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कैसे बढ़े महिलाओं की भागीदारी

भारत के लोकतंत्र के लिए यह दुखद ही है कि पिछले बासठ सालों में लोकसभा में चुनी हुई महिलाओं की मौजूदगी दोगुनी भी नहीं हुई है। बड़े और प्रमुख राजनीतिक दल महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने और लोकसभा व विधानसभाओं में तैंतीस फीसद आरक्षण देने की चाहे जितनी वकालत करें, उनकी कथनी और करनी में फर्क बरकरार है।

पांच सौ तियालीस सीटों वाली लोकसभा में इस समय बासठ महिला सांसद हैं।

संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी पर्याप्त संख्या में नहीं है। शुरुआत से ही संसद में महिला व पुरुष सदस्यों का अनुपात असमान रहा है। चिंता की बात यह है कि महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या के बावजूद राज्य विधानसभाओं में उनकी उपस्थिति बमुश्किल सात से आठ फीसद है तो संसद में उनकी मौजूदगी महज बारह फीसद है। जबकि भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का करीब अड़तालीस फीसद हैं। लेकिन विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार रोजगार में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ छब्बीस फीसद है। गौर करने वाली बात यह है कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में महिला साक्षरता की दर पैंसठ फीसद है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि देश में साक्षर महिलाओं में से आधी महिलाएं देश की जीडीपी में अपनी भूमिका तय नहीं कर पा रही हैं। अगर संसद में उनकी भागीदारी की बात की जाए तो वर्तमान में यह महज बारह फीसद के आसपास है। पांच सौ तियालीस सीटों वाली लोकसभा में इस समय बासठ महिला सांसद हैं। इससे पहले 2009 में अट्ठावन महिलाएं थीं। थोड़ा-सा ग्राफ जरूर बढ़ा, मगर तैंतीस फीसद आरक्षण के हवाले से तो यह नगण्य ही कहा जाएगा। इन आंकड़ों को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि देश में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर हमारा राजनीतिक नेतृत्व क्या सोचता है।

भारत के लिए लोकतंत्र के लिए यह दुखद ही है कि पिछले बासठ सालों में भारत की लोकसभा में चुनी हुई महिलाओं की मौजूदगी दोगुनी भी नहीं हुई है। बड़े और प्रमुख राजनीतिक दल महिलाओं को बराबरी का दर्जा और लोकसभा व विधानसभाओं में तैंतीस फीसद आरक्षण देने की चाहे जितनी वकालत करें, उनकी कथनी और करनी में फर्क बरकरार है। महिलाओं के सशक्तिकरण और बराबरी की बात करने वाले दलों की असलियत टिकट वितरण के समय सामने आ जाती है। पितृ-सत्तात्मक संरचना वाले समाज में घर हो या दफ्तर, सड़क हो या संसद, स्त्रियों के विकास का ढोल तो खूब पीटा जाता है, पर उनके हितों को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना नहीं दिखती। यह ठीक है कि चुनावों के पहले तो सभी दल महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात करते रहे हैं, लेकिन अभी तक संसद में महिला आरक्षण संबंधी बिल नहीं पारित हुआ है। आजादी हासिल करने के साथ ही भारत में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिल गया था, जबकि पश्चिमी देशों की महिलाओं को मतदान का अधिकार हासिल करने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। मतदान के लिहाज से आजादी के बाद के दशकों में बतौर मतदाता महिलाएं कम ही सामने आर्इं। लेकिन अब चुनाव दर चुनाव महिला मतदाताओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और किसी भी सरकार को चुनने में अब वे निर्णायक भूमिका में हैं। लेकिन संसद में तैंतीस फीसद आरक्षण के अधिकार से आज भी वंचित हैं। जबकि आधी आबादी तो पचास फीसद आरक्षण चाहती है। एक मतदाता के रूप में शुरू हुआ भारतीय महिला का राजनीतिक सफर गांव-पंचायत, विधानसभा और फिर संसद तक के पड़ावों तक पहुंचते-पहुंचते पस्त होने लगता है।

