ताज़ा खबर
 

मौत के सबब बनते गड्ढे

सड़कों पर जगह जगह गड्ढे, विश्व स्तर की सड़कें बनाने के सरकारी दावे को मुंह चिढ़ाते हैं। विकास के लिए सड़कों का होना और सही हालत में होना जरूरी है। भारत में केंद्र और राज्य सरकारें सड़कों को विकास का पर्याय मान, इसके निर्माण पर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं। फिर भी सड़कें ऐसी बनती हैं जिनमें कुछ समय बाद ही गड्ढे नजर आने लगते हैं। सड़कों पर इन गड्ढों की वजह से हर साल हजारों हादसे होते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

केंद्र से लेकर राज्य सरकारें अक्सर यह दावा करती रहती हैं कि जनता की सुख-सुविधाओं के लिए उनकी सरकार ने बेहतर सड़कों का निर्माण किया है। लेकिन जब खराब सड़कों और इन सड़कों के कारण हुई मौतों का आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो अदालत भी सन्न रह गई। अच्छी बात यह है कि अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इसकी सुध ली है, तो हमारी राह के बहुत सारे सच सामने आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में जो आंकड़े पेश किए गए, उनके अनुसार बीते पांच साल में गड्ढे वाली सड़कों की वजह से 14926 लोगों की मौत हो चुकी है। बता दें ये आंकड़े सभी राज्यों ने केंद्र सरकार के साथ साझा किए हैं। इस मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है जहां नौ सौ सत्तासी लोगों की मौत हुई। उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे और तीसरे स्थान पर हरियाणा और गुजरात हैं, जहां का रिकॉर्ड सबसे खराब रहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो आंकड़े पेश किए गए हैं, उससे साफ है कि मौतों की संख्या बेहद ज्यादा है। गौरतलब है कि इससे पहले 20 जुलाई को भी तीखी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये किसी इंसान की जिंदगी और मौत का गंभीर सवाल है। ये गंभीर मुद्दा है और जो लोग गड्ढों की वजह से जिंदगी खो देते हैं, वे मुआवजा पाने के हकदार हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसमें सड़क सुरक्षा को लेकर आदेश जारी करने की मांग की गई है।

गौर करने वाली यह बात है कि देश में शायद आतंकवाद, भीड़ हिंसा, सांप्रदायिक दंगों, जातीय हिंसा वगैरह घटनाओं में उतने लोग नहीं मर रहे, जितने कि सड़कों के गड्ढों से हुए हादसों में। हर दिन दस मौतों के हिसाब से पिछले साल तीन हजार पांच सौ संतानवे लोगों की जान की जान गई। चौंकाने वाली बात है कि 2016 की तुलना में 2017 में हादसे पचास फीसद बढ़ गए। ये आंकड़े गवाह हैं कि देश में सड़क हादसे किस तरह जान पर बन आए हैं। समस्या इतनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आतंकी और नक्सली हमलों में जहां 2017 में सिर्फ आठ सौ तीन लोग मारे गए, वहीं सड़क हादसों में इससे चार गुना से भी ज्यादा यानी तीन हजार पांच सौ संतानवे लोगों की मौत हुई। लेकिन देश में सुबह-शाम जितना हंगामा आतंकवाद को लेकर होता है, गड्ढों के आतंक को लेकर कभी नहीं होता। जाहिर है कि सड़कों के रखरखाव की जिम्मेदारी जिस पर है, वह काम नहीं कर रहा है। चाहे नगर निगम हो या फिर राज्य सरकार या एनएचएआइ, कोई भी सड़कों का रखरखाव सही तरह से नहीं कर रहे हैं। ऐसे मामले में पीड़ित के परिवार को मुआवजा तक नहीं मिल रहा है, जबकि जख्मी हुए लोगों का तो आंकड़ा ही नहीं है। उनकी संख्या और ज्यादा होगी।

