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राजनीति: विदेशी निवेश – दशा और दिशा

कई आर्थिक मापदंडों पर भारत अभी भी चीन से आगे है। भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और जैव तकनीकी के क्षेत्रों में सबसे तेज उभरता हुआ देश भी है। भारत की श्रम शक्ति और लागत का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है।

चीन से निकलने वाले निवेश का ज्यादा प्रवाह एशियाई देशों की ओर होगा और भारत ऐसे निवेश को प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा लाभार्थी देश बन सकता है।

जयंतीलाल भंडारी
कोविड-19 के बाद की आर्थिक दुनिया की तस्वीर कैसी होगी, रेटिंग एजेंसी नोमुरा ने इसकी तस्वीर पेश की है। ‘कोविड-19 के बाद की दुनिया’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वक्त चीन के प्रति दुनिया के बाकी देशों में जो नफरत पैदा हो गई है, उसका पहला असर यह होगा कि चीन से वैश्विक निवेश का कुछ हिस्सा बाहर निकलेगा। चीन से निकलने वाले इस निवेश का ज्यादा प्रवाह एशियाई देशों की ओर होगा और भारत ऐसे निवेश को प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा लाभार्थी देश बन सकता है।

गौरतलब है कि इन दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ-साथ दुनिया के विकसित देशों के राष्ट्र प्रमुख चीन पर अपने देशों की कंपनियों की निर्भरता खत्म करने के अगुवा बन गए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, जापान सहित कई देशों ने अपनी कंपनियों को चीन से निकालने की कवायद शुरू कर दी है। पिछले दिनों विभिन्न वैश्विक संगठनों की रिपोर्टों से यह बात निकल कर आई है कि चीन में कार्यरत कई देशों की एक हजार से अधिक दिग्गज कंपनियां अपना बहुत कुछ निवेश समेट कर और उत्पादन बंद कर भारत का रुख करना चाहती हैं।

जर्मनी की फुटवियर निमार्ता कंपनी कासा एवर्ज जीएमबीएच के निदेशक मंडल ने घोषणा की कि वह अपनी इकाई चीन से निकाल कर भारत के शहर आगरा में स्थापित करेगा। यह इकाई करीब एक सौ दस करोड़ रुपए के निवेश से शुरू की जाएगी। इसी तरह लावा इंटरनेशनल ने भी चीन में कार्यरत अपने कारोबार को भारत में स्थानांतरित करने का एलान कर दिया है।

निसंदेह कोविड-19 के कारण दुनियाभर में चीन के प्रति बढ़ती नाराजगी के बीच भारत ने कोरोना से लड़ाई में सबके प्रति सहयोग पूर्ण रवैया अपना कर पूरी दुनिया में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई है। ऐसे में भारत ने वैश्विक निवेश, कारोबार और निर्यात बढ़ने की नई संभावनाओं को साकार करने के लिए प्रोत्साहन और सुविधाओं की रणनीति तैयार की है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए प्लग एंड प्ले (आएं और काम शुरू करें) मॉडल को साकार करने के मद्देनजर उद्योगों के लिए बुनियादी ढांचे को उन्नत बनाने के लिए मॉडिफाइड इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन स्कीम (एमआइआइयूएस) में बदलाव करने और विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में गैर-उपयोगी खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल करने के संकेत दिए हैं।

यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि चीन से बाहर निकलने वाली वैश्विक कंपनियों को भारत में काम शुरू करने के लिए सब कुछ तैयार मिलेगा और उद्योग सीधे उत्पादन शुरू करने की स्थिति में होंगे। नई रणनीति के तहत सरकार ने देश में वैश्विक निवेश और विनिर्माण गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए दस बड़े क्षेत्रों की पहचान की है। इनमें बिजली, दवा, चिकित्सा उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक सामान, भारी मशीन निर्माण, सौर उपकरण, चमड़ा उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण, रसायन और कपड़ा उद्योग शामिल हैं।

कई आर्थिक मापदंडों पर भारत अभी भी चीन से आगे है। भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और जैव तकनीकी के क्षेत्रों में सबसे तेज उभरता हुआ देश भी है। भारत की श्रम शक्ति और लागत का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है। भारत के पास पैंतीस साल से कम उम्र की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है। ये सब विशेषताएं भारत को चीन से निकलने वाले निवेश और कारोबार के मद्देनजर दूसरे देशों की तुलना में अधिक उपयुक्त और आकर्षक बनाती हैं। इसके अलावा सरकार ने आर्थिक सुधारों को तेजी से बढ़ाया है।

