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राजनीतिः बिजली घरों से फैलता अंधेरा

बिजली घरों से निकलने वाली काली राख से हजारों एकड़ भूमि बंजर होती जा रही है, उसका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है और आसपास की उपजाऊ जमीन भी इसके असर से बंजर होती जा रही है। इतना ही नहीं, आंधी और तूफान आने पर यह राख हवा में मिल कर सांस, त्वचा और आंख के रोग पैदा कर रही है।

Author Updated: December 26, 2019 1:57 AM
इस तस्वीर को प्रतीकात्मक रूप में इस्तेमाल किया गया है। (फोटो सोर्स: द इंडियन एक्सप्रेस)

अखिलेश आर्येंदु

देश में जितनी बिजली बनाई जाती है, उसमें से साठ फीसद जीवाश्म कोयले से बनती है। बाकी छब्बीस फीसद बिजली का उत्पादन पानी से और चौदह फीसद बिजली उत्पादन अन्य तरीकोंसे होता है, जिसमें यूरेनियम और थोरियम से बनने वाली बिजली महज दो फीसद है। जाहिर है, देश में कोयले से चलने वाले बिजली घर ही ज्यादा हैं और इनसे सबसे ज्यादा अपशिष्ट निकलते हैं, जिसमें काली राख की भरमार होती है। चिंता की बात यह है कि सरकार की नजर में इसका कोई उपयोग नहीं है। इसलिए बिजली घरों के आसपास करोड़ों टन काली राख फैली रहती है और यह पर्यावरण को ही नहीं, भूमि और जल को भी प्रदूषित कर रही है।

कोयले से चलने वाले बिजली घरों से निकलने वाले अपशिष्टों को ठिकाने लगाने की न तो भारत सरकार के पास कोई योजना है, न राज्य सरकारों के पास। बिजली मंत्रालय का मानना है कि यह ऐसा व्यर्थ का पदार्थ है जिसका किसी भी रूप में कोई उपयोग नहीं हो सकता। ताज्जुब की बात यह है कि आज वैज्ञानिकों ने धरती पर हर चीज का उपयोग किसी न किसी रूप में करने का तरीका ईजाद कर लिया है, लेकिन बिजली बनाने के दौरान कोयले से निकलने वाले इस अपशिष्ट के कोई बेहतर उपयोग का विकल्प आज तक नहीं खोजा जा सका है। ऐसा नहीं है कि इसका कोई उपयोग नहीं है। इसका उपयोग है, लेकिन सरकार इस तरफ गौर ही नहीं करती। इस वजह से इसके बेहतर उपयोग के बारे में कोई अनुसंधान भी नहीं हुआ है। दुनिया के विकसित कहे जाने वाले देशों ने कार्बन को दफनाने तक की समस्या का निदान खोज लिया है, जो कभी असंभव माना जाता था। ग्रीन हाउस की समस्या से निजात पाने की विधि खोज ली गई है, लेकिन भारत में करोड़ों टन कोयले के अपशिष्ट के इस्तेमाल का रास्ता आज तक नहीं निकल पाया है।

बिजली घरों से निकलने वाली काली राख से हजारों एकड़ भूमि बंजर होती जा रही है, उसका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है और आसपास की उपजाऊ जमीन भी इसके असर से बंजर होती जा रही है। इतना ही नहीं, आंधी और तूफान आने पर यह राख हवा में मिल कर सांस, त्वचा और आंख के रोग पैदा कर रही है। चिंता की बात यह है कि इससे सांस संबंधी अनेक रोग पैदा होते हैं और इसके संपर्क में लगातार काम करने वाले मजदूरों की असमय में मौत हो जाती है। तो क्या कोयले के इस अपशिष्ट से इसके आसपास रहने वाले लोगों को कई तरह की समस्याएं नहीं होती होंगी? जमीन और हवा के अलावा इस अपशिष्ट से बिजली घरों के आसपास जल स्रोत ही नहीं नहर, तालाब और कुए तक जहरीले होते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक कोयले से निकलने वाला हर अपशिष्ट चाहे वह गैस हो या राख, इससे मानव शरीर, मस्तिष्क और मन पर प्रतिकूल असर डालते ही हैं। इसलिए इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कोयले की राख से कोई समस्या इंसान को सीधे तौर पर नहीं हो सकती है।

