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राजनीतिः शिखर से आगे नए क्षितिज की तलाश

इस वक्त हम सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं जिसका हाल में पूरी दुनिया सामना कर रही है। कोविड-19 ने सबको हिला कर रख दिया है। इसे रोकने के लिए हमारी कोशिशों ने असंतोष और खामियों को उजागर किया है। प्रधानमंत्री मोदी इस वास्तविकता को चाह कर भी खारिज नहीं कर सकते। इससे निपटने के लिए सभी के समर्थन से ऐसी पहल और रणनीति बनाने की जरूरत है जो उनके देश के लोगों की इच्छाओं और उम्मीदों का आईना बन सकती है।

पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर अपनी रणनीतिक और प्रगतिशील दृष्टि की क्षमताओं का प्रदर्शन कर चुके हैं।

एनके सिंह

उन्नीसवीं सदी के जर्मन दार्शनिक आर्थर शोफेनहॉएर ने लिखा है कि ‘हमारे जीवन के पहले चालीस साल सबक देते हैं और अगले तीस साल उस पर टिप्पणी के होते हैं’। जिस दुनिया में आज हम जी रहे हैं, उसे बनाने में इंसानी इच्छा की भूमिका को लेकर शोफेनहॉएर ने काफी कुछ लिखा है और एक तरह से इसे हमारे यहां के माया जाल की अवधारणा का यूरोपीय रूपांतरण कहा जा सकता है। सत्तर में अनुभव के सार से हम स्पष्ट तौर पर इस पाठ का सही अर्थ और संबंध समझ पाने में समर्थ बन पाते हैं, जिसमें इस पाठ की नैतिकता और खूबसूरती दोनों होती हैं और यह हमें शिखर से एक संपूर्ण दृष्टि प्रदान करती है।

यह एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ है। हमारे प्रधानमंत्री आज ऐसे वक्त में सत्तर वर्ष पूरे कर रहे हैं, जब हर मोर्चे पर तेजी से बदलाव होता दिख रहा है, संकटों और अवसरों दोनों ही रूपों में। उनकी सादा और दो-टूक शैली से सब परिचित हैं। उनकी यादाश्त गजब की है और इसके लिए वे मशहूर हैं, चाहे बड़े तथ्य हों या फिर छोटे, सब याद रहते हैं। यह भी समान रूप से सत्य है कि चीजों पर अमल को लेकर उन्हें पहचान लेने और उन पर काम शुरू कर देने की भी क्षमता उनमें है, चाहे वह सूक्ष्म प्रबंधन के स्तर पर ही क्यों न हो। इसके कई उदाहरण हैं- पानी की कमी से जूझ रहे कच्छ के इलाके में नर्मदा परियोजना से पानी पहुंचा कर लोगों को राहत देने के काम को अंजाम तक पहुंचाया और इसी तरह स्टेच्यू आॅफ यूनिटी की परियोजना को पूरा कर दिखाया।

फिर भी, यह भी साफ है कि यह सत्तर उनके लिए आराम करने और यह मान लेने का नहीं है कि मुश्किल से हासिल वर्तमान की यह समझ असल में भविष्य को तलाशने के लिए समझदारी की क्षमता पैदा करेगी, जो क्षितिज का शिखर होगा। जैसा कि अक्सर कहा जाता है कि जो लोग अपने विगत की उपलब्धियों पर गर्व करते रहते हैं, वे भविष्य के बारे में नहीं सोच पाते। हमारे जीवन के रास्ते में कई तरह की बाधाएं आती हैं, चीजें हमेशा एक-सी नहीं रहती हैं। बदलाव हमेशा सीधा-सपाट नहीं होता, एक दूसरे से जुड़ाव और एक दूसरे पर निर्भरता ही जीवन की हकीकत है। इसलिए अब नया शिखर पहले के शिखरों से अलग होगा।

पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर अपनी रणनीतिक और प्रगतिशील दृष्टि की क्षमताओं का प्रदर्शन कर चुके हैं। उदाहरण के लिए, स्वच्छ भारत मिशन और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने सृजनात्मक भूमिका निभाई। इसी तरह खुले में शौच से मुक्ति और सैनिटरी पैड के उपयोग को लेकर सामाजिक अभिशाप मानी जाने वाली प्रथाओं के खिलाफ जो अभियान छेड़ा गया, उससे पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को कम कर राष्ट्र के स्वास्थ्य और उत्पादकता को मजबूती देने में बड़ी मदद मिली। वित्तीय ईमानदारी में अपने विश्वास के कारण ही प्रधानमंत्री जनधन योजना और दिवालिया कानून जैसे कदम की पहल हुई। बैंकिंग सेवाओं के विस्तार के लिए यह बड़ी चुनौती बनी हुई थी। इससे एक ओर लोगों तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचने का रास्ता साफ हुआ, तो दिवालिया जैसे मामलों से निपटने का विकल्प खुला।

