प्रदूषण से कराहते महासागर

नदियों के जरिए ही प्रतिवर्ष करीब सत्ताईस लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुंचता है और इनमें शहरी क्षेत्रों से निकलने वाली छोटी नदियां सर्वाधिक प्रदूषित हैं।

प्रदूषण से महासागर भी प्रभावित। फाइल फोटो।

योगेश कुमार गोयल

नदियों के जरिए ही प्रतिवर्ष करीब सत्ताईस लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुंचता है और इनमें शहरी क्षेत्रों से निकलने वाली छोटी नदियां सर्वाधिक प्रदूषित हैं। समुद्रों में प्लास्टिक कचरे का करीब अस्सी फीसद हिस्सा पहुंचाने के लिए दुनिया की केवल एक हजार नदियों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना गया है, जो विश्व भर की कुल नदियों का केवल एक फीसद हैं। शेष बीस फीसद प्लास्टिक कचरा तीस हजार अन्य नदियों के जरिए समुद्रों में पहुंच रहा है।

पृथ्वी पर मुख्यत: पांच महासागर हैं, प्रशांत, हिंद, अटलांटिक, उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव महासागर। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक औसतन एक ट्रक प्लास्टिक कचरा प्रति मिनट महासागरों में गिराया जा रहा है। इसके अलावा विभिन्न घातक रसायन और जल-मल भी समुद्रों का हाल बेहाल कर रहे हैं। प्रतिवर्ष अरबों टन प्लास्टिक कचरा महासागरों में समा जाता है, जो न गल पाने की वजह से बरसों तक ऐसे ही पड़ा रहता और महासागरों की सेहत बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाता है। समुद्रों में बहुत बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरे के अलावा रासायनिक और अन्य प्रदूषक तत्व भी समाते हैं।

आए दिन सैंकड़ों-हजारों टन विषैले रसायन समुद्रों में समाने से समद्री जैव विविधता बुरी तरह प्रभावित होती है, क्योंकि इनका समुद्री वनस्पतियों की वृद्धि के अलावा समुद्री जीव-जंतुओं पर भी बहुत घातक प्रभाव पड़ता है। महासागरों का गर्म होना, समुद्री पानी का पीएच मान कम होना, पोषक तत्वों की आपूर्ति तथा आक्सीजन की कमी, इन सभी को समुद्री पारिस्थितिक तंत्र पर बढ़ता तनाव बहुत प्रभावित करता है।

पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में केवल हिंद महासागर में प्रति वर्ष करोड़ों टन भारी धातुएं तथा लवणीय पदार्थ समाहित हो जाते हैं। महासागरों में इन्हीं प्लास्टिक, रासायनिक तथा अन्य प्रदूषकों की वजह से महासागर कराह रहे हैं। तमाम समुद्री जीवों के स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। समुद्र में समाते प्लास्टिक कचरे को वे अपना भोजन समझ कर निगल लेते हैं, जिससे बहुत से समुद्री जीवों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। दरअसल, वेल, समुद्री कछुए सहित अनेक समुद्री जीव प्राय: मछली पकड़ने वाले जाल तथा अन्य प्लास्टिक खा लेते हैं, जो उनके लिए बहुत घातक सिद्ध होते हैं।

विभिन्न अध्ययनों में यह स्पष्ट हो चुका है कि प्लास्टिक में मौजूद हानिकारक रसायन समुद्रों के जरिए मछलियों तथा अन्य समुद्री जीवों के शरीर में जा रहे हैं, जिनका सेवन दुनिया भर में करीब तीन सौ करोड़ लोग करते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है। विशालकाय समुद्री शिकारी जीवों के शरीर में बढ़ता प्रदूषकों का स्तर गंभीर चिंता का विषय बनने लगा है। यह न सिर्फ पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते रसायनों के प्रभाव को दर्शाता, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि हमारे वातावरण में इन रसायनों की मात्रा बढ़ती जा रही है।

हाल ही में वैज्ञानिकों को नार्वे के पास किलर वेल मछलियों में बड़ी मात्रा में हानिकारक रसायन मिले हैं। ‘एनवायरमेंटल टाक्सिकोलाजी एंड केमिस्ट्री’ नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार आठ में से सात किलर वेल्स की चर्बी में उच्च मात्रा में प्रतिबंधित ‘पालीक्लोराइनेटेड बाइफिनाइल’ (पीसीबी) के अंश मिले। शोधकर्ताओं को किलर वेल्स के ऊतकों में मानव निर्मित विषैले रसायनों- परफ्लुओरो अल्काइल सब्सटैंस (पीएफएएस) के प्रमाण मिले, जिन्हें इंसानी स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक माना जाता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र के स्तनधारी जीवों के स्वास्थ्य को पीएफएएस रसायन कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसकी तो अभी सटीक जानकारी नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि ये रसायन जंगली जीवों में प्रजनन क्षमता और उनके हार्मोन को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिकों को किलर वेल्स के ऊतकों में नई तरह के ब्रामिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स भी मिले, जो उनसे उनके बच्चों के शरीर में भी जा रहे हैं।