दिल्ली और फरीदाबाद में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। हवा में घुले जहर के कारण लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। देश-विदेश के बड़े-बड़े वैज्ञानिक ‘प्रदूषण मुक्त दिल्ली’ बनाने में जुटे हैं, लेकिन यह समस्या अभी काबू में नहीं आ पाई है। दिल्ली में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं बताया जाता है, लेकिन कोयले के निकलने वाले अपशिष्ट से दिल्ली की आबोहवा कितनी प्रदूषित है, इस पर वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् कुछ कहते नजर नहीं आते। पॉलिथिन, यमुना का गंदे नाले में तब्दील होने और रेत माफियों द्वारा अवैध तरीके से किए जा रहे खनन पर्यावरण की समस्या पैदा करते हैं और इनके खिलाफ आंदोलन भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन बिजली घरों से उत्सर्जित होने वाली राख को लेकर कोई चिंतित नजर नहीं आता।

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से उत्पन्न समस्याओं पर भारत से कहीं ज्यादा विदेशों में अनुसंधान किए जा रहे हैं। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में तिहत्तर फीसद योगदान ऊर्जा का होता है। वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में बिजली और ताप आधारित उपक्रमों की हिस्सेदारी 24.6 फीसद है और परिवहन क्षेत्र की हिस्सेदारी महज दस फीसद है। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में भारत पांचवे स्थान पर है और इसके बढ़ने की रफ्तार काफी ज्यादा है। आने वाले पांच वर्षों में यह रफ्तार बढ़ कर पांच गुना तक पहुंच सकती है। जरूरत इस बात की है कि बिजली घरों के ईधन कोयले और इसके अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण पर भी गहराई से ध्यान दिया जाए और इसके उपयोग के लिए कोई मुकम्मल रास्ता तलाशा जाए।

भारत में परमाणु रिएक्टरों से भी बिजली बनाई जा रही है, लेकिन अभी देश में इसका उत्पादन महज दो फीसद है। परमाणु रिएक्टरों से कुल बीस हजार मेगावाट बिजली पैदा होती है, जबकि उद्योगों, कृषि और घरेलू उपयोग के लिए बिजली की जरूरत इससे कई गुनी ज्यादा है। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा परमाणु बिजली घर लगाए जाने की जरूरत है। लेकिन परमाणु बिजली घरों को लेकर देश में एक मत नहीं है। ऐसे में सरकार को ले-देकर कोयले या पानी से बिजली पैदा करने का विकल्प झंझट रहित लगता है। पर समस्या यह है कि कोयला और पानी भी उतनी मात्रा में नहीं मिल पा रहे हैं जितनी कि जरूरत है।

सवाल है कि कोयले के इस अपशिष्ट का निदान क्या है? सरकार या एनजीओ की नजर में यह बड़ी समस्या भले न हो, लेकिन है यह एक बड़ी और गंभीर समस्या। आज भले ही इस पर गौर न किया जा रहा हो, लेकिन आने वाले वक्त में सरकार और पर्यावरणविदों को इस तरफ ध्यान देना ही होगा और इससे पैदा होने वाली समस्या के निजात के लिए कोई मुकम्मल समाधान खोजना ही होगा। देश भर में कोयले से चलने वाले जितने भी बिजली घर हैं, उनसे वर्ष भर में कम से कम सौ करोड़ टन कोयले का अपशिष्ट निकलता होगा। बिजली घरों के पास इसके निपटान के लिए न तो कोई सरकारी नियम और आदेश है, न बिजली घरों के पास कोई विकल्प। हालांकि सार्वजनिक रूप से मुफ्त में इसे उठा ले जाने का विज्ञापन भले ही वक्त-दर-वक्त निकलते रहते हैं। दूसरा सवाल इसके उपयोग से जुड़ा है।

आमतौर पर कोयले के इस अपशिष्ट का उपयोग सीमेंट बनाने वाली कंपनिया करती हैं या कभी-कभार सड़क निर्माण में इसका इस्तेमाल होता है। लेकिन इससे समस्या पूरी तरह हल नहीं हो पाती। भारी मात्रा में राख पड़ी रह जाती है। सरकार भले ही इसे बेकार मान कर इस तरफ गौर न करे, लेकिन इसका उपयोग कोलतार की सड़क बनाने में बेहतर ढंग से किया जा सकता है। इतना ही नहीं, दूरदराज के गांवों में जहां पहुंचने के कोई साधन नहीं है, या जहां की मिट्टी इस लायक नहीं है कि पैदल वहां पहुंचा जा सके, वहां इसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा गमलों में और गड्ढे पाटने में भी इसका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इससे जहां प्रदूषण की समस्या हल होगी, वहीं हजारों एकड़ भूमि जो इस अपशिष्ट के कारण किसी काम में नहीं आ रही है, काम में आने लगेगी।

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