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प्रदूषण नियंत्रण की कठिन कवायद

दिल्ली में प्रदूषण कम करने के नाम पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सम-विषम कारों की योजना परीक्षण के तौर पर चल रही है..

Author नई दिल्ली | Published on: January 5, 2016 12:26 AM
क्या है ऑड-ईवन फॉर्मूला-ऑड तारीख को ऑड नंबर की गाड़ियां सड़कों पर चलेंगी और ईवन तारीख को ईवन नंबर की गाड़ियां सड़कों पर चलेंगी। गाड़ियों के नंबर के आखिर अंक से उनका ऑड-ईवन होना तय होगा।

दिल्ली में प्रदूषण कम करने के नाम पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सम-विषम कारों की योजना परीक्षण के तौर पर चल रही है। इस विषय पर गहन और निरपेक्ष चर्चा इसलिए आवश्यक है कि प्रदूषण केवल दिल्ली की नहीं, पूरे देश की समस्या है। देश के अनेक शहरों की हवा इतनी खतरनाक रूप से प्रदूषित हो चुकी है कि वह सामान्य सांस लेने लायक नहीं है। दिल्ली सहित अलग-अलग शहरों के प्रदूषण के स्तर हमारे सामने आंकड़ों के रूप में इतनी बार लाए जा चुके हैं कि उन्हें दुहराने की आवश्यकता नहीं है। वस्तुत: प्रदूषण कम करने के लिए दिल्ली की किसी योजना का अनुसरण दूसरे राज्य भी करेंगे। इसलिए तात्कालिक भावावेश में आने की जगह इसकी व्यावहारिकता, उपयोगिता और प्रभाविता का हर पहलू से विश्लेषण किया जाना चाहिए।

आम सोच यह है कि दिल्ली की हवा साफ हो, हम सबको शुद्ध प्राणवायु मिले इसके लिए सरकार यदि कोई कदम उठाती है तो उसका स्वागत करना चाहिए। उसमें परेशानी हो तो उसे भी उठाने को तैयार रहना चाहिए। जब उच्च न्यायालय ने दिल्ली को गैस चेंबर करार दे दिया और जितनी रिपोर्टें हैं सब डराने वाली हैं, तो कड़े कदम उठाना जरूरी है। केजरीवाल कह रहे हैं कि स्थिति काफी बदतर थी तो इस तरह का कदम उठाना आवश्यक था। लेकिन क्या यह योजना वाकई ऐसी है जिसे हम मान लें कि इससे लंबे काल के लिए दिल्ली का प्रदूषण घटाने में मदद मिलेगी?

इस पर हम बाद में विचार करेंगे, पहले कुछ आंकड़ों को देखें। दिल्ली में सबसे ज्यादा, करीब पैंतालीस प्रतिशत प्रदूषण धूल और निर्माण-कार्यों से होता है। पिछले अनेक सालों से मेट्रो-निर्माण और सड़कों, फ्लाइओवरों आदि के निर्माण के लिए की गई खुदाई से जो धूल उड़ती है उसने दिल्ली का सत्यानाश किया है। इसके बाद जलाए जाने वाले कचरे से सत्रह प्रतिशत, डीजल वाले जेनरेटर से नौ प्रतिशत, उद्योगों से आठ प्रतिशत, घरेलू कार्यों से सात प्रतिशत और गाड़ियों से करीब चौदह प्रतिशत प्रदूषण होता है।

ध्यान रखिए, यह चौदह प्रतिशत प्रदूषण सभी गाड़ियों से होता है। जरा गाड़ियों के आंकड़े देखिए। दिल्ली में करीब 88 लाख गाड़ियां हैं। ट्रकों की संख्या कुल गाड़ियों में 3.4 प्रतिशत है, लेकिन गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण में इनका योगदान 63.3 प्रतिशत है। बसों की संख्या है पचास हजार यानी कुल गाड़ियों का 0.6 प्रतिशत है। इनका योगदान 10.4 प्रतिशत है। तिपहिया की संख्या है डेढ़ लाख यानी कुल गाड़ियों का 1.7 प्रतिशत। प्रदूषण में इनका योगदान 1.4 प्रतिशत है। कारों की संख्या है तीस लाख, यानी कुल गाड़ियों का पैंतीस प्रतिशत, जिनका कुल वाहन प्रदूषण में हिस्सा 15.5 प्रतिशत है। सबसे ज्यादा दोपहिया वाहन हैं, जिनकी संख्या तिरपन लाख यानी कुल गाड़ियों का साठ प्रतिशत है। प्रदूषण में इनका अनुपात 9.3 प्रतिशत है।
तो सम-विषम सूत्र करीब पैंतीस लाख चौपहिया वाहनों पर लागू है। इनमें भी पच्चीस श्रेणियों की छूट है। दोपहियों को इस योजना से अलग रखा गया है। सारी छूट के बाद केवल सत्रह प्रतिशत गाड़ियां कम होंगी। अगर सारी गाड़ियों की संख्या को मिला दें तो करीब पंद्रह लाख गाड़ियां सड़कों पर नहीं होंगी। तो इससे कितना प्रदूषण कम हो सकता है? अधिकतम पांच प्रतिशत।

