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राजनीति: खनन हादसों में दबे सवाल

खनन प्रभावित लोगों को बचाने के लिए कानूनों की कमी नहीं है, समस्या उन्हें लागू करने की है। खनन माफिया और राजनीतिक गठजोड़ के चलते ही ऐसे कानूनों की अनदेखी होती है, जिसका नतीजा है कि देश में अधिकृत दो हजार छह सौ खनन गतिविधियों में मानवाधिकार और पर्यावरण सुरक्षा को भारतीय कानूनों के अनुरूप सुनिश्चित करने में सरकार की पूरी व्यवस्था ही विफल हो गई है।

एक हादसा 1992 में मेघालय के दक्षिण गारो हिल्स जिले में हुआ था, तब तीस मजदूर खदान के अंदर फंस गए थे और उनमें से आधे मारे गए थे।

अभिषेक कुमार सिंह

एक तरफ जब उत्तर प्रदेश में खनन घोटाले को लेकर सियासी माहौल गरमाया हुआ है, देश के सुदूर उत्तर-पूर्व में महीने भर पहले हुए खदान हादसे को देख कर लगता ही नहीं है कि वहां फंसे पंद्रह मजदूरों की किसी को कोई फिक्र भी है। मेघालय के जयंतिया हिल्स जिले के एक गांव शान के नजदीक तीन सौ सत्तर फीट गहरी अवैध कोयला खदान पानी भरने के कारण धंस गई थी और उसमें ये मजदूर फंस गए थे। एक तो इस हादसे की सूचना ही देर से मिली, फिर उसके बाद बचाव कार्य भी इतनी सुस्ती के साथ शुरू किए गए जिससे यही साफ हुआ कि बेहद निचले तबके से आने वाले पंद्रह मजदूरों की जान की परवाह किसी को नहीं थी। वरना क्या वजह थी कि जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और उसने भी राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि मजदूरों की जान बचाने को एक-एक सेकंड कीमती है, उसके बावजूद उन मजदूरों का अब तक कोई सुराग तक नहीं मिला है।

मेघालय के इस खान हादसे को एक महीना बीत गया है। अब यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि आखिर उन मजदूरों का क्या हुआ होगा। यह मामला जहां हमारी सामाजिक-राजनीतिक संवेदना पर कुठाराघात है, वहीं इससे यह सवाल भी उठा है कि आखिर हमारे देश में खनन उद्योग को लेकर इतने कुहासे क्यों छाए हुए हैं। खासतौर से यह देखते हुए कि एक तरफ यह उद्योग भारी भ्रष्टाचार को जन्म दे रहा है, तो दूसरी ओर इसमें काम करने वाले मजदूरों के हितों की किसी को कोई परवाह ही नहीं है। मेघालय की रैट होल खदान में मजदूरों के साथ जो हादसा हुआ है, वह कोई नया नहीं है। यहां पहले भी ऐसी दुर्घटनाएं हुई हैं। एक हादसा 1992 में मेघालय के दक्षिण गारो हिल्स जिले में हुआ था, तब तीस मजदूर खदान के अंदर फंस गए थे और उनमें से आधे मारे गए थे। इसी जिले में 2012 में खदान के अंदर फंसे चौदह बाल मजदूरों की लाशों को आज तक नहीं निकाला जा सका। अवैध खनन के कारण इस पर्वतीय राज्य के नष्ट होते पर्यावरण और नदियों की दुर्दशा के मद्देनजर राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने अप्रैल 2014 से वहां कोयला खनन और ढुलाई पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद अवैध ढंग से वहां खनन कार्य होता रहा और पर्याप्त सुरक्षा के बिना मजदूरों को खदानों में भेजा जाता रहा है। रैट होल खदानों से कोयला निकालने की क्या मजबूरी है और ये खानें इतनी जोखिमपूर्ण क्यों हैं, इसके जवाब यहां की सामाजिक और भौगोलिक संरचनाओं में छिपे हैं। असल में, बेरोजगारी की मार से जूझ रहे मेघालय के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के युवाओं के पास कोयला खदानों में काम करने के अलावा कोई रोजगार नहीं है। ऐसे में वे खतरनाक अवैध खदानों में काम करने को मजबूर हैं। स्थानीय युवाओं के अलावा कोयले की इन खानों में उतारने के लिए नेपाल और पड़ोसी राज्यों से बच्चे बाल मजदूर के रूप में लाए जाते रहे हैं।

