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राजनीतिः वित्तवर्ष में बदलाव और विकास

जनवरी में बजट पेश करने पर किसानों का खयाल रखने के साथ-साथ मुद्रास्फीति का आकलन, कारोबारियों के कारोबार का अंदाजा आदि लगाना आसान होगा। साथ ही देश की बेहतरी के लिए बजट में बेहतर प्रबंधन किए जा सकेंगे।

Author May 5, 2017 2:56 AM
नीति आयोग संचालन परिषद की तीसरी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से वित्तवर्ष की अवधि में बदलाव की वकालत की।

नीति आयोग संचालन परिषद की तीसरी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से वित्तवर्ष की अवधि में बदलाव की वकालत की। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि वित्तवर्ष की अवधि 01 अप्रैल से 31 मार्च को बदल कर 1 जनवरी से 31 दिसंबर कर दी जाए। उनका मानना है कि ऐसा करने से सरकार को कृषि की दशा का आकलन करने में आसानी होगी और किसानों की बेहतरी के लिए बजट में बेहतर प्रावधान किए जा सकेंगे। इस साल 1 फरवरी को बजट पेश करने से कृषि से जुड़े प्रावधानों को बजट में शामिल करने में आसानी हुई। इससे वित्तवर्ष की अवधि में बदलाव लाने की धारणा मजबूत हुई है।

मध्यप्रदेश वित्तवर्ष में बदलाव करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। अब यहां वित्तवर्ष का समय कैलेंडर वर्ष के मुताबिक जनवरी-दिसंबर होगा। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 अप्रैल को नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में सभी राज्यों को वित्तवर्ष में बदलाव करने के लिए अपने सुझाव देने के लिए कहा था। मध्यप्रदेश सरकार का निर्णय इसी परिप्रेक्ष्य में लिया गया है। जाहिर है, मध्यप्रदेश सरकार के निर्णय से दूसरे राज्यों के लिए भी वित्तवर्ष में बदलाव का रास्ता साफ हुआ है।

अमेरिका में वित्तवर्ष की अवधि 1 अक्तूबर से 30 सितंबर है। 1974 से पहले वहां वित्तवर्ष की अवधि 1 जुलाई से 30 जून थी। अमेरिका ने जब 1974 में अपना वित्तवर्ष बदला, तो वहां की संसद ने ‘कांग्रेसनल बजट ऐंड इंपाउंडमेंट कंट्रोल एक्ट 1974’ पारित किया था। वहां भी वित्तवर्ष की अवधि में बदलाव देश के हित को ध्यान में रख कर किया गया था। दुनिया के बहुत सारे देशों में वित्तवर्ष की अवधि 1 जनवरी से 31 दिसंबर है। अप्रैल से मार्च के वित्तवर्ष का प्रारूप भारत में 1867 से चल रहा है। उससे पहले यहां वित्तवर्ष का प्रारूप मई से अप्रैल चल रहा था। यह परिवर्तन ब्रिटेन के वित्तवर्ष के अप्रैल से मार्च के प्रारूप के आधार पर किया गया था। वित्तवर्ष बदलने की दिशा में भारत पहले भी प्रयास कर चुका है।

1984 में तत्कालीन सरकार ने इस संबंध में एलके झा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। अप्रैल, 1985 में समिति ने अपनी सिफारिश में कहा कि हम वित्तवर्ष को कैलेंडर वर्ष में तब्दील कर सकते हैं, लेकिन मानसून के आकलन में व्याप्त अनिश्चितताओं और उसके संबंध में हमेशा समुचित तैयारी करने में विफल रहने के मुद्दे पर एक राय न बनने के कारण ऐसा नहीं हो सका।

अब मोदी सरकार ने वित्त मंत्रालय के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया है, जो इस बात का पता लगाएगी कि क्या भारत को ऐसे किसी बदलाव की जरूरत है। वह इसकी भी पड़ताल करेगी कि ऐसा करने से देश की वित्तीय स्थिति में क्या बदलाव आएगा और खासकर किसानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इस समिति को इस साल के अंत तक रिपोर्ट देने को कहा गया है।

इस सोच को मूर्त रूप देने के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना होगा। फिलहाल संविधान के अनुच्छेद 367 (1) के तहत परोक्ष तौर पर वित्तवर्ष को 1 अप्रैल से 31 मार्च की अवधि के रूप में परिभाषित किया गया है। असल में भारत में मौजूदा वित्तवर्ष सामान्य अनुच्छेद अधिनियम 1897 के तहत परिभाषित है। ऐसे में नया वित्तवर्ष लागू करने से पहले संविधान में संशोधन की जरूरत पड़ सकती है। गौरतलब है कि सरकार अगर नया वित्तवर्ष एक जनवरी से शुरू करना चाहती है, तो उससे पहले करीब डेढ़ साल की अवधि को संक्रमणकालीन वित्तवर्ष के तौर पर मानने की जरूरत पड़ेगी, ताकि नया वित्तवर्ष शुरू करने से पहले एहतियात के तौर पर समुचित तैयारी की जा सके।

