रोजगार की चुनौती

देश में लगातार बढ़ती बेरोजगारी से स्पष्ट है कि गरीबी-उन्मूलन और रोजगार-सृजन पर केंद्रित योजनाएं वास्तविक उद्देश्य से बुरी तरह पिछड़ी हुई हैं। इन योजनाओं के प्रति बरती गई लापरवाही बेरोजगारी को लेकर सरकार के नकारात्मक दृष्टिकोण को ही उजागर करती है। योजनाओं का अंबार लगा देने भर से बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

unemployment rate, unemployment rate india, unemployment rate 2019 india, jobless rate india, jobs rate india, employment rate india, job growth rate india, unemployment data indiaएक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की बेरोजगारी दर 2017-18 में 45 वर्ष के उच्‍चतम स्‍तर पर पहुंच गई थी। (Photo : PTI)

संजय ठाकुर

भारत में बेरोजगारी की मौजूदा दर पिछले पैंतालीस वर्षों में सबसे ज्यादा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार यह दर 6.1 फीसद है जो कि वर्ष 1972-73 के बाद सबसे ज्यादा है। वर्ष 2011-12 में यह सिर्फ 2.2 फीसद थी। केंद्र सरकार ने एक वर्ष पहले रोजगार से संबंधित सर्वेक्षण नहीं करवाए जाने की बात कही थी। इसके बाद जब सर्वेक्षण करवाया गया तो रोजगार की बुरी स्थिति सामने आई और राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद भी सरकार ने इसे जारी नहीं किया। रोजगार के आंकड़े जारी नहीं किए जाने के विरोध-स्वरूप आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष पीसी मोहनन और सदस्य जेवी मीनाक्षी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। बेरोजगारी से संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं होने से सरकार पर पहले से ही लगातार सवाल उठ रहे थे कि भारत में रोजगार की स्थिति जानने के लिए सर्वेक्षण क्यों नहीं करवाया जा रहा है। इसका सीधा-सा अर्थ यही निकलता है कि सरकार देश में रोजगार और बेरोजगारी की वास्तविक स्थिति से संबंधित तथ्यों को सामने लाने से बच रही थी।

एनएसएसओ की रिपोर्ट में इस बात को भी उजागर किया गया है कि बेरोजगारों में सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की है जो तेरह से सत्ताईस फीसद है। ज्यादातर बेरोजगार शहरी क्षेत्रों में हैं। शहरी क्षेत्रों में जहां बेरोजगारी की दर 7.8 फीसद है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 5.3 फीसद है। शहरी क्षेत्रों में पंद्रह से उनतीस वर्ष के आयु-वर्ग में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है। शहरों में इस आयु-वर्ग के 18.7 फीसद युवक और 27.2 फीसद युवतियां हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 17.4 फीसद युवक और 13.6 फीसद युवतियां बेरोजगार हैं। यह समस्या तब और भी विकट हो जाती है जब हर महीने लगभग दस लाख नए रोजगार की जरूरत पड़ती है और इसकी तुलना में रोजगार-सृजन न के बराबर ही हो रहा है। रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि देश के लगभग सतहत्तर फीसद घरों में नियमित वेतन या आय का कोई साधन नहीं है। इस रिपोर्ट से एक नतीजा यह निकलता है कि लघु व मध्यम दर्जे के उद्योग पूरी तरह से उपेक्षित हैं। इनकी हालत अच्छी नहीं है। ये उद्योग लगभग चालीस फीसद लोगों को रोजगार दे रहे हैं। भारत में निर्मित सामान में इनका हिस्सा पैंतालीस फीसद और कुल निर्यात में चालीस फीसद है। कोई भी सहायक सरकारी नीति न होने से इन उद्योगों को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है। सरकार की वित्तीय नीतियां भी बड़ी कंपनियों पर ही केंद्रित होती हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी इन छोटे उद्योगों को कर्ज देने की बजाय बड़ी कंपनियों को ज्यादा तवज्जो देते हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से छोटे उद्यमों को अपने उत्पादों को बाजार में बेचना मुश्किल हो गया है। ऐसे में सरकारी उपेक्षा के शिकार इन उद्योगों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं और इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ता है। लगभग चार से पांच करोड़ कामगार अभी भी भारत के असंगठित व अनौपचारिक उपक्रमों में कार्यरत हैं। इनमें ज्यादा संख्या किसानों की है। संगठित उपक्रमों में रोजगार के बहुत कम अवसर होने से अनौपचारिक व असंगठित क्षेत्रों का महत्त्व और बढ़ जाता है। संगठित उपक्रमों में अतिरिक्त श्रम बल के समायोजन की क्षमता अत्यंत सीमित होती है। संगठित उपक्रमों में विकास को विशेषकर स्थानीय नीतियां प्रभावित करती हैं। छोटे संगठित क्षेत्रों को कौशल रहित लोगों को रोजगार देना, नकदी अभिदान आदि जैसी विवशताओं से पार पाना मुश्किल हो जाता है जिस कारण ऐसे उद्यमों का चल पाना खटाई में पड़ जाता है।