दुनिया में भी इस तरह की योजना जहां लागू हुई वहां इसे सफलता नहीं मिली है। हां, आज के समय में पर्यावरण के प्रति जागरूकता के कारण कई देशों में लोग स्वयं ही साइकिलों से लेकर ऐसे वाहनों का प्रयोग कर रहे हैं जिनसे प्रदूषण न हो। लेकिन जहां तक योजनाओं का प्रश्न है, उनकी सफलता के प्रमाण नहीं हैं। एक उदाहरण मैक्सिको का है। 1989 में मैक्सिको सिटी में ‘होय नो सकुर्ला’ यानी ‘आज आप गाड़ी नहीं चला पाएंगे’, नाम से आॅल्टरनेट-डे ड्राइविंग जैसी योजना आरंभ की गई। इससे संबंधित जो शोध हुए उनका निष्कर्ष यह आया कि इस योजना से प्रदूषण कम करने में मदद नहीं मिली थी। लगातार इसकी जांच की गई और कुल मिलाकर वायु की गुणवत्ता में भी बड़े सुधार के आंकड़े नहीं आए।

मैक्सिको में लोगों ने सार्वजनिक यातायात को वरीयता ही नहीं दी। हालांकि वहां सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था दिल्ली से बेहतर की गई थी लेकिन लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया। जब स्वीकार नहीं किया तो प्रदूषण कहां से कम होता। एक दिन के अंतर पर ड्राइविंग के कारण, जिनके पास साधन थे वे दूसरी गाड़ियां खरीदने लगे। अगर दिल्ली में सम-विषम योजना को स्थायी किया गया तो यहां भी वही स्थिति आ सकती है। जिनके पास सम नंबर की गाड़ी है वे विषम और जिनके पास विषम नंबर की है वे सम गाड़ियां खरीदना आरंभ कर देंगे। सच कहें तो इसकी शुरुआत हो भी गई है। हां, इसमें सीएनजी वाले वाहन खरीदने को लोग प्राथमिकता देने लगे हैं, क्योंकि उसे सम-विषम योजना से अलग रखा गया है।

कहा जा रहा है कि जनता ने इसे स्वीकार कर लिया है, पर इस दावे को साबित करना कठिन है। आखिर लोगों के पास चारा क्या है? आप अगर निर्धारित नंबरों से अलग गाड़ी लेकर निकलेंगे तो आपका चालान कटेगा। तो चालान से बचने के लिए लोग तत्काल नंबर और तिथियों के अनुसार गाड़ी निकाल रहे हैं। जो नहीं मान रहे उन्हें पहले फूल देकर समझाया गया और बाद में चालान कटना आरंभ हुआ। हजारों चालान कट रहे हैं। कहा जा सकता है कि योजना अच्छी भी हो तो उसे आसानी से सब लोग स्वीकार नहीं करते। पर यहां यह तर्क पूरी तरह लागू नहीं होता। इससे परेशानियां कितनी हो रही हैं जरा इसका अनुमान लगाइए।