स्पेनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल के रसायन विज्ञानी एथेल इजारत के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में पहली बार समुद्री कछुओं के पेट में प्लास्टिक होने का भी खुलासा हुआ है। शोधकर्ताओं द्वारा लुप्तप्राय लागरहेड प्रजाति के कुल चौवालीस ऐसे कछुओं के अवशेषों का विश्लेषण किया गया, जो पूर्वी स्पेन में कैटलन तट पर तथा बेलिएरिक द्वीपों में समुद्र के किनारों पर मृत पाए गए थे। अध्ययन के दौरान इन सभी कछुओं की मांसपेशियों तथा पेट में उच्च स्तर पर प्लास्टिक के कण होने का पता चला।

शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक में मौजूद उन्नीस यौगिकों का विश्लेषण किया, जो हार्मोन-रेगुलेटिंग एंडोक्राइन सिस्टम, न्यूरोटाक्सिक तथा कार्सिनोजेनिक को बाधित करने वाले होते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि जैलीफिश, सार्डिन, स्क्वायड आदि समुद्री जीव कछुओं का मुख्य आहार होते हैं, लेकिन ये समुद्रों में प्लास्टिक बैग, बोतल के ढक्कन, प्लास्टिक के अन्य अपशिष्ट का भी सेवन करते हैं, जिसके स्पष्ट प्रमाण मिले हैं।

जहां तक महासागरों में समाते प्लास्टिक कचरे की बात है, तो नदियां इसका बहुत बड़ा स्रोत हैं। प्रतिवर्ष इन्हीं के जरिए लाखों टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में समा जाता है। हाल ही में आस्ट्रेलिया के एक फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘प्लास्टिक वेस्ट मेकर्स इंडेक्स’ में बताया गया है कि 2019 में समुद्रों में तेरह करोड़ मीट्रिक टन प्लास्टिक पहुंचा।

एक अन्य शोध में बताया गया है कि नदियों के जरिए ही प्रतिवर्ष करीब सत्ताईस लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुंचता है और इनमें शहरी क्षेत्रों से निकलने वाली छोटी नदियां सर्वाधिक प्रदूषित हैं। समुद्रों में प्लास्टिक कचरे का करीब अस्सी फीसद हिस्सा पहुंचाने के लिए दुनिया की केवल एक हजार नदियों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना गया है, जो विश्व भर की कुल नदियों का केवल एक फीसद हैं। शेष बीस फीसद प्लास्टिक कचरा तीस हजार अन्य नदियों के जरिए समुद्रों में पहुंच रहा है।

नए शोध के मुताबिक समुद्रों में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण में छोटी और मध्यम आकार की नदियों की प्रमुख भूमिका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 में हुए विभिन्न शोधों में प्लास्टिक प्रदूषण फैला रही प्रमुख नदियों की संख्या दस से बीस के बीच ही थी, पर नए शोध में प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने वाली नदियों की संख्या उससे पचास से सौ गुना ज्यादा है। शोधकर्ताओं के अनुसार समुद्रों में करीब पच्चीस फीसद प्लास्टिक कचरा पहुंचाने वाली चार सौ चौवन बहुत छोटी नदियां हैं। तीन सौ साठ छोटी नदियां चौबीस फीसद, एक सौ बासठ मध्यम आकार की नदियां बाईस फीसद, अठारह बड़ी नदियां दो फीसद और छह बहुत बड़ी नदियां करीब एक फीसद कचरे के लिए जिम्मेदार होती हैं, जबकि विभिन्न आकार की अन्य नदियां छब्बीस फीसद प्लास्टिक कचरा समुद्रों तक पहुंचाती हैं।

शोध में यह भी पाया गया कि प्लास्टिक कचरे को समुद्र में डालने के मामले में फिलीपींस प्रथम पायदान पर है, जिसकी अड़तालीस सौ से भी ज्यादा नदियों के जरिए प्रतिवर्ष साढ़े तीन लाख मीट्रिक टन से भी अधिक प्लास्टिक कचरा, जबकि चीन की करीब तेरह सौ नदियों से सत्तर हजार मीट्रिक टन से ज्यादा, भारत की ग्यारह सौ से ज्यादा नदियों के जरिए सवा लाख टन से ज्यादा और मलेशिया की 1070 नदियों के जरिए तिहत्तर हजार मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा हर साल समुद्रों में समा रहा है।

समुद्रों की हमारे पर्यावरण और जलवायु के लिए बहुत महत्ता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब समुद्रों में गर्माहट बढ़ रही है, जिससे विभिन्न सागरों में बड़े-बड़े तूफान बार-बार आ रहे हैं। पिछले साल अम्फान, निसर्ग और इस साल आए तौकते तथा यास जैसे प्रचंड चक्रवाती तूफानों का कारण भी समुद्री सतह का ज्यादा गर्म होना माना गया है। 2018 से 2021 तक लगातार चार वर्षों में प्री-मानसून सीजन में अरब सागर में चक्रवात दिखाई दे रहे हैं। कमोवेश यही हाल अन्य महासागरों का भी है। जलवायु परिवर्तन के ही कारण दुनिया भर के महासागरों में ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी हो रही है, जो कई इलाकों में बड़ी तबाही का कारण बन सकते हैं। बहरहाल, पर्यावरण तथा मौसम वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि महासागरों में हानिकारक रसायनों की नियमित निगरानी बेहद जरूरी है, ताकि पर्यावरण पर पड़ने वाले इनके प्रभावों को सीमित किया जा सके।

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