एसोचैम के मुताबिक वित्तवर्ष के मौजूदा स्वरूप में बदलाव से नुकसान होने की संभावना अधिक है। उसका कहना है कि जब 2016 में भी देश की जीडीपी में कृषि का योगदान महज 6.1 प्रतिशत था, ऐसे में सरकार द्वारा बदलाव के पक्ष में दिए जा रहे तर्कों की कोई प्रासंगिकता नहीं है। एसोचैम के अनुसार वित्तवर्ष की अवधि जनवरी से दिसंबर हो जाने के बाद बजट अक्तूबर में पेश किया जाएगा। इसलिए मानसून बीत जाने के बाद बजटीय निर्णय केवल चालू वित्तवर्ष के लिए ठीक हो सकता है। आगामी वित्तवर्ष के लिए भी सरकार को पुन: मानसून की चाल पर निर्भर रहना होगा।

मौजूदा वित्तवर्ष स्कूल और विश्वविद्यालयों के अकादमिक वर्ष से जुड़ा है, लिहाजा इसमें होने वाले बदलाव से बच्चों के भविष्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि उन्हें भी बदलाव के मुताबिक अपने को समायोजित करना होगा। इस बदलाव से कारोबार जगत को भी नुकसान होने की बात कही जा रही है, क्योंकि इससे लेखा-जोखा की प्रक्रिया- कर प्रक्रिया, नए वित्तवर्ष के साथ समायोजन बनाने, बही-खातों के रख-रखाव, पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन, पुराने वित्तवर्ष से जुड़े सॉफ्टवेयर में बदलाव आदि करने पड़ सकते हैं। स्पष्ट है कि इस तरह के बदलाव के लिए भारी-भरकम पूंजी की जरूरत होगी।

बेशक, एसोचैम और दूसरे कुछ संगठनों के वित्तवर्ष की अवधि में बदलाव करने से होने वाले नुकसान में कुछ सच्चाई है, लेकिन इसे पूरी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। इस साल बजट 1 फरवरी को पेश किया गया, लेकिन इससे किसी को नुकसान पहुंचने के बजाय कृषि और दूसरे क्षेत्रों को फायदा हो रहा है। आज स्काईमेट और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का मानसून संबंधी आकलन पहले से काफी सटीक हो गया है। वर्तमान में आमतौर पर इनके आकलन सही हो रहे हैं।

ऐसे में जनवरी में बजट पेश करने पर किसानों का खयाल रखने के साथ-साथ मुद्रास्फीति का आकलन, कारोबारियों के कारोबार का अंदाजा आदि लगाना आसान होगा। साथ ही देश की बेहतरी के लिए बजट में बेहतर प्रबंधन किए जा सकेंगे। जब बजट 1 जनवरी को पेश किया जाएगा तब दिसंबर के अंत में रबी फसल के पैदावार का आकलन करना आसान होगा, साथ ही खरीफ का अनुमान लगाने में भी परेशानी नहीं होगी। अगर बजट में रबी और खरीफ फसल की स्थिति को ध्यान में रख कर प्रावधान किए जाएंगे तो किसानों को ज्यादा फायदे होंगे। इस क्रम में बदलाव से सरकार के राजस्व और आम आदमी तथा कारोबारियों को होने वाले नुकसान की बात करना बेमानी है, क्योंकि इससे होने वाले फायदे नुकसान से अधिक हैं।

एसोचैम का कहना है कि जीडीपी में कृषि का योगदान काफी कम है, ऐसे में सरकार द्वारा दूसरे क्षेत्रों की उपेक्षा करके कृषि पर ध्यान देना गैर-प्रासंगिक होगा, एक गलत संकल्पना है। भले जीडीपी में कृषि का योगदान वर्ष 2016 में महज 6.1 प्रतिशत था, लेकिन वह तब भी वैश्विक औसत से अधिक था। दूसरी तरफ भारत की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी कृषि क्षेत्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगाररत है। इतनी बड़ी आबादी की उपेक्षा करना निश्चित रूप से अतार्किक कदम होगा।
मौजूदा समय में देश में अंग्रेजों के जमाने के अनेक कानून और प्रणाली चलन में हैं, जिन्हें संबंधित कालखंड में इंग्लैंड से उधार लिया गया था, पर देश की जरूरतों के मुताबिक कभी भी उनकी सार्थकता नहीं रही। इसलिए ऐसी परंपराओं में बदलाव समय की मांग है, जिनसे सरकार और बड़ी आबादी को नुकसान हो रहा है। े

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