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राजनीतिः सोशल मीडिया का चिंताजनक इस्तेमाल

साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मुद्दा ऐसा है, जिसकी अब अनदेखी नहीं की जा सकती। नफरत भड़काने वाली सामग्री को साझा करने से सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है, कानून-व्यवस्था के भी बिगड़ने का खतरा रहता है। आंतरिक सुरक्षा पर भी आंच आ सकती है। ऐसे में इसके खिलाफ सख्त कानून की नितांत आवश्यकता है।

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रिजवान निजामुद्दीन अंसारी

वाणी की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है। इस अधिकार के उपयोग की खातिर सोशल मीडिया ने जो असीम अवसर नागरिकों को दिए हैं, एक दशक पूर्व उसकी कल्पना भी किसी को नहीं रही होगी। इस मंच के माध्यम से समाज में बदलाव की बयार लाई जा सकती है। इसके माध्यम से अण्णा आंदोलन का प्रचार, निर्भया कांड के बाद यौनहिंसा के खिलाफ एक प्रबल आंदोलन, रोहित वेमुला प्रकरण पर छात्रों की लामबंदी जैसे प्रयोग जहां सफल रहे, वहीं दूसरी ओर इसके माध्यम से दुष्प्रचार करने, धमकाने, गलतफहमी फैलाने, गलत खबरें या अफवाहें फैलाने, निंदा अभियान चलाने, चरित्र हनन करने और समाज में तनाव पैदा करने की घटनाएं भी हो रही हैं। कहना मुश्किल है कि सोशल मीडिया का सकारात्मक इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है, या नकारात्मक, पर यह तो साफ दिखता है कि इस माध्यम का दुरुपयोग पहले से बढ़ा है।

पश्चिम बंगाल में इन दिनों सांप्रदायिक सौहार्द के बिगड़ने से सोशल मीडिया के दुुरुपयोग की तरफ एक बार फिर ध्यान गया है, या जाना चाहिए। एक तरफ हमारी सरकार डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रम लाकर देश की तस्वीर बदलने का प्रयास कर रही है, तो दूसरी तरफ हम इस कार्यक्रम के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से का दुरुपयोग कर सरकार और देश को ही चुनौती देने का काम कर रहे हैं। इसे परिवर्तन और सुधार का सशक्त माध्यम बनाने के बजाय कुछ लोग यदि नफरत और हिंसा फैलाने पर उतारू हैं तो यकीन मानिए कि वे देश को गर्त में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। कौन हैं ये लोग? इनके पीछे कौन लोग हैं? वे जो हों, हममें इस बात की पहचान होनी चाहिए कि कौन-सी प्रवृत्तियां, कौन-से रुझान, किस तरह की गतिविधियां, किस तरह के अभियान देश को उन्नति की तरफ ले जाएंगे और कौन-से बर्बादी की तरफ।

पश्चिम बंगाल पहली मिसाल नहीं है। सोशल मीडिया के सहारे माहौल खराब करने की कोशिशों की एक लंबी फेहरिस्त है। उत्तर प्रदेश, बिहार, कश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, ओड़िशा जैसे राज्य किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया से आहत हुए हैं। हाल ही में ओड़िशा के भद्रक और उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में सांप्रदायिक दंगे सोशल मीडिया के कारण ही हुए। बहुचर्चित मुजफ्फरनगर दंगा कौन नहीं जानता? यह तो एक बानगी भर है। सोशल मीडिया के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में कोई न कोई चिंताजनक घटना आए दिन घटती रहती है। फेसबुक के अनुसार, पिछले वर्ष जुलाई से दिसंबर तक की अवधि में भारत में 719 आपत्तिजनक कथ्य (कंटेंट्स) हटाए गए। ये वे कथ्य थे जो उन कानूनों का उल्लंघन करते थे जो धार्मिक भावनाएं आहत करने और राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करने के खिलाफ बने हैं। इससे बहुत ज्यादा कथ्य ऐसे थे जो आपत्तिजनक तो थे, पर जिन्हें हटाना कानूनन आवश्यक नहीं समझा गया। एक छोटी-सी अवधि में इतनी बड़ी संख्या में आपत्तिजनक सामग्री का होना सोशल मीडिया के एक बड़े दुरुपयोग की तरफ इशारा करता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग करके हम क्या हासिल करना चाहते हैं? इसका अनैतिक इस्तेमाल करके हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी जमीन तैयार कर रहे हैं?
पश्चिम बंगाल की घटना से हमारी दो कमजोरियों का पता चलता है। पहली यह कि हमारे आपसी संबंध इतने कमजोर और खोखले हो चुके हैं कि एक नाबालिग लड़के के एक फेसबुक पोस्ट से ही हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं। क्या हम इतने असहिष्णु हो गए हैं कि अपने विवेक का इस्तेमाल करना भी हमें गवारा नहीं? दूसरी कमजोरी यह कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी का प्रयोग कर हमें विभिन्न समस्याओं पर आवाज बुलंद करनी चाहिए, लेकिन इसे हम धार्मिक सौहार्द को बिगाड़ने का तंत्र बना रहे हैं। हमें देश की वास्तविक समस्याएं नजर नहीं आ रही हैं। देश को विकास की राह पर ले जाने का सुझाव देना हमें कतई पसंद नहीं, लेकिन मसले को धार्मिक रंग देना हमारी नियति बन गई है। नतीजतन, हम सामाजिक ताने-बाने को तोड़ते हैं, साथ ही विकास के मार्ग में रुकावट भी बनते हैं। सवाल है कि हम देश के जायज मुद््दों और राजनीति के गिरते स्तर को लेकर अपनी आंखें क्यों मूंद लेते हैं?

