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राजनीतिः अंधविश्वास का जाल

धर्म के बढ़ते व्यवसायीकरण ने इसे बाजार का ऐसा बिकाऊ माल बना दिया है जिसमें लागत लगभग शून्य और कमाई लाखों-करोड़ों में है। आज बहुत सारे कथित बाबाओं, मुल्लाओं, धर्मगुरुओं और उनके चेलों के लिए यह मोटी कमाई का जरिया बन चुका है। ये लोग येन-केन-प्रकारेण आम लोगों को मूर्ख बना कर लूटने में लगे हैं।

Author Updated: February 29, 2020 8:05 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

संगीता सहाय

बीते दो-ढाई दशकों में हमारे समाज में कट्टर धार्मिक गतिविधियों ने गहरी पैठ बनाई है। विभिन्न धार्मिक प्रक्रमों जैसे पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार, धार्मिक यात्राएं, प्रवचन, धर्म प्रचार आदि में हर आम और खास बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाने लगा है। समाज के हर स्तर के लोगों के लिए उनके आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक स्तर को ध्यान में रखते हुए धार्मिक समूहों का निर्माण हो रहा है। आए दिन कथित धर्माचार्यों के नेतृत्व में मजलिसें, जलसे सहित तमाम प्रकार के धार्मिक आयोजन हो रहे हैं और लगभग सभी में लोगों की उमड़ती भीड़ ऐसे आयोजनों की राह को ज्यादा प्रखर और मुखर बना रही है। यह स्थिति समाज के हर वर्ग और कमोबेश सभी धर्मों में समान रूप से बढ़ी है।

प्रश्न उठता है कि आखिर इस बढ़ती कट्टर धार्मिकता और अंधविश्वास के क्या कारण हैं? क्यों लोग अपनी सहज जीवन शैली को छोड़ कर असहजता को अपनाते जा रहे हैं? आज के इस वैज्ञानिक युग में लोग सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक घर, बाहर, दफ्तर, बाजार हर तरफ आधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों का धड़ल्ले से उपयोग कर अपने जीवन के नवीनीकरण का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों को तोड़ कर उनके स्थान पर अपने मनमाफिक नियमों को भी अपना रहे हैं। अपनी आधुनिकता का प्रदर्शन वे पहनावे, रहन-सहन, विचारों की प्रस्तुति से लेकर हर चीज में कर रहे हैं। पर बात जैसे ही धार्मिक विषयों की होती है तो लोग पहले से ज्यादा परंपरागत और कठोर दिखने लगते हैं। बड़े-बड़े पदों पर बैठा और बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल किया व्यक्ति भी आसानी से संकीर्ण धार्मिकता के चोले को धारण कर ले रहा है। वैसे लोग अपने आप को सही सिद्ध करने के लिए बनावटी प्रकरणों, तर्कों और उदाहरणों का सहारा लेकर आसानी से दूसरों को प्रभावित भी कर रहें हैं। बदलाव की इन वजहों को खोजने के लिए आवश्यक है कि हम बीते वर्षों के दौरान समाज के विभिन्न क्षेत्रों जैसे घरेलू, व्यावसायिक, शैक्षणिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि में आए परिवर्तनों पर गौर करें।

युवा होते इक्कीसवीं सदी के इस दौर का भारत आधुनिकता, परंपरा और विकास के संक्रमण काल से गुजर रहा है। बढ़ता व्यक्तिवाद, भोगवाद, सब-कुछ एक साथ पा लेने की चाह, नित नए होने वाले अन्वेषण, वैश्वीकरण, टूटती सामाजिक और पारिवारिक वर्जनाओं आदि ने मनुष्य को एक तरफ नया करने और नया पाने का स्वप्न दिखाया है, तो दूसरी तरफ उसमें असफलता का डर भी बैठाया है। इसी डर ने उसे धार्मिक कर्मकांडों के और करीब किया है। एक तरफ ऐसे लोग हैं जो अपने कार्यक्षेत्र में सफल हैं, वे अपनी सफलता को बचाए, बनाए रखने और ज्यादा से ज्यादा ऊंचाइयों को छूने के लिए कर्म के साथ-साथ पूजा-पाठ आदि को भी तरजीह देने लगे हैं। दूसरी तरफ वे लोग भी हैं जो सिर्फ इन्हीं रास्तों पर चल कर सफलता की तलाश में लगे है। अत्यधिक व्यस्तता, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़, मित्रों, रिश्तेदारों से बढ़ती दूरी, कृत्रिम और बनावटी माहौल आदि ने भी लोगों के जीवन की सहजता और मानसिक शांति को भंग कर दिया है। ऐसे में वे सुकून की तलाश में इन राहों पर बढ़ने लगे हैं।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात है, आजादी से लेकर अब-तक विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने विचारों और नीतियों से अलग-अलग समय पर अलग-अलग विचारधारा और धर्मों से जुड़े लोगों के बीच उनके धर्म और पहचान को लेकर असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है। इस असुरक्षा ने उन्हें और कट्टर तथा धर्मभीरू बना दिया है। इसी ने धर्म को व्यक्तिगत भावनाओं से निकाल कर सड़कों और चौराहों का विषय बना दिया है। हजारों वर्ष पूर्व भारत पर पहला विदेशी आक्रमण करने वाले ईरान के हखामनी साम्राज्य के शासकों से लेकर अंग्रेजों के भारत आक्रमण तक सैकड़ों विदेशी आक्रमणकारी इस ‘सोने की चिड़िया’ रूपी देश पर कब्जा जमाने, यहां से संपत्ति लूट कर ले जाने का कृत्य कर चुके हैं। उनमें से कुछ सफल हुए, कुछ असफल। कुछ अपने लक्ष्य की पूर्ति कर यहां से चले गए, तो कुछ इस जमीं की सहजता, सौम्यता और सौंदर्य के मोहपाश में बंध कर यहीं के हो गए। अलग-अलग धर्मों के प्रचारकों ने भी विभिन्न तरीकों से भारतीय लोगों को अपने धर्मों में दीक्षित करने का कार्य व्यापकता के साथ किया।