भविष्य की ओर देखते हुए वे नई तलाश की जरूरत महसूस करते हैं, जिसमें नया हो और जटिलताओं को खत्म किया जाए। पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने की रणनीति हो, लोगों, क्षेत्रों, व्यक्तियों के बीच शक्तियों का वितरण हो। इसी तरह चौथी औद्योगिक क्रांति से डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ा जाए, जिससे बौद्धिकता के नए क्षेत्र खुलें। धरती जिसके बारे में हम कभी सोचते थे कि यह हमारे प्रभाव के बाहर है, लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि धरती तो मानव के हाथों में जाती जा रही है। इसका प्रभाव तापमान, वर्षा, खाद्य और जल सुरक्षा और जैव विविधता सहित कई चीजों पर पड़ रहा है।

समाज, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, ढांचागत क्षेत्र और यहां तक कि लोगों के निजी जीवन, जिसके बारे में हम तेजी से विचार करते जा रहे हैं, ने शक्तियों का एक ऐसा समूह पेश किया है जिसका उपयोग हम अवसरों का लाभ उठाने में ले सकते हैं। मोदी डिजिटल क्रांति का उपयोग व्यापक रूप से करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं और इससे व्यापक सामूहिक सुरक्षा का निर्माण किया जाएगा। और उस नई दुनिया के साथ हम कैसे तालमेल बनाएं जिसमें हर जगह साइबर सुरक्षा को लेकर खतरों का सामना करना पड़ रहा है? ये दो ऐसे मुद्दे हैं, जिनका हमें समय रहते समाधान निकालना है, ऐसे समय में जबकि संबंधों में बदलाव आ रहे हैं और हमें सहयोग और रिश्तों को नया रूप देना है। मोदी प्रगति (प्रो एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) प्लेटफार्म में विश्वास रखते हैं, जो उनकी प्रतिबद्ध योजनाओं के अभियान का हिस्सा है।
जन्मदिन पर सम्मान की जगह आग्रह करने का जोखिम उठाते हुए, वे ऐसे तरीके क्या हैं जिसका वे सही अर्थों में सत्तर के परिप्रेक्ष्य का उपयोग अस्सी और उसके बाद के दशकों में कर सकेंगे?

आने वाले वर्षों में वे नेतृत्व के तीन गुणों की जरूरत को पहचानेंगे। विगत को याद रखने, लेकिन वर्तमान को बहुत ही स्पष्ट रूप से देखने की क्षमता। हम एक ऐसे नाजुक दौर में जा रहे हैं जिसमें काफी भू-राजनीतिक समस्याएं सामने आएंगी। हमारे विगत के गठजोड़ और संबंध इस पर टिके हैं कि दोस्त दोस्त हैं, लेकिन हमें नए भागीदार और पहल को भी तलाशना है जो हमें उभरती वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में मदद करेंगे और इसके लिए हमें स्पष्ट दृष्टि की जरूरत होगी। यह सही है कि बाहरी मसलों की तरह ही अंदरूनी मसले भी हमें सामूहिक प्रयासों से सुलझाने की जरूरत है जिसमें केंद्र, राज्यों और स्थानीय सरकारों की भागीदारी हो।

उनके कद का नेता जानता है कि दबावों और बाधाओं के बीच काम कैसे किया जाता है, चाहे वह वित्तीय हो, रासायनिक या जैविक हो, और उसी वक्त में लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करना कि मुश्किलों और दबाव में सबसे अच्छा काम और प्रदर्शन कैसे किया जाए। इस वक्त हम सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं जिसका हाल में पूरी दुनिया सामना कर रही है। कोविड-19 ने सबको हिला कर रख दिया है। इसे रोकने के लिए हमारी कोशिशों ने असंतोष और खामियों को उजागर किया है। प्रधानमंत्री मोदी इस वास्तविकता को चाह कर भी खारिज नहीं कर सकते। इससे निपटने के लिए सभी के समर्थन से ऐसी पहल और रणनीति बनाने की जरूरत है जो उनके देश के लोगों की इच्छाओं और उम्मीदों का आईना बन सकती है।

और अंत में, हमें दुनिया में आगे बढ़ने के लिए ऊर्जावान, ताजगी भरे परिदृश्य के साथ दूरदृष्टि की भी जरूरत है, जो हमें अवसरों के साथ जोखिमों में मिल सकती है। पिछले अनुभवों से प्रधानमंत्री को पहले इन्हें पहचानना होगा। आनंद, सुंदरता और मानवता उसकी नींव हैं जिसे हमें सदियों से एक राष्ट्र के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। आगे क्षितिज है।
जन्मदिन की शुभकामनाएं।
(लेखक पंद्रहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष हैं)

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