धि मात्र न होकर सतत और दीर्घकालिक होगा। ऐसा कर हम पुन: अपने आदर्श जीवन की ओर लौट सकते हैं।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि एक महामारी भी हमें दीर्घकालिक विकास के प्रति सचेत कर सकती है और उसका रास्ता दिखा सकती है। इसलिए अब हमें विकास के उन तरीकों को त्यागने में देर नहीं करनी चाहिए जो जीवन के लिए संकट का कारण बन रहे हैं। जैसे हमें प्लास्टिक उपयोग से बचना होगा और पर्यावरण को बचाना होगा।

डेनिस डोनेला (डेनमार्क) ने अपने शोध पत्र में कहा था कि अगर एक वृक्ष काटा जाए तो एक वृक्ष लगाना साम्यावस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। लेकिन अगर हम एक वृक्ष काटते है और बदले में पांच पौधे भी लगाते हैं, पर उसकी नियमित देखभाल नहीं करते तो यह पर्यावरण विदोहन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अगर मनुष्य जीवन में धारणीय शैली को अपना ले तो विकास स्वयं ही धारणीय बनता चला जायेगा।

स्पष्ट है कि मनुष्य पर्यावरणीय स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा कर अपने आयुष्मान होने की कल्पना नहीं कर सकता। हमें नही भूलना चाहिए कि धारणीय विकास एक विशाल यज्ञ की तरह है, जिसमें समाज के हर वर्ग को अपनी आहुतियां डालनी होंगी। इस क्षेत्र के अगुआ देशों के अनुभवों से ज्ञान लेकर अगर हम सरकार और समाज की साझेदारी करने में सफल हो गए, तो धरती पर जीवन बचाने में कामयाब हो सकेंगे।

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