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राजनीतिः अन्नदाता के आक्रोश को समझें

देश के अनेक हिस्सों में किसान आंदोलनरत हैं। मध्यप्रदेश के मंदसौर में तो किसान आंदोलन अचानक अप्रिय प्रसंगों का साक्षी बन गया।

Author June 17, 2017 03:31 am

तमाम मुसीबतें सह कर भी यदि किसान किसी तरह फसल को बाजार तक ले जाने में सफल हो जाता है तो उसे उसकी मेहनत का पर्याप्त दाम नहीं मिलता। इस लाचारी से जनमा अवसाद उसे कभी आत्महत्या के लिए विवश करता है और कभी आंदोलन के लिए। अन्नदाता यदि अवसाद में है तो क्या हमारे राज्यतंत्र को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए!

देश के अनेक हिस्सों में किसान आंदोलनरत हैं। मध्यप्रदेश के मंदसौर में तो किसान आंदोलन अचानक अप्रिय प्रसंगों का साक्षी बन गया। महाराष्ट्र में भी किसान सड़कों पर उतर आए। छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी धरतीपुत्रों का असंतोष महसूस किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के किसानों ने कर्जमाफी की घोषणाओं पर अमल को लेकर तो राजस्थान के किसानों ने लहसुन के दामों को लेकर आंदोलन की चेतावनी दे रखी है। राजस्थान में आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू भी हो गई है। लेकिन मिट््टी की उर्वरा-शक्ति को अपनी मेहनत के दम पर अन्न के कोठारों में बदल देने की सामर्थ्य रखने वाला किसान असंतोष की आग में जलता भी है तो बहुधा उस आग में किसी का आशियाना नहीं जलाता, उस आग को अंदर ही अंदर पी जाता है- तब तक, जब तक इस आग को पचाना उसके लिए संभव होता है। यह आग असह्य हुई है तो इसके पीछे आर्थिक कष्टों का एक लंबा सिलसिला रहा होगा। अंतस की आग जब असह्य हो जाती है तो अस्तित्व के प्रति अनुराग को राख करने पर आमादा हो जाती है। यह महज संयोग नहीं है कि पिछले कुछ सालों में देश में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में कई गुना वृद्धि हुई है।

यों सरकारों ने किसानों से संबंधित योजनाओं को लेकर बड़े बड़े दावे किए हैं लेकिन यह भी एक बड़ा सच है कि देश भर में किसान आज अपनी छोटी से छोटी जरूरत को पूरा करने में भी स्वयं को असहाय पा रहा है। कहीं उसके पास सिंचाई के लिए पानी नहीं है, कहीं उसे पर्याप्त मात्रा में बिजली नहीं मिल पा रही तो कहीं अकाल की मार उसके सपनों की धरती पर दरारें खींच रही है। तमाम मुसीबतें सह कर भी यदि किसान किसी तरह फसल को बाजार तक ले जाने में सफल हो जाता है तो उसे उसकी मेहनत का पर्याप्त दाम नहीं मिलता। दुर्योगों की दुरभिसंधि उसे बार-बार महाजन के दरवाजे पर हाथ फैलाने की ओर धकेलती है और फिर कर्ज द्वारा रची गई साजिशों का एक ऐसा सिलसिला शुरू होता है कि किसान अन्नदाता होकर भी अपने सपनों की मुक्ति के लिए गिड़गिड़ाता रहता है। इस लाचारी से जनमा अवसाद उसे कभी आत्महत्या पर विवश करता है और कभी आंदोलन के लिए। अन्नदाता यदि अवसाद में है तो क्या हमारे राज्यतंत्र को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए!

मानव सभ्यता के सामाजिक संगठन के विकास के मूल में ही कृषि कर्म का ज्ञान है। उसके पूर्व मनुष्य पशुपालन करता था और घुमंतू जीवन जीता था। कृषिकर्म ने ही एक जगह रहने और इस तरह मानव बस्तियों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। शायद यही कारण रहा कि रामायण के अयोध्या कांड में मर्यादा पुरुषोत्तम राम एक स्थान पर अपने अनुज भरत से कहते हैं कि मनुष्यों का कृषि तथा गोरक्षा के कार्यों में संलग्न रहना वास्तविक सुख प्राप्ति है। उस युग में कृषि-कार्य की महत्ता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि स्वयं शासक द्वारा खेत में हल चलाना एक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता था। खेत जोतना कुछ यज्ञ परंपराओं का अनिवार्य हिस्सा था। स्वयं राजा जनक ने जब ऐसे ही एक यज्ञ के अवसर पर खेत में हल चलाया तो उन्हें सीता की प्राप्ति हुई थी। महाभारत में एक स्थान पर कृष्ण ने स्वयं को कृषि-कर्म करने वाला घोषित किया था। रामायण में कहा गया है कि धान्य की संपन्नता से ही राज्य की समृद्धि है।

