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राजनीति: मालदीव का नया दौर

चीन पर्दे के पीछे से ऐसा जाल बुन रहा है, जिससे मालदीव और नई दिल्ली में दूरी बढ़ जाए। हिंद महासागर में भारत को घेरने के मकसद से चीन मालदीव पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने में लगा है। मालदीव अपने कुछ द्वीप चीन को पट्टे पर भी दे चुका है। आशंका जताई जा रही है कि चीन इनका इस्तेमाल भारत पर निगरानी संबंधी गतिविधियों के लिए वहां सैन्य अड्डे बनाने में कर सकता है। ऐसे में भारत के लिए अब सक्रिय होना अपरिहार्य हो गया है।

Author September 25, 2018 3:17 AM
मालदीव की जनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन को हरा कर संयुक्त विपक्षी गठबंधन के नेता इब्राहिम मोहम्मद सालेह को विजयी बनाया है।

राहुल लाल

हिंद महासागर का छोटा-सा द्वीपीय देश मालदीव इस साल गहरे सियासी और संवैधानिक संकट से जूझता रहा था। लेकिन अब मालदीव की जनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन को हरा कर संयुक्त विपक्षी गठबंधन के नेता इब्राहिम मोहम्मद सालेह को विजयी बनाया है। मालदीव चुनाव आयोग के अनुसार सालेह को 58.3 फीसद मत मिले हैं। मालदिवियन डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता इब्राहिम मोहम्मद सालेह अगले राष्ट्रपति बनेंगे। इब्राहिम भारत के साथ मजबूत संबंधों के हिमायती रहे हैं। वहीं निवर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन चीन के कट्टर समर्थक रहे हैं। इब्राहिम मोहम्मद सालेह मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले संयुक्त विपक्ष के राष्ट्रपति उम्मीदवार हैं। इस गठबंधन में जम्हूरी पार्टी, अदालत पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव्स (पीपीएम) का एक धड़ा भी शामिल है।

इस वर्ष फरवरी में मालदीव की सर्वोच्च अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद पर चल रहे मुकदमे को असंवैधानिक करार दे दिया था और कैद किए गए विपक्ष के नौ सांसदों को रिहा करने का आदेश भी जारी किया था। लेकिन राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के इस आदेश को मानने से इंकार करने के बाद यह संकट उत्पन्न हुआ था। इसके बाद यामीन ने पंद्रह दिन के आपातकाल की घोषणा करते हुए संसद भंग कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और दूसरे जजों के साथ पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारी से पूर्व मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने भारत से विधि का शासन एवं संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मदद मांगी थी। भारत समर्थक मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भी राजनीतिक संकट के समाधान के लिए भारत से त्वरित सैन्य कार्रवाई की मांग की थी। मालदीव का यह सियासी संकट इतना गहरा था कि इसकी हलचल भारत और चीन तक सुनाई दे रही थी। मालदीव के इस राजनीतिक संकट की जड़ें 2012 में तत्कालीन और पहले निर्वाचित राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद के तख्तापलट से जुड़ी थीं। नशीद के तख्तापलट के बाद अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने। उन्होंने चुन-चुन कर विरोधियों को निशाना बनाया। नशीद को 2015 में आतंकवाद के आरोप में तेरह साल जेल की सजा हुई, लेकिन वे इलाज के लिए ब्रिटेन चले गए और वहीं राजनीतिक शरण ले ली। मालदीव के इस संवैधानिक संकट के साथ ही भारत-मालदीव संबंधों में और तनाव आ गया था। मालदीव की कंपनियों ने अपने विज्ञापन में कह दिया कि भारतीय नौकरी के लिए आवेदन नहीं करें, क्योंकि उन्हें कामकाजी वीजा नहीं मिलेगा। इस दौरान मालदीव पर चीन के जबरदस्त प्रभाव का अंंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि भारत की तरफ से मालदीव को उपहार स्वरूप स्वरूप दिए गए दो हेलिकॉप्टरों को भी लौटा दिया गया था। यह मालदीव में भारत की सैन्य और कूटनीतिक नीतियों को तगड़ा झटका था। लेकिन अब मालदीव की जनता ने भारत को पुन: मालदीव में अपनी सक्रिय भूमिका के लिए भी मतदान किया है।