हम शायद यह मान कर चल रहे हैं कि केवल कार वालों को परेशानी होगी। ऐसा नहीं है। बस या मेट्रो का अभ्यास न होने से उनको तो परेशानी होगी ही, लेकिन जो लोग बस और मेट्रो से चलते हैं उनकी परेशानियां भी बढ़ी हैं। दिल्ली के पास न ऐसी योजनाआें को सफल बनाने के लिए पर्याप्त बसें हैं न मेट्रो। स्कूल-बसों से लेकर अन्य कार्यों में लगी करीब ढाई हजार बसें उतारी गई हैं। ये बसें भी स्थायी नहीं रह सकतीं। आखिर स्कूल कब तक इस योजना के लिए बंद रखे जा सकते हैं? इतनी बड़ी संख्या में लोगों को ढो पाना संभव नहीं हो रहा है। जो लोग प्रतिदिन बस से चलते थे उनकी कचूमर भी भीड़ से निकल रही है और उनकी भी जो प्राय: कार से चलने के ही अभ्यस्त हैं।

न तो इससे प्रदूषण में भारी मात्रा में कमी आनी है और न ऐसी योजना स्थायी रूप से सफल हो सकती है। योजनाएं ऐसी हों जिनसे वाकई प्रदूषण में भारी कमी आए और वह स्थायी और स्वाभाविक रूप से स्वीकृत होने वाली हो। वह इतनी व्यावहारिक हो कि उसके सफल होने में ज्यादा समस्याएं न आएं। इस तरह तदर्थ तरीके से आनन-फानन में कोई योजना लागू करने से ऐसा लक्ष्य हासिल नहीं होगा। वास्तव में लोग निजी कारों का प्रयोग कम करें इसके लिए व्यापक तैयारी चाहिए। पर्याप्त संख्या में इंटरसिटी रेलगाड़ियां, मेट्रो, बसें हों। इसके साथ जहां आप इन सवारियों से उतरते हैं वहां से जाने के लिए भी सवारियां चाहिए। ऐसा तो है नहीं कि जहां रेलगाड़ी या मेट्रो के स्टेशन हैं या बसों के स्टॉप हैं वहीं हमारा गंतव्य खत्म हो जाता है। वहां से जाना तो पड़ता ही है। इस सबकी कोई व्यवस्था दिल्ली सरकार ने नहीं की है। भविष्य के आश्वासन अवश्य मिल रहे हैं, पर कोई नहीं कह सकता कि पर्याप्त सार्वजनिक वाहनों और अन्य गंतव्यों के लिए सहायक वाहनों की व्यवस्था कब तक होगी।

मूल लक्ष्य अगर प्रदूषण कम करना है तो फिर सबसे ज्यादा प्रदूषण पैदा करने वाले पहलू पर पहले चोट होनी चाहिए। निर्माण का कार्य आप रोक नहीं सकते। पर उसके तौर-तरीके परिष्कृत कर धूल कम की जा सकती है। इस पर प्राथमिकता से काम होना चाहिए। दिल्ली सरकार ने सड़कों से धूल कम करने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया। हां, उसका वादा जरूर किया जा रहा है। वाहनों को निशाना बनाना सबसे आसान काम है। इसमें अपनी ओर से बहुत कुछ करना नहीं है। धूल हटाने के लिए तो आपको पूरे संसाधन जुटाने होंगे। उनकी स्थायी व्यवस्था करनी होगी। यह कठिन काम है तो आप इससे बच रहे हैं।

वास्तव में अगर हम कुल प्रदूषण में अंशदान के अनुसार विचार करें तो निष्कर्ष आएगा कि एक समग्र नीति बना कर सभी पहलुओं पर काम किया जाना चाहिए। निजी वाहन के इस्तेमाल को सीमित करना उसका एक अंग हो सकता है। उसमें भी जबरन सरकारी बंदिश लागू करने की सीमाएं हैं। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमने मार्ग-कर या रोड टैक्स जब पूरा दिया है तो आप पंद्रह दिन हमको सड़क पर गाड़ी चलाने से कैसे रोक सकते हैं, उनको आप गलत कैसे कहेंगे? कोई गाड़ी खरीदता है तो अपनी सुविधा के लिए, और पूरा टैक्स देता है। इसके आधार पर विचार करें तो फिर लोगों को मार्ग-कर का पैसा वापस होना चाहिए। ट्रकों को ग्यारह बजे रात के बाद प्रवेश की इजाजत दी गई है। हमारे-आपके दैनिक उपयोग से लेकर निर्माण आदि की सामग्रियां मुख्यत: ट्रकों से ही आती हैं। अगर वे नियत समय सीमा के अंदर प्रवेश न कर पाएं तो फिर समस्याएं बढ़ेंगी। प्रदूषण-नियंत्रण और जीवन की आवश्यकताएं, दोनों के बीच संतुलन चाहिए।

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