यहां अरसे से कोयला माफिया सत्ता पर हावी रहा है, इसलिए इसके आतंक के आगे हर कोई चुप है। हालत यह है कि जयंतिया हिल्स इलाके में ही पांच हजार से ज्यादा अवैध कोयला खानें हैं, लेकिन उन पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में जब तक कोई बहुत ही बड़ा मामला न हो, तब तक उसकी पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं लिखी जाती। कोयला खदान मालिकों की राज्य की सत्ता पर पकड़ का अंदाजा इस तथ्य से हो जाता है कि 2014 के विधानसभा चुनाव मैदान में उतरे राजनेताओं में से तीस फीसद या तो कोयला खदान मालिक ही थे या फिर ये कोयला ढुलाई के धंधे में थे। इनमें से ज्यादातर ने चुनाव में जीत हासिल की थी। कोयले का परिवहन मेघालय में एक अहम मसला इसलिए है कि एनजीटी ने 2014 में जब अवैध खनन पर रोक लगाई थी, तो राज्य सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा था कि वह देखे कि अप्रैल 2014 के बाद इन खदानों से निकाले गए कोयले की ढुलाई न होने पाए। यह व्यवस्था इसीलिए की गई थी ताकि अवैध खदानों से कोयला न निकाला जाए। इस आदेश से बचने के लिए कोयला माफिया घूस देकर लदान वाले ट्रकों के जो चालान बनवाता है, उन पर दर्ज किया जाता है कि इस कोयले का 2014 से पहले खनन किया गया था। मेघालय से असम के कछार और करीमगंज जिले तक और फिर त्रिपुरा और बांग्लादेश तक, इसी तरह मेघालय से कार्बी आंगलांग, धरमतुल, जागीरोड, जोराबाट और अन्य स्थानों तक कोयले से लदे ट्रकों को नकली चालान के जरिए भेजा जाता है। सवाल है कि मेघालय में कोयला खनन की ऐसी मजबूरी क्या है, जबकि सल्फर की बहुतायत वाला मेघालय का कोयला घटिया गुणवत्ता का होता है और इसकी कीमत भी कम मिलती है। असल में इन सवालों का एक बड़ा जवाब यही है कि इस राज्य में दूसरे ऐसे उद्योग धंधे नहीं हैं जिनसे मालिकों को अच्छी कमाई हो सके और उनमें काम करने वाले श्रमिकों की भी आर्थिक स्थिति अच्छी हो सके। इसमें भी संदेह नहीं है कि मेघालय में एनजीटी द्वारा प्रतिबंध के बाद लोगों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई, जिसके बाद खदान मालिकों ने अवैध ढंग से कोयला निकालने का काम शुरू कर दिया।

मेघालय के मुख्यमंत्री कोनरॉड संगमा ने इसी तथ्य के मद्देनजर कोयला खनन पर लगी पाबंदी के मुद्दे का हल खोजने की कोशिश की बात कही थी। हालांकि उन्होंने इसके लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाने की बात उठाई थी। इसकी वजह यह है कि ऐसा करने में खर्च है, क्योंकि इसके लिए पर्याप्त उपकरणों की जरूरत होती है, मजदूरों की सुरक्षा के नियम-कायदे अपनाए जाते हैं और इसमें खनन के लिए बंद घोषित खदानों को छुआ नहीं जाता है। मेघालय सरकार को कोयला खनन से सालाना सात सौ करोड़ रुपए का राजस्व मिलता है। ऐसे में यदि कानून सम्मत प्रक्रिया अपनाई जाती है तो खर्च और कमाई का यह आंकड़ा काफी हद तक बदल जाएगा। इसीलिए कोई सरकार कानूनी प्रक्रिया पर आगे नहीं बढ़ना चाहती है। रैट होल खदानें पारंपरिक खदानों के मुकाबले बेहद संकरी और चूहों के बिल की तरह होती हैं जिनमें श्रमिक लेट कर घुसते हैं और कोयला निकालते हैं। ये मजदूर अंदर जाकर तब तक खुदाई करते हैं, जब तक कि कोयले की परत नहीं मिल जाती है। कोयला नहीं मिलने की सूरत में मजदूर खुदाई करते हुए 100 से 400 फीट की गहराई में भी चले जाते हैं, जहां खदान धंसने की स्थिति में उनकी जान खतरे में पड़ जाती है। बहरहाल, अब ज्यादा बड़ी चिंता यह है कि मेघालय हादसे से ऐसा क्या सबक लिया जाए कि भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो। खनन प्रभावित लोगों को बचाने के लिए कानूनों की कमी नहीं है, समस्या उन्हें लागू करने की है। खनन माफिया और राजनीतिक गठजोड़ के चलते ही ऐसे कानूनों की अनदेखी होती है, जिसका नतीजा है कि देश में अधिकृत दो हजार छह सौ खनन गतिविधियों में मानवाधिकार और पर्यावरण सुरक्षा को भारतीय कानूनों के अनुरूप सुनिश्चित करने में सरकार की पूरी व्यवस्था ही विफल हो गई है। भारत में खनन व्यवसाय को नियंत्रित करने के बारे में बने ज्यादातर कानून 1950 के दशक के हैं और वे आज की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं रह गए हैं। अब जरूरी है कि सरकार कानूनों को ठीक तरह से लागू करे और खनन गतिविधियों की समुचित निगरानी करे।

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