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अगर भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में खुद को एक महाशक्ति और सुरक्षा गारंटर के रूप में स्थापित करने का सपना देखता है, तो उसे हर हाल में अपने पड़ोस के मुल्क के लिए ज्यादा सक्रिय नीति अपनानी होगी। इस संपूर्ण संकट की पृष्ठभूमि में चीन की छाया साफ तौर पर देखी जा सकती है। चीन, जिसका वर्ष 2011 तक माले में दूतावास तक नहीं था, इस छोटे से देश की घरेलू राजनीति में अब प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है। चीन लगातार भारत की घेरेबंदी में लगा है। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह और श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह में चीनी सक्रियता इसका उदाहरण है। हंबनटोटा को चीन ने श्रीलंका से निन्यानवे साल की लीज पर लिया है। ऐसे में मालदीव में चीनी प्रभाव कम करना भारत के लिए बहुत जरूरी हो गया है। इस लिहाज से भी इब्राहिम मोहम्मद सालेह की जीत भारत के लिए शुभ संकेत है। अभी मालदीव में जिस तरह के हालात हैं, उसके चलते वहां उग्रवाद, धार्मिक कट्टरपन, समुद्री डकैती जैसी समस्याएं तेजी से सिर उठा सकती हैं, जो भारत के लिए चिंता की बात है। ऐसे में भारतीय सक्रियता वहां कितनी आवश्यक है, इसे बखूबी समझा जा सकता है। भारत बीते एक दशक से मालदीव के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करने से बच रहा है। इसका सीधा फायदा चीन को मिल रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खास तैयारियां यहां साफ देखी जा सकती हैं। जिनपिंग जब भारत आए थे, तब वे मालदीव और श्रीलंका होते हुए आए थे। दोनों देशों में मैरी टाइम सिल्क रूट से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, लेकिन जब जिनपिंग भारत आए तो इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी रही।

पिछले साल दिसंबर में मालदीव ने चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया। मालदीव की संसद में यह समझौता इतनी तीव्र गति से पारित हुआ कि सत्तारूढ़ सांसदों को बमुश्किल पढ़ने का समय दिया और विपक्ष को अंधेरे में रखा गया। स्थिति यह है कि समझौते का विवरण आज तक न तो सार्वजनिक हुआ है, न ही विपक्ष के साथ इसे साझा किया गया है। दिसंबर में चीन और मालदीव के बीच बारह करार हुए थे। इनमें चीन की महत्त्वाकांक्षी योजना ‘वन बेल्ट वन रोड’ भी शामिल है। चीन के लिए चालीस हजार की आबादी वाले देश में आर्थिक संभावनाएं बहुत सीमित हैं। समझा जा सकता है कि बेजिंग की मालदीव में दिलचस्पी पूरी तरह से रणनीतिक है। चीन पर्दे के पीछे से ऐसा जाल बुन रहा है, जिससे मालदीव और नई दिल्ली में दूरी बढ़ जाए। हिंद महासागर में भारत को घेरने के मकसद से चीन मालदीव पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने में लगा है। मालदीव अपने कुछ द्वीप चीन को पट्टे पर भी दे चुका है। आशंका जताई जा रही है कि चीन इनका इस्तेमाल भारत पर निगरानी संबंधी गतिविधियों में करने के लिए वहां सैन्य अड्डे बनाने में कर सकता है। ऐसे में भारत के लिए अब सक्रिय होना अपरिहार्य हो गया है। हिंद महासागर आस्ट्रेलिया, दक्षिणपूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के पूर्वी इलाके को छूता है। इस इलाके में चालीस से ज्यादा देश आते हैं। इसमें दुनिया की चालीस फीसद आबादी रहती है। मालदीव भी इस क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण देश है। भारत का अधिकतर अंतरराष्ट्रीय व्यापार हिंद महासागर से होता है। इसलिए यहां से गुजरने वाले समुद्री मार्गों का सुरक्षित होना भारत के लिए बहुत जरूरी है।

भारत सदैव मालदीव के निकटस्थ मित्र की भूमिका में रहा है। दिसंबर, 2014 में जब माले में जल संकट हो गया था, तब भारत ने तत्काल मदद करते हुए आइएनएस सुकन्या और आइएनएस दीपक को पेयजल के साथ रवाना किया था। इसके अतिरिक्त भारतीय वायुसेना ने भी हवाई जहाजों के जरिए मालदीव को पानी पहुंचाया था। इस संपूर्ण ऑपरेशन को ‘ऑपरेशन नीर’ के नाम से जाना जाता है। इसके पूर्व भी 1988 में तत्कालीन मालदीव के राष्ट्रपति के अनुरोध पर भारत ने ‘ऑपरेशन कैक्टस’ को अंजाम दिया था। इसमें सिर्फ नौ घंटे के भीतर भारतीय कमांडो मालदीव पहुंच गए थे और मालदीव में तख्तापलट को कोशिश को नाकाम कर दिया था। भारत ने पिछले ही वर्ष डोकलाम में अपने हितों की रक्षा के लिए भूटान की जमीन से चीन को चुनौती देने के लिए आक्रामक और सक्रिय कूटनीति को प्रतिबिंबित किया था। इससे भारत की न केवल वैश्विक प्रतिष्ठा और धमक बनी थी, अपितु आसियान देशों में भी चीनी वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष में भारत को प्रभावी राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया गया। अगर भारत मालदीव में भी लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए सक्रिय रहता है, तो इससे सार्क देशों में भारत को लेकर एक सशक्त संदेश जाएगा। निस्संदेह मालदीव की जनता की इस लोकतांत्रिक जीत से हिंद महासागर में न केवल लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत होंगे, अपितु हिंद महासागर में भारत की सामरिक स्थिति भी मजबूत होगी।

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