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव के लिए ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की कुल बयालीस लोकसभा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस की तरफ से चालीस फीसद यानी सत्रह महिला उम्मीदवारों को उतारा है। पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य ओड़िशा में बीजू जनता दल (बीजद) के सुप्रीमो नवीन पटनायक ने अपनी पार्टी से इक्कीस उम्मीदवारों में से सात महिलाएं यानी तैंतीस फीसद महिलाओं को टिकट देने का फैसला किया। साफ है, दोनों राज्य सरकारों का यह फैसला महिलाओं को सशक्त बनाने के उनके इरादे के अनुरूप है। लेकिन अन्य दल इस कवायद में पीछे क्यों रहे, यह तो मतदाताओं को पूछना ही चाहिए। मालूम हो, बीते साल ओड़िशा विधानसभा ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए तैंतीस फीसद आरक्षण का प्रस्ताव पारित किया था। यह कदम प्रशंसनीय है क्योंकि लंबे समय से चले आ रहे इस प्रस्ताव को अधिकांश दलों ने महज दिखावे और शोरशराबे तक सीमित रखा है। दिलचस्प बात यह है कि शक्तिशाली महिला नेताओं के नेतृत्व में भी महिलाओं को विधायिका में समुचित हिस्सेदारी का कदम महज वादों और बातों तक सीमित रह गया है। दरअसल, जब संविधान में एक सौ आठवां संशोधन विधेयक, 2008 का प्रस्ताव आया था तब एक-तिहाई लोकसभा व विधानसभा सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बाबत उम्मीद की एक किरण जगी थी। प्रस्ताव को 2010 में राज्यसभा ने पारित कर दिया था, पर लोकसभा ने उस पर कभी मतदान नहीं किया। वर्ष 1990 में बीजू पटनायक पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं के लिए तैंतीस फीसद कोटा लागू करने वाले देश के पहले मुख्यमंत्री थे और 2012 में नवीन पटनायक ने इसे पचास फीसद तक बढ़ाया। लेकिन भाजपा और कांग्रेस इस संकल्प को दोहराते तो जरूर रहे कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण देंगे, लेकिन टिकट देने की बारी आई तो दोनों ही दल अपने वादे से पीछे हटते नजर आए। इससे पता चलता है कि भारत के संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की स्थिति कितनी कमजोर है।

दुनियाभर की संसदों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर अंतर-संसदीय संघ के ताजा अध्ययन से चलता है कि यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्य विकसित देशों की संसदों में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या के मुकाबले हम कहीं नहीं ठहरते। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी इस मामले में हमसे कहीं आगे हैं। अफ्रीकी महाद्वीप के कुछ अति पिछड़े देशों की संसदों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी भारत से ज्यादा है।
महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 12 सितंबर 1996 को एचडी देवेगौड़ा की सरकार में लाया गया था। तब से लेकर अब तक कई बार इस विधेयक को संसद से पारित करवाने की कोशिश की गई। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। क्षेत्रीय दल विरोध में खड़े रहे। कई बार इस बिल को लेकर क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने आरोप लगाए कि इसके माध्यम से पिछड़े वर्ग का हक मारा जाएगा। उन्हें डर है कि कथित उच्च जाति की महिलाओं को यह मौका मिल जाएगा। हालांकि, जिस प्रकार से तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधन के द्वारा पंचायत और नगर पालिका में महिलाओं को तैंतीस फीसद आरक्षण दिया गया है, वह कमोबेश सफल रहा है। महिलाओं की न सिर्फ भागीदारी बढ़ी है, बल्कि उन्होंने बराबर काम भी किया है। सवाल है कि अगर महिलाएं देश की आबादी का आधा हिस्सा हैं तो राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है? इस सवाल का जवाब किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है। विडंबना यह है कि आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद आज भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो रही है। वाकई यह स्थिति चिंताजनक है। देश की सक्रिय राजनीति में उन सीमित महिलाओं ने जगह बनाई है जो या तो खुद राजनीतिक परिवार से रही हैं या फिर जिन्हें किसी बड़े राजनेता का संरक्षण मिला है। किसी साधारण घर से निकल कर राजनीति में जगह बनाने वाली महिलाओं के उदाहरण कम हैं। जब तक महिलाओं का राजनीति में सम्मानजनक तरीके से प्रवेश नहीं होगा तब तक उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ने की उम्मीद भी कम ही है। आज जरूरत इस बात की है कि संसद के अगले सत्र में जो भी सरकार आए, सारे दलों को पश्चिम बंगाल और ओड़िशा का उदाहरण देते हुए इस बिल को पास कराने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए।

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