यों तो देश में गरीबी उन्मूलन और रोजगार-सृजन के लिए सरकार ने बहुत-से कार्यक्रम चलाए हैं, लेकिन सही क्रियान्वयन के अभाव में ये कार्यक्रम कागजों में योजनाओं और नीतियों के रूप में ही दर्ज रह जाते हैं और गरीबी हटाने, गरीबों की आय बढ़ाने, नए रोजगार पैदा करने, उत्पादक-परिसंपतियां बनाने और तकनीक व उद्यमिता से संबंधित कौशल बढ़ाने में इनका कोई योगदान नहीं हो पाता। ये योजनाएं गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों को रोजगार देने और इनके स्वरोजगार पर लक्षित हैं, लेकिन सरकार व संबंधित प्रशासन द्वारा सही तरह से कार्यरूप न दिए जाने से लोग इनका लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं। यह एक विडंबना ही है कि गरीबी हटाने और रोजगार बढ़ाने के लिए बनाई गई योजनाएं न तो गरीबी हटा पाती हैं और न ही रोजगार-सृजन में इनका कोई बड़ा योगदान होता है।देश में लगातार बढ़ती बेरोजगारी से यह स्पष्ट है कि गरीबी-उन्मूलन और रोजगार-सृजन पर केंद्रित योजनाएं वास्तविक उद्देश्य से बुरी तरह पिछड़ी हुई हैं। इनके क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े होते हैं जिनके प्रति सरकार जवाबदेह है। इन योजनाओं के प्रति बरती गई लापरवाही बेरोजगारी को लेकर सरकार के नकारात्मक दृष्टिकोण को ही उजागर करती है। योजनाओं का अंबार लगा देने भर से बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। रोजगार से संबंधित किसी एक योजना के सही क्रियान्वयन से भी निश्चित ही रोजगार के क्षेत्र में उत्साहजनक परिणाम निकल सकते हैं। बेरोजगारी की समस्या से कई मोर्चों पर लड़ने की जरूरत है। अनौपचारिक व असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों और स्वरोजगार में लगे लोगों के लिए समुचित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि उनके कौशल को बढ़ा कर उनकी उत्पादकता और आय में सुधार लाया जा सके। प्रशिक्षण के क्षेत्र में केंद्र व राज्यों की सरकारों और गैर-सरकारी संगठनों के बीच तालमेल और पारदर्शिता लाने की जरूरत है। रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए यह जरूरी है कि निर्यात करने वाले बड़े, लघु व मध्यम दर्जे के और कृषि-उत्पादों की प्रोसेसिंग करने वाले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। इससे गांवों और कस्बाई क्षेत्रों के युवाओं को भी रोजगार के लाभ से जोड़ा जा सकेगा।

देश में रोजगार के अनुरूप प्रशिक्षण की बहुत ज्यादा जरूरत है। रोजगार के लिए लोगों का कौशल बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार के अवसर पैदा किए जाने चाहिए। श्रमबल की गुणवत्ता को बढ़ाने और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार को पैदा करने में सक्षम विकास-प्रक्रिया की सहायक कौशल-विकास और शिक्षा संबंधी समुचित नीतियों को लागू करने की भी जरूरत है। व्यक्तिगत क्षेत्र में रोजगार-सृजन के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण समुचित क्षेत्रीय स्तर की नीतियों का अनुसरण किया जाना चाहिए। क्षेत्रीय स्तर की इन नीतियों को व्यापक रूप से सकल घरेलू उत्पाद की विकास-दर के उद्देश्य के भी अनुकूल होना चाहिए। कृषि-विस्तार सेवाओं को सुदृढ़ करने के अतिरिक्त उपभोक्ता-अधिभार, स्टांप-शुल्क और संपत्ति-कर को और तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए। ऐसी बातों पर ध्यान देकर सात से दस करोड़ लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बजाय श्रम-बाजार में स्थानीय उद्योगों की स्थिति को मजबूत करने की जरूरत है। संगठित क्षेत्रों में श्रम-बाजार को चलाने वाली नीतियां सुदृढ़ करने के साथ-साथ एक ऐसा कानूनी वातावरण बनाया जाना चाहिए जिसमें ज्यादा से ज्यादा कामगारों को लाभ पहुंचाया जा सके। ऐसे उपायों से निश्चित ही बेरोजगारी कम की जा सकती है। वर्तमान समय में देश में ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, रोजगार व खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करवाने के लिए संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना और गांवों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों को साल में एक सौ दिन का रोजगार देने की गारंटी प्रदान करने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना चलाई जा रही है। इसके अलावा श्रमिकों के लिए रोजगार, कौशल विकास और अन्य सुविधाओं में सुधार करने के लिए दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते योजना जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद रोजगार के मौके पैदा नहीं हो रहे और बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ रहा है।

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