लेकिन रामायण काल से अब तक उस गंगा में बहुत सारा जल बह गया है, जिस गंगा के दोआब ने भारतीय कृषिकर्म को सफलता और संपन्नता के नव सोपानों तक पहुंचाया था। कहावतों में खेती को अब भी सबसे उत्तम व्यवसाय बताया गया है, लेकिन हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी जब एक किसान महीने भर में उतना नहीं कमा पाता हो जितना किसी साधारण सरकारी अफसर को दस दिन के महंगाई भत्ते के रूप में मिल जाता हो, तब खेतों की निराई, गुड़ाई, जुताई या बुवाई में कौन पीढ़ियों को खपाएगा? यह महज संयोग नहीं है कि किसानों की संतति अपनी पैतृक जमीन को बेच कर शहरों की ओर दौड़ने में अपने भविष्य की संभावनाएं टटोल रही है। पिछले कुछ सालों में जिस तरह से कृषिभूमि पर बस्तियां बसी हैं और खेती की जमीन का रकबा लगातार कम होता जा रहा है, उससे भविष्य के प्रति एक चेतावनी भरे संकेत को महसूस किया जा सकता है। लगातार बढ़ती आबादी और खेती की जमीन लगातार कम होते जाने के कारण खाद्यान्न के उत्पादन और मांग के अनुपात में ऐसा असंतुलन आ सकता है कि चीन का प्लास्टिक वाला जो चावल आज मुनाफाखोरों का षड्यंत्र प्रतीत होता है वह भविष्य में कहीं लोगों की विवशता न बन जाए।

किसानों के कल्याण के नाम पर कर्जमाफी की कई योजनाएं पिछले कुछ सालों में अलग-अलग सरकारों के स्तर पर कार्यान्वित तो हुई हैं लेकिन उन योजनाओं का वास्तविक लाभ शायद ही उन लोगों तक पहुंचा जिन्हें लाभान्वित करने की मंशा रही होगी। अक्सर बिचौलिये और बड़ी जोत वाले संपन्न लोग ही लाभ का आम खाकर लोगों को गुठलियां गिनवा देते हैं। छोटा किसान अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेने के उद््देश्य से बैंक जाने का आदी आज तक नहीं हुआ। कुछ साहबों के व्यवहार की ठसक और कुछ सरकारी औपचारिकताओं की लंबी फेहरिस्त इस देश के आम आदमी को आज भी जिम्मेदार एजेंसियों तक जाने से डराती है। उधर महाजन का ब्याज चक्रवृद्धि दर से बढ़ता है। यानी गरीब आदमी दोहरी मार का शिकार होता है। इस मार का डर उस डर से कई गुना अधिक होता है, जो डर आंदोलनरत किसानों की भीड़ पर पुलिस की कार्रवाई के कारण पैदा होता है। अपनी आर्थिक असुरक्षा के कारण पनपे भय से साधारण किसान किस हद तक पीड़ित रहता है, इसका अनुमान पिछले दिनों राजस्थान के कोटा शहर में घटी एक घटना से लगाया जा सकता है।

देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों में दाखिले की कोचिंग के लिए प्रसिद्ध दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के इस शहर में दो जून को पड़ोस के ही एक गांव इटावा से बत्तीस वर्षीय सत्यनारायण लहसुन की फसल बेचने के लिए आया। सुबह जब वह मंडी पहुंचा तो लहसुन का भाव पच्चीस रुपए किलो बोला जा रहा था। लेकिन देखते ही देखते भाव पांच रुपए किलो तक गिर गया। सत्यनारायण को अपनी सारी मेहनत पर पानी फिरता दिखा और इसी डर में उसके दिल ने काम करना बंद कर दिया। लहसुन बेचने के लिए मंडी में आया किसान अपनी मेहनत के पूरे दाम की आस में आया था लेकिन अपने प्राणों को भी वापस नहीं ले जा सका। यह घटना सिर्फ एक बानगी है उस त्रासदी की, जिससे देश भर के किसान गुजर रहे हैं। कुछ खुदकुशी कर लेते हैं, बाकी त्रासदी को जीते रहते हैं।

यह स्थिति डराती है। किसानों को भी, और उन सब संवेदनशील नागरिकों को भी, जो खेती के महत्त्व को समझते हैं। इस डर के कारणों के प्रति संवेदनशील होना आवश्यक है क्योंकि तभी किसान की हताशा, उसके क्षोभ और उसके आक्रोश को समझा जा सकेगा। और इस आक्रोश की तह में जाना बहुत आवश्यक है। कौटिल्य ने कहा है- ‘राजा को अपने राज्य में कृषि को बढ़ाने और कृषि-कार्य में संलग्न लोगों के हितों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।’

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