बांग्लादेश और मिस्र में राजनीतिक परिवर्तन के लिए, लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए- जिसे अरब वसंत (अरब स्प्रिंग) कहा गया- सोशल मीडिया का प्रयोग क्या हम भूल गए? क्या इस बात की कल्पना भी किसी ने की होगी कि एक युवा सब्जी विक्रेता की आवाज ट्यूनीशिया से अरब के लगभग पंद्रह विभिन्न देशों में पहुंच जाएगी? क्या किसी ने सोचा होगा कि इतने अनोखे ढंग से दूरदराज के लोगों को क्रांति से जोड़ा जा सकेगा? लेकिन यह संभव हो सका केवल सोशल मीडिया के कारण। सरकार के कुशासन और तानाशाही के खिलाफ जन सैलाब उमड़ पड़ा और कई देशों के दिग्गज शासकों को अपनी गद््दी गंवानी पड़ी, साथ ही कितनों को जेल की हवा भी खानी पड़ी। इससे अरब देशों में अभी तक भले ही सबकुछ न बदला हो, लेकिन भविष्य में बहुत कुछ बदलने की उम्मीद अभी बाकी है।

जरा सोचिए, ग्रामीण इलाकों में जहां पगडंडियों के सहारे नदी पार कर बच्चे पढ़ने जाते हैं, विभिन्न कोनों में मजदूर और किसान देश के जीडीपी को बढ़ाने के लिए मेहनत करते हैं। लेकिन ये कौन लोग हैं जो अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण सारी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। सुविधाओं से लैस, घरों में बैठे-बैठे देश में नफरत के बीज बो रहे हैं। आपसी भाईचारे को खत्म कर देश के लिए चुनौती बन रहे हैं। लेकिन हमारे कानों पर जूं तक क्यों नहीं रेंगती? क्या देश को बेहतर बनाने के लिए हमारा कोई दायित्व नहीं है? क्या हम नहीं चाहते कि हमारी आने वाली पीढ़ी एक अनुशासित और साफ-सुथरे माहौल की भागीदार बने? लिहाजा, हमें गहन मंथन करने की आवश्यकता है।

साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मुद्दा ऐसा है, जिसकी अब अनदेखी नहीं की जा सकती। नफरत भड़काने वाली सामग्री को साझा करने से सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है, कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा भी रहता है। आंतरिक सुरक्षा पर भी आंच आ सकती है। ऐसे में इसके खिलाफ सख्त कानून की नितांत आवश्यकता है। एक तरफ देश सूचना क्रांति की राह पर आगे बढ़ रहा है, दूसरी तरफ इससे जुड़ी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। लिहाजा, भारत को भी वैसे ही कठोर कानून की जरूरत है जैसा जर्मनी में हाल ही में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री इस्तेमाल करने वालों पर शिकंजा कसने के लिए बनाया गया है। इसके अंतर्गत सोशल मीडिया कंपनियों को चौबीस घंटों के भीतर आपत्तिजनक सामग्री को हटाना होगा, अन्यथा उन पर पचास लाख यूरो से पांच करोड़ यूरो तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। कंपनियों को हर छह महीने बाद सार्वजनिक रूप से बताना होगा कि उन्हें कितनी शिकायतें मिलीं और उन पर किस प्रकार संज्ञान लिया गया। इसके अलावा उन्हें उस यूजर की पहचान भी बतानी होगी, जिस पर लोगों की मानहानि या गोपनीयता भंग करने का आरोप लगाया गया है। जानकारों का मानना है कि यह कानून लोकतांत्रिक देशों में अब तक का सबसे कठोर कानून है। भारत सरकार को भी समझना होगा कि हालात बिगड़ने पर इंटरनेट की सुविधा को कुछ समय के लिए बंद कर देने भर से समस्या का समाधान नहीं होने वाला। जर्मनी जैसी पहल की जरूरत है।

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