वाणिज्य-व्यापार के क्षेत्र में सुधार किए हैं, निर्यात बढ़ाने और करों व ब्याज दरों में बदलाव जैसे अनेक क्षेत्रों में रणनीतिक कदम उठाए हैं। ग्रामीण क्षेत्र में बुनियादी ढांचा विकसित करने का काम भी तेज किया है। उत्पादकों और श्रमिकों के हितों को देखते हुए श्रम कानूनों में संशोधन किए गए हैं। निवेश और विनिवेश के नियमों में परिवर्तन भी किए गए हैं। पिछले साल सितंबर में कारपोरेट कर में भारी कटौती भी इसी दिशा में बड़ा कदम था।

ऐसे वक्त में जब कोरोना की वजह से भारत के लिए वैश्विक निवेश, वैश्विक निर्यात और दुनिया का नया कारखाना बनने की प्रबल संभावनाएं बन रही हैं, तब इन्हें साकार करने के लिए हमें शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मापदंडों पर आगे बढ़ना होगा। अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण की रफ्तार तेज करनी होगी। सरकार को निर्यात प्रोत्साहन के लिए और अधिक कारगर कदम उठाने होंगे।

इसमें विनिर्माण क्षेत्र की अहम भूमिका सुनिश्चित करनी होगी। बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर अपने उत्पादों की उत्पादन लागत कम करनी होगी। देश के उद्योग-व्यवसाय में कौशल प्रशिक्षित युवाओं की मांग और आपूर्ति में लगातार बढ़ता अंतर दूर करना होगा। इसके अलावा, भारत आपूर्ति शृंखला की सुविधा और अन्य पूरक बुनियादी ढांचे की क्षमता भी बढ़ानी होगी।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के साथ सबसे ज्यादा जोर देश से निर्यात बढ़ाने पर देना होगा। देश में करीब ढाई सौ विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) के तहत पांच हजार से ज्यादा औद्योगिक इकाइयां काम कर रही हैं। सेज में करीब साढ़े पांच लाख करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में सेज इकाइयों से करीब 7.85 लाख करोड़ रुपए का निर्यात किया गया था। विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों में पाया गया है कि सेज से निर्यात बढ़ाने के लक्ष्य की प्राप्ति संतोषजनक नहीं रही।

भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में जितने सेज हैं, उनमें आधे से अधिक बेकार पड़े हैं और निर्यात बढ़ाने में उपयोगी साबित नहीं हो पाए हैं। ऐसे में सेज को प्रभावी बना कर वैश्विक कंपनियों को सेज की सुविधाओं से लाभान्वित कर दवाओं सहित कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, कपड़ा, ज्वैलरी, चमड़ा और इसके उत्पाद, कालीन और मशीनी उत्पाद जैसी कई वस्तुओं के निर्यात की संभावनाएं साकार की जा सकती हैं।

इसी तरह वैश्विक निवेश को आकर्षित करने के लिए भी बंदरगाहों के आसपास तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) की स्थापना को मूर्तरूप देने की जरूरत है। कई रिपोर्टों में यह पाया गया है कि सेज के उत्पादन को किसी नजदीकी बंदरगाह तक ले जाने में बड़ी समस्या आती है। ऐसे में यदि देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर दो-दो, तीन-तीन तटीय आर्थिक क्षेत्रों को उपयुक्त बुनियादी ढांचे के साथ विकसित किया जाए तो इससे आपूर्ति की समस्या काफी सीमा तक दूर हो सकती है। इससे विदेशों से कच्चे माल के आयात और तैयार माल के निर्यात में आसानी हो सकती है।

विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने कई कोविड-19 के बीच सरकार ने उत्पादकता संबद्ध प्रोत्साहन योजना (पीएलआई), इलेक्ट्रॉनिक्स कलपुर्जा एवं सेमीकंडक्टर्स के लिए प्रोत्साहन योजना (एसपीईसीएस), संशोधित इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण संकुल योजना जैसे कई कदम उठाए हैं। इससे भी वैश्विक निवेशक कंपनियाँ भारत की ओर आकर्षित हो सकेंगी।

कोविड-19 की वजह से चीन के प्रति बढ़ती हुई वैश्विक नाराजगी के मद्देनजर भारत सरकार की रणनीति ऐसी होनी चाहिए कि विदेशी कंपनियां भी यहां आकर निवेश करें और घरेलू उद्योगों का भी पूरा ध्यान रखा जाए। घरेलू उद्योगों को बढ़ावना दिए बिना हम आत्मनिर्भरता की ओर कैसे बढ़ पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। इसलिए विदेशी निवेश और घरेलू उद्योगों के बीच संतुलन भी जरूरी है। इसकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

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