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राजनीतिः चौपट शिक्षा और बेरोजगारी

बेरोजगारी का एक बड़ा कारण गुणवत्ता हीन उच्च शिक्षा है। देश में तेजी से उच्च शिक्षण संस्थान खुलते जा रहे हैं, किंतु वहां पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाओं का अभाव है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में डिग्रियां लिए विद्यार्थियों में जब तक अपने कार्य-कौशल का ज्ञान नहीं होगा, तब तक उन्हें मात्र डिग्री के आधार पर कोई भी बड़ी व्यावसायिक संस्था अपने यहां काम पर कैसे रख सकती है?

Author October 8, 2018 3:51 AM
श में राज्यों और केंद्र सरकार के तमाम विभागों में पदों में कटौती के कारण सरकारी नौकरियां घटी हैं।

सौरभ जैन

देश में बढ़ती बेरोजगारी गंभीर चिंता का विषय है। हालात इसलिए भी विस्फोटक हैं, क्योंकि उच्च शिक्षित युवाओं की तादाद में तेजी से इजाफा हो रहा है। लेकिन नौकरियां नहीं हैं। हालांकि इसका एक बड़ा कारण यह है कि गुणवत्ता हीन उच्च शिक्षा ने डिग्रीधारियों की तादाद तेजी से बढ़ाई है। ऐसे में वे शिक्षित तो हैं, किंतु उनकी शिक्षा तय पाठ्यक्रम के मानकों पर खरी नहीं उतरती और नतीजा यह होता है कि रोजगार नहीं मिल पाता। दूसरी ओर, जिनकी शिक्षा रोजगार पाने के पैमानों पर खरी उतरती भी है, वे भी आज के समय में बेरोजगार हैं। वर्तमान में सरकारी नौकरियों की संख्या में भी कमी आई है, जिसके चलते भी एक बड़ा वर्ग हताश है। देश में राज्यों और केंद्र सरकार के तमाम विभागों में पदों में कटौती के कारण सरकारी नौकरियां घटी हैं।

आज के समय में अथक परिश्रम से उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त होता है। लेकिन वहां मोटी फीस भर कर उत्तीर्ण हो जाने के बाद भी जब कहीं संतोषजनक नौकरी नहीं मिल पाती, तब यह एक उच्च शिक्षित युवा के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण बन जाता है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश पुलिस ने कार्यालय-सेवक / पत्र वाहक के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। पुलिस विभाग में पत्र वाहक का कार्य फाइलों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना होता है। इस पद के लिए मिले आवेदनों की जब जांच की गई तो हैरान करने वाले आंकड़े सामने आए। इस पद के लिए जितने आवेदन आए थे, उनमें पचास हजार स्नातक, अट्ठाईस हजार परास्नातक और तीन हजार सात सौ पीएच. डी भी थे।

केवल सात हजार चार सौ आवेदक ही ऐसे थे जो पांचवी पास थे और इस पद पर कार्य करने हेतु अधिक योग्य पाए गए। मात्र बीस हजार रुपए प्रतिमाह के वेतन वाले इस पद के लिए इतनी बड़ी संख्या में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों जैसे अभियांत्रिकी, प्रबंधन आदि की डिग्री लिए हुए नौजवान भी अगर आवेदन कर रहे हैं, तो इससे देश में बेरोजगारी की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह वाकई हमारे देश की शिक्षा प्रणाली की त्रासदी है कि पीएच.डी धारी नौजवान भी चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए तैयार है। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी दूसरे राज्यों में ऐसा देखने को मिला है। झारखंड में दारोगा के दो हजार छह सौ पैंतालीस पदों के लिए जितने आवेदन आए थे, उनमें तीन आवेदक ऐसे थे जो आइआइटी स्नातक थे। इसके अलावा दूसरे कालेजों से निकले बी.टेक और एम.टेक करने वालों ने भी आवेदन किया था। हालांकि कार्यालय-सेवक से तो दारोगा का पद बेहतर है, लेकिन यह गंभीर सवाल है कि क्या इंजीनियरिंग जैसे पेशेवर पाठ्यक्रम की पढ़ाई के बाद दारोगा की नौकरी करने को मजबूर है देश का युवा!

इसी तरह मध्यप्रदेश में भी यही स्थिति तब देखने को मिली जब ग्वालियर जिला न्यायालय में कार्यालय-सेवक के सत्तावन पदों के लिए साठ हजार आवदेन आ गए। आवेदन फीस से ही सरकार को मोटी कमाई हो गई। इस पद के लिए मानदेय मात्र साढ़े सात हजार रुपए था, किंतु बेरोजगारी के चलते उच्च शिक्षित लोगों ने इस वेतन पर भी कार्य करना मुनासिब समझा और नौकरी के लिए आवेदन कर दिया। जबकि इस पद के के लिए आठवीं पास योग्यता रखी गई थी। किंतु आवेदकों की इतनी बड़ी संख्या होने के कारण व्यवस्था बनाने में ही जिला प्रशासन के हाथ-पैर फूल गए। चौदह जजों ने सोलह दिन तक बिना अवकाश के साक्षात्कार लेकर साठ हजार में से सत्तावन उम्मीदवारों का चयन किया।

अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) ने अपनी रिपोर्ट ‘वर्ल्ड एंप्लायमेंट एंड सोशल आउटलुक-ट्रेंड्स 2018’ में बताया है कि देश में बेरोजगारी दर साल 2018 और 2019 में साढ़े तीन फीसद रहेगी। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद साल 2018 में देश में बेरोजगारी दर घटने के बजाय बढ़ने के आसार हैं। साल 2017 और 2016 में भी बेरोजगारी की यही स्थिति देखी गई थी। आइएलओ ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर बेरोजगारी दर में पिछले तीन साल में पहली बार कमी आएगी। एशिया प्रशांतक्षेत्र में बेरोजगारों की संख्या वर्ष 2018 में 83.6 करोड़ और वर्ष 2019 में 84.6 करोड़ रहने का अनुमान है। जबकि वर्ष 2017 में यह 82.9 करोड़ थी। वैश्विक रूप से वर्ष 2018 में बेरोजगारों की संख्या 192.3 करोड़ हो जाएगी, जबकि 2017 में यह 192.7 करोड़ थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मजबूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद कम गुणवत्ता वाली नौकरियां सृजित हो रही हैं और वर्ष 2019 तक दक्षिण एशिया के 72 फीसद कामगारों के रोजगार अतिसंवेदनशील अवस्था में रहेंगे।

बेरोजगारी का एक बड़ा कारण गुणवत्ता हीन उच्च शिक्षा है। देश में तेजी से उच्च शिक्षण संस्थान खुलते जा रहे हैं, किंतु वहां पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाओं का अभाव है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में डिग्रियां लिए विद्यार्थियों में जब तक अपने कार्य-कौशल का ज्ञान नहीं होगा, तब तक उन्हें मात्र डिग्री के आधार पर कोई भी बड़ी व्यावसायिक संस्था अपने यहां काम पर कैसे रख सकती है? इसी कारण इंजीनियरिंग पास करने वाले पंद्रह लाख छात्रों में से केवल साढ़े तीन लाख विद्यार्थियों को ही प्रतिवर्ष नौकरी मिल पाती है।
कुछ समय पूर्व विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने अस्सी हजार शिक्षकों को नौकरी से हटाने के निर्देश दिए थे, क्योंकि वे एक से अधिक शिक्षण संस्थानों में अध्यापन का कार्य कर रहे थे और इस तरह दो जगहों से वेतन ले रहे थे। कई जगहों पर तो उच्च शिक्षा के नियमों पर आधारित योग्य फैकल्टी ही नहीं है।

जब योग्य शिक्षकों का अभाव होगा तो व्यवसायिक पाठ्यक्रमों के विद्यार्थी क्या और कैसे सीख पाएंगे? मध्यप्रदेश में वर्ष 1994 में सहायक प्राध्यापकों की भर्ती परीक्षा हुई थी। इसके बाद वर्ष 2018 में भर्ती परीक्षा आयोजित की गई। पिछले चौबीस सालों में राज्य की उच्च शिक्षण व्यवस्था अतिथि विद्वानों के हाथों में बनी रही थी। ऐसे में नियमित शिक्षक न होने से शिक्षण कार्य किस तरह से ध्वस्त हुआ होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

इसलिए यदि हमें बेरोजगारी और गुणवत्ताहीन शिक्षा की समस्या से निजात पाना है तो सबसे पहले देश की शिक्षा नीति को सुधारने की ओर ध्यान देना होगा, ताकि शिक्षा का उद्देश्य डिग्रियां हासिल करने की अपेक्षा ज्ञान अर्जित करना हो सके। शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और रोजगार-परक बनाना होगा। निर्बल और पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए सेवाओं में आरक्षण देने के स्थान पर प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा के स्तर तक शैक्षणिक स्तर में सुधार के प्रयास करने होंगे, ताकि सभी स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा के लिए समान रूप से भागीदारी के लिए तैयार हो सकें। दूसरी ओर, सरकार को जो सबसे जरूरी कदम उठाना है वह यह कि शिक्षण संस्थानों में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करे। रिक्त पदों पर अंशकालीन दैनिक वेतन भोगियों को न्यूनतम दर पर काम पर रख लिया जाता है, जिसके चलते योग्य शिक्षक को न तो योग्यतानुरूप वेतन मिल पाता है, न ही पूर्ण रोजगार। शिक्षा क्षेत्र में यह एक घातक प्रवृत्ति है, जिसे खत्म किया जाना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि समय रहते इस समस्या पर मंथन हो, क्योंकि युवा वर्ग किसी भी राष्ट्र की संपत्ति होता है जिसके परिश्रम से राष्ट्र का उत्थान संभव होता है। यदि युवाओं को अपनी योग्यता के अनुरूप कार्य करने के क्षेत्र ही नहीं मिलेंगे तो वह अपने पथ से भ्रमित हो जाएंगे। ऐसे मामले अक्सर देखने-सुनने में आते रहते हैं कि बेरोजगार इंजीनियर ने आॅनलाइन ठगी का गिरोह बना लिया। बेरोजगारी ही शिक्षित युवाओं को ऐसे अपराधों की ओर ढकेलने का काम करती है। अत: आवश्यक है कि इस समस्या के प्रति गंभीरता से विचार किया जाए तथा उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार के साथ रोजगार के क्षेत्रों को निर्मित करने पर भी जोर हो।

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