स्पष्ट है, सड़क हादसों के मामले में भारत का स्थिति दुनिया भर में सबसे खराब है। सड़क सुरक्षा पर आधारित ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट में भारत की स्थिति सबसे खराब बताई गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ओर से जारी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि भारत में अधिकतर बच्चे और युवा बीमारी नहीं, बल्कि सड़क दुर्घटना के कारण अपनी जान गंवाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में साल 2016 में सड़क दुर्घटना में साढ़े तेरह लाख लोग मारे गए थे। जबकि 2013 में यह आंकड़ा साढ़े बारह लाख था। मरने वाले प्रत्येक नौ लोगों में से एक भारतीय है। वहीं बच्चों और वयस्कों (5-29 साल) की मौत की सबसे बड़ी वजह सड़क दुर्घटना में घायल होना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमीर देश कुछ हद तक दुर्घटना कम करने में सफल रहे हैं, जबकि गरीब देश ऐसा नहीं कर पाए हैं। असल में विकसित देशों ने एक सक्षम बुनियादी ढांचा तैयार किया है और वहां एक मजबूत नागरिक भावना भी काम करती है। लोग स्वेच्छा से यातायात नियमों का पालन करते हैं। हमारे यहां तो आलम यह है कि सड़कें बनती हैं और कुछ दिनों बाद ही उसमें गड्ढे पड़ जाते हैं। इतना ही नहीं, जैसे ही कोई सड़क बन कर तैयार होती है उसके कुछ ही दिन बाद तार डालने, पाइप डालने जैसे कार्यों के बहाने उसे फिर से खोद दिया जाता है और फ्रि उसकी मरम्मत नहीं होती, नतीजन बड़े-बड़े गड्ढे तैयार हो जाते हैं और हादसे होते रहते हैं। शर्मनाक तो यह है कि उन्हें भरने का काम जिस विभाग के जिम्मे रहता है, वह शिथिल होकर काम करता है। वहीं, आम आदमी के भीतर यातायात नियमों की अनदेखी की प्रवृत्ति पाई जाती है। इसका कारण यातायात अमले का भ्रष्टाचार है। लोगों को लगता है कि वे पैसे देकर छूट जाएंगे। यह संकट दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों में समन्वय आवश्यक है।

बेशक यह एक बड़ा मामला है कि हमारी राजनीति जनता के जरूरी मुद्दों से भटकी रहती है। अच्छी सड़कें हमारे यहां यदा-कदा ही चुनावी मुद्दा बनती हैं, लेकिन आमतौर पर यह स्थानीय मुद्दा होता है। केंद्र या राज्य की सरकारें सड़कों के मुद्दे पर बनती या गिरती नहीं हैं। सरकारें अक्सर जो ढेर सारे वादे जनता से करती हैं, उनमें से एक बात अक्सर सड़कों को गड्ढा मुक्त करने की भी होती है। कभी-कभार यह काम होता हुआ दिखाई भी देता है। लेकिन जितने गड्ढे भरे जाते हैं, थोड़े ही समय में उससे ज्यादा नए बन जाते हैं। न तो हमें आज तक अच्छी गुणवत्ता की सड़कें ही मिल सकी हैं और न ही ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था, जिसमें गड्ढा दिखते ही उसे भरने की कवायद शुरू हो जाए। इतना तो जरूर है कि अब जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठ रहा है, तो क्या इससे कुछ उम्मीद बांधनी चाहिए? बेशक बांधनी चाहिए।कहा जाता है कि किसी देश में हुए विकास को उसकी सड़कों से समझा जा सकता है। अगर इस पैमाने पर भारत के विकास को परखें तो विकास में कई छेद नजर आएंगे। सड़कों पर जगह जगह गड्ढे, विश्व स्तर की सड़कें बनाने के सरकारी दावे को मुंह चिढ़ाते हैं। विकास के लिए सड़कों का होना और सही हालत में होना जरूरी है। भारत में केंद्र और राज्य सरकारें सड़कों को विकास का पर्याय मान, इसके निर्माण पर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं। फिर भी सड़कें ऐसी बनती हैं जिनमें कुछ समय बाद ही गड्ढे नजर आने लगते हैं। सड़कों पर इन गड्ढों की वजह से हर साल हजारों हादसे होते हैं।

लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों पर जितनी चिंता है, उतने ही सवाल भी हैं। सड़क सुरक्षा पर बार-बार सवाल उठते हैं तो यातायात नियमों में बदलाव की बात होने लगती है। वहीं सड़क हादसों में सिर्फ मौत ही नहीं होती है, बल्कि बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान भी होता है। एक अनुमान के मुताबिक सड़क हादसों में जीडीपी को तकरीबन तीन फीसद सालाना चपत लगती है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक सड़क हादसों में हर वर्ष भारत को अट्ठावन अरब डॉलर यानी तकरीबन चार लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर देश की सड़कें सुरक्षित हो जाएं और एक भी दुर्घटना न हो तो भारत का जीडीपी दहाई के अंक को छू लेगी। जाहिर है, सड़क दुर्घटनाओं की त्रासदी गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि, सरकार की तरफ दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए वाहनों के निर्माण तथा सड़कों के निर्माण में तकनीकी सुधार लाने की बात जरूर कही जा रही है। अब देखना है कि सरकार को अपने मंसूबों में कब तक सफलता मिलती है।

Next Stories
1 राजनीति: उपग्रहों का विकल्प गुब्बारे
2 राजनीति: बदहाली में जीते किसान
3 मुख्य चुनाव आयुक्त बोले, ‘EVM को हमने फुटबॉल बना दिया’
चुनावी चैलेंज
X