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राजनीतिः महिला उद्यमियों की चुनौतियां

भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में रोजगार के अवसर सृजन करने में महिला उद्यमियों की इस महती भूमिका पर गौर किया जाना जरूरी है। महिलाओं की यह कारोबारी भागीदारी देश के विकास में अहम भूमिका निभाएगी। साथ ही महिलाएं आगे बढ़ते हुए दूसरी महिलाओं को भी सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने में मददगार बन सकती हैं और इससे देश की आधी आबादी को हर तरह से सशक्त बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए समाज को एक रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलना होगा।

Author Published on: February 27, 2020 1:40 AM
महिला उद्यमी देश के मानव संसाधन का अहम हिस्सा हैं। बावजूद इसके कारोबारी परिवेश में आज भी महिला नेतृत्व वाले संस्थानों के प्रति लोगों में असहजता और अविश्वास का माहौल देखने को मिलता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) का कहना है कि भारत के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में से महज चौदह फीसद महिलाओं द्वारा संचालित हैं। इनमें से अधिकतर उद्यम छोटे स्तर के और स्व-वित्तपोषित हैं।

मोनिका शर्मा

भारतीय समाज में महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन देने के लिए सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक मोर्चों पर बदलाव की दरकार है। परिवेश, परिवार और परंपरागत सोच से जुड़े ऐसे कई पक्ष हैं, जो उद्यमी बनने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए बाधा बनते हैं। कारोबार की शुरुआत करने में ही नहीं, उसे विस्तार देने में भी महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा समस्याओं का सामना करती हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के मुताबिक इस वर्ष की शुरुआत तक देश में सत्ताईस हजार चौरासी अधिकृत नए छोटे कारोबारों (स्टार्टअप कंपनियों) में कम से कम एक महिला निदेशक वाली कंपनियों का हिस्सा मात्र तियालीस फीसद ही था। ‘इनोवेन कैपिटल’ के मुताबिक 2018 में ऐसी वित्त पोषित स्टार्टअप कंपनियों का हिस्सा सत्रह फीसद था, जिनमें कम से कम एक महिला सह-संस्थापक हो। पिछले साल ऐसी कंपनियों की संख्या घट कर सिर्फ बारह फीसद रह गई। गौरतलब है कि बीते साल महिला उद्यमी सूचकांक में भी भारत कुल सत्तावन देशों में बावनवें स्थान पर रहा था। ये आंकड़े बताते हैं कि हमारे यहां आज भी महिला उद्यमियों के सामने अनगिनत चुनौतियां मौजूद हैं, जो कारोबारी दुनिया में उनका दखल बढ़ने में बड़ा व्यवधान बनती हैं। हालिया स्थिति और ज्यादा विचारणीय हो जाती है, क्योंकि सरकार की महत्त्वाकांक्षी ‘स्टार्टअप इंडिया’ योजना भी उद्यमिता के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी में बहुत ज्यादा इजाफा नहीं कर पाई है।

दरअसल, महिला उद्यमियों को आगे लाने के लिए केवल आर्थिक मदद या सुविधाएं ही काफी नहीं होतीं। समग्र रूप से सामाजिक और पारिवारिक सोच में बदलाव आए बिना उनकी मुश्किलें कम नहीं की जा सकतीं। हालांकि बीते कुछ बरसों में श्रमशक्ति में स्त्रियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। लेकिन महिलाओं के कामकाजी बनने और उद्यमी होने में भी बड़ा अंतर होता है। नौकरी करते हुए घर-दफ्तर की जिम्मेदारियों के अलावा दूसरी उलझनें महिलाओं के हिस्से नहीं आतीं, जबकि कारोबार में उन्हें कई मोर्चों पर एक साथ जूझना पड़ता है। उनके द्वारा चलाए जा रहे उद्यमों में निवेश करने से लेकर उसके सफल होने तक, कितने ही पूर्वाग्रह और मूल्यांकन केवल महिला होने के नाते उनके हिस्से आते हैं। यही वजह है कि लगभग हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही आधी आबादी की कारोबार के क्षेत्र में भागीदारी आज भी सीमित ही है।

इसका सीधा -सा अर्थ यह है कि हमारे देश में महिला उद्यमियों के लिए न तो कारोबार की राह आसान है और न सामाजिक-पारिवारिक माहौल उनका सहयोगी बन पाया है। यही कारण है कि कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो हमारे यहां कारोबार की दुनिया में उनकी संख्या गिनती की ही है। उपलब्धियों और शिक्षा के बढ़ते आंकड़े भी इस स्थिति में खास बदलाव नहीं ला पाए हैं। आज भी कंपनियों के निदेशक मंडल में न केवल महिलाओं की संख्या कम है, बल्कि उनके फैसलों को भी प्रभावी ढंग से स्वीकार नहीं किया जाता। हालांकि पिछले कुछ सालों में कई कंपनियों ने अपने निदेशक मंडल में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जरूर है, पर इसे उनकी कारोबारी भागीदारी से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। गौरतलब है कि देश में बाजार नियामक संस्था सेबी के निर्देश हैं कि सभी सूचीबद्ध कंपनियों को अपने निदेशक मंडल में कम से कम एक महिला निदेशक नियुक्त करना जरूरी है।