फलत: भारत भूमि विविध धर्मी और विविध जातीय बनती गई। एक तरफ हमें इस बहुलता के ढेरों फायदे मिले, तो दूसरी तरफ इससे हमारे सामाजिक ताने-बाने को चोट पहुंचने का भी खतरा बना रहा है। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल के दौरान बार-बार इसे एक घातक हथियार के रूप में प्रयोग किया और लगभग वही काम आजादी के बाद से लेकर अब-तक देश की विभिन्न राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय राजनीतिक पार्टियां कुछ खास तबकों के तुष्टीकरण और सामाजिक समरसता को तोड़ कर अपने पक्ष में जनमत तैयार करने और देश को बांटने के लिए कर रही हैं। राजनीतिक दलों ने लोगों के मन और देहरियों के भीतर विराजमान ईश्वर-अल्लाह को वोट की मशीन के रूप में बदल दिया है। फलस्वरूप देश का आम आदमी पहले से और ज्यादा ध्रुवीकृत और अपने कथित धार्मिक खूंटे से बंधता जा रहा है।

धर्म के बढ़ते व्यवसायीकरण ने इसे बाजार का ऐसा बिकाऊ माल बना दिया है जिसमें लागत लगभग शून्य और कमाई लाखों-करोड़ों में है। आज बहुत सारे कथित बाबाओं, मुल्लाओं, धर्मगुरुओं और उनके चेलों के लिए यह मोटी कमाई का जरिया बन चुका है। ये लोग येन-केन-प्रकारेण आम लोगों को मूर्ख बना कर लूटने में लगे हैं। सैकड़ों वर्षों की विदेशी दासता ने भारत को आर्थिक और सामाजिक रूप से जर्जर करने के साथ-साथ भारतीयों को मानसिक रूप से भी खोखला कर दिया था। गरीबी, प्राकृतिक आपदाओं की मार, अशिक्षा, खराब कृषि एवं औद्योगिक व्यवस्था आदि ने लोगों को धर्मभीरू और कमजोर बनाने के साथ-साथ उन्हें उनके कर्म से भी दूर किया। वे अपने तमाम कष्टों और व्याधियों का इलाज धार्मिक कर्मकांडों, ओझा, पंडितों और मुल्लाओं के द्वारा ढंूढ़ने लगे। पिछले जन्म के कर्मों और दुर्भाग्य जैसे प्रपंचपूर्ण शब्दाडंबरों में फंसने लगे। आजादी के दौरान और उसके बाद के वर्षों में लगातार किए गए सामाजिक उत्थान के कार्यों के फलस्वरूप हम बहुत हद तक इन प्रपंचों से बाहर निकल चुके थे। पर बीते दो-ढाई दशकों में धर्म के घातक व्यवसायीकरण का जाल धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था को अपने आगोश में लेने को आतुर दिखने लगा है। इसने अपना स्वरूप इस प्रकार गढ़ लिया है कि समाज का सक्षम, पढ़ा-लिखा और सामान्य अनपढ़ वर्ग सभी इसके आगोश में समाते दिख रहे हैं।

ध्यातव्य है कि देश के आम आदमी के जीवन में इस हद तक धर्मभीरूता और कट्टरता का समावेश भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए घातक है। अंतराष्ट्रीय पत्रिका ‘साइंस एड्वांसेज’ में पिछले दिनों छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, जो समाज या देश जितना धर्मनिरपेक्ष होता है, वहां आर्थिक विकास की गति उतनी ही तेज होती है। रिपोर्ट बताती है कि धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक संपन्नता में यद्यपि कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, परंतु जैसे-जैसे समाज में सहिष्णुता आती है, वैसे-वैसे आर्थिक गतिविधियों में ज्यादा से ज्यादा आबादी की हिस्सेदारी बढ़ती है और इससे विकास दर भी बढ़ती है। अंतत: कहा जा सकता है कि बढ़ती कट्टर धार्मिकता और अंधविश्वास का कॉकटेल हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक है। यह तेजी से विकसित होते भारत के जड़ में मट्ठा डालने का काम कर रहा है। चंद लोग अपने-अपने फायदे के लिए इसे उन्मादी नशे के रूप में प्रयोग कर रहे हैं और चारों तरफ फैला रहें है। आम भारतीय को इस गहरी साजिश को समझने के साथ-साथ अपने मन के भटकाव को भी रोकना होगा।

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