महिला उद्यमिता को किसी भी देश की आर्थिक प्रगति का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। महिला उद्यमी न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाती हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार सृजन करती हैं। मौजूदा समय में भारत में महिलाओं द्वारा कई उद्यम चलाए भी जा रहे हैं और इनसे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल रहा है। ऐसे उद्यमों में अन्य महिलाओं को काम करने के लिए काफी सहज और सुरक्षित माहौल भी मिलता है और महिलाओं के लिए रोजगार पाने की राह आसान होती है। गौरतलब है कि भारत में श्रमशक्ति का एक तिहाई से कुछ अधिक हिस्सा महिलाओं का है, जो जीडीपी को बढ़ाने और रोजगार के अवसर पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्त्री श्रमशक्ति की यह भागीदारी भारतीय अर्थव्यवस्था को गति में अहम साबित हो सकती है।

इतिहास पर नजर डालें तो देश के महानगरों में ही नहीं, गांवों-कस्बों में भी महिलाओं द्वारा पापड़, अचार तैयार कर बेचने का चलन बहुत पुराने समय से चला आ रहा है। महिलाओं द्वारा संचालित छोटे-छोटे उद्यमों में बने परंपरागत हस्तशिल्प और कढ़ाई-बुनाई की चीजे देश ही नहीं, विदेशों में भी खूब पसंद की जाती रही हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें खुद जोखिम उठा कर घरेलू जिम्मेदारियों को संभालते हुए भी कारोबार की दुनिया में महिलाओं ने अपनी पहचान बनाई है। पर यह भी सच है कि अधिकांश महिलाओं पर घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ इतना ज्यादा होता है कि वे नवाचार या उद्यमिता का रास्ता नहीं चुन पातीं। क्षमता और योग्यता के बावजूद आगे नहीं बढ़ पातीं। कौशल और नवाचार की अपनी सोच को व्यवसाय के तौर पर स्थापित नहीं कर पातीं।

महिला उद्यमी देश के मानव संसाधन का अहम हिस्सा हैं। बावजूद इसके कारोबारी परिवेश में आज भी महिला नेतृत्व वाले संस्थानों के प्रति लोगों में असहजता और अविश्वास का माहौल देखने को मिलता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) का कहना है कि भारत के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में से महज चौदह फीसद महिलाओं द्वारा संचालित हैं। इनमें से अधिकतर उद्यम छोटे स्तर के और स्व-वित्तपोषित हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि महिलाओं को संसाधनों के वित्तपोषण और कारोबार की सहायता के लिए मौजूद योजनाओं की जानकारी भी कम ही होती है। ऐसे में अगर सरकार की नीतियां सहयोगी बनें, महिलाओं को नवाचार के लिए उचित आर्थिक मदद मिलने की राह खुले तो कारोबार के संसार में उनकी प्रभावी भागीदारी देखने को मिल सकती है।

हाल में आई ‘वूमन एंटरप्रेन्योरशिप इन इंडिया- पावरिंग द इकॉनमी विद हर’ रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं में उद्यमशीलता को प्रोत्साहन दिया जाए तो देश के आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य में काफी बदलाव आ सकता है। यह रिपोर्ट बताती है कि उद्यमशीलता के लिए महिलाओं का आगे आना देश में पंद्रह से सत्रह करोड़ रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में रोजगार के अवसर सृजन करने में महिला उद्यमियों की इस महती भूमिका पर गौर किया जाना जरूरी है। महिलाओं की यह कारोबारी भागीदारी देश के विकास में अहम भूमिका निभाएगी। साथ ही महिलाएं आगे बढ़ते हुए दूसरी महिलाओं को भी सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने में मददगार बन सकती हैं और इससे देश की आधी आबादी को हर तरह से सशक्त बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए समाज को एक रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलना होगा। महिलाओं से एक खांचे में बने रहने की उम्मीद करने के बजाय नवाचार से जुड़ी उनकी सोच और प्रयासों को बढ़ावा देना होगा। यकीनन, नीतिगत बदलाव और तकनीक का साथ लेकर कारोबार की दुनिया में महिला-पुरुष का अंतर पाटा जा सकता है।

अब हमारे यहां सामाजिक परिवेश बदल रहा है। महिलाएं अपने फैसले खुद लेने लगी हैं। अपने कामकाज का क्षेत्र स्वयं चुन रही हैं। पारंपरिक संरचना का यह बदलाव लैंगिक भेदभाव को दूर करने का पहला कदम है। बुनियादी सोच का यह परिवर्तन महिलाओं में उद्यमशीलता और कौशल विकास को गति देने वाला अहम कारक बन सकता है। इतना ही नहीं यह घर से लेकर कार्यक्षेत्र तक लैंगिक समानता लाने वाला कदम भी साबित होगा। हमारी आबादी का 48.5 फीसद हिस्सा महिलाएं हैं। भारतीय कार्यबल में प्रत्यक्ष श्रमशक्ति में चालीस फीसद और अप्रत्यक्ष श्रमशक्ति में नब्बे फीसद योगदान महिलाओं का ही है। आज एक ऐसे विकास मॉडल की दरकार है जो अधिक से अधिक महिलाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप उद्यमशीलता के लिए प्रोत्साहित करे।

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