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राजनीति: समाज में तिरस्कृत बुजुर्ग

देश में बुजुर्गों का एक तबका ऐसा भी है जो या तो अपने घरों में तिरस्कृत व उपेक्षित जीवन जी रहा है या फिर वृद्धाश्रमों में अपनी जिंदगी बेबसी के साये में बिताने को मजबूर है। समाज में बुजुर्गों पर होने वाले मानसिक और शारीरिक अत्याचार के तेजी से बढ़ते मामलों ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। परिजनों से लगातार मिलती उपेक्षा, निरादर और सौतेले व्यवहार ने वृद्धों को काफी कमजोर किया है। बुजुर्ग जिस सम्मान के हकदार हैं, वह उन्हें नसीब नहीं हो पा रहा है।

Author September 28, 2018 3:08 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुधीर कुमार

देश में औद्योगीकरण और नगरीकरण के विस्तार के साथ परिवार के मूल स्वरूप में भी व्यापक परिवर्तन हुए हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में संयुक्त परिवारों का विखंडन बड़ी तेजी से एकल परिवार के रूप में हुआ है। अब गिने-चुने परिवारों में ही संयुक्त परिवार की अवधारणा देखने को मिलती है, जहां दो-तीन पीढ़ियां एक ही छत के नीचे साथ रहती हैं। शहरों में एकल परिवार का ही बोलबाला है। हालांकि अब गांव भी समाजीकरण की इस प्रक्रिया से अछूते नहीं रह गए हैं। विघटित संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था के एकल स्वरूप ने आधुनिक और परंपरागत- दोनों पीढ़ियों को समान रूप से प्रभावित किया है। एक तरफ जहां, आज की कथित आधुनिक पीढ़ी परंपरागत पालन-पोषण, बुजुर्ग सदस्यों के प्यार-दुलार और सामाजिक मूल्यों-संस्कारों से दूर होती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ एकल पारिवारिक व्यवस्था ने बुजुर्गों को एकाकी जीवन जीने को विवश किया है।

देश में बुजुर्गों का एक तबका ऐसा भी है जो या तो अपने घरों में तिरस्कृत व उपेक्षित जीवन जी रहा है, या फिर वृद्धाश्रमों में अपनी जिंदगी बेबसी के साये में बिताने को मजबूर है। समाज में बुजुर्गों पर होने वाले मानसिक और शारीरिक अत्याचार के तेजी से बढ़ते मामलों ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। परिजनों से लगातार मिलती उपेक्षा, निरादर भाव और सौतेले व्यवहार ने वृद्धों को काफी कमजोर किया है। बुजुर्ग जिस सम्मान के हकदार हैं, वह उन्हें नसीब नहीं हो पा रहा है। यही उनकी पीड़ा की मूल वजह है। दरअसल, देश में जन्म दर में कमी आने और जीवन-प्रत्याशा में वृद्धि की वजह से वृद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है। लेकिन दूसरी तरफ गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा, समुचित देखभाल के अभाव और परिजनों से मिलने वाली उपेक्षा की वजह से देश में बुजुर्गों की स्थिति बेहद दयनीय हो गई है। भारत इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। यहां युवाओं की तादाद पैंसठ फीसद है। लेकिन बीते दिनों अमेरिका के जनसंख्या संदर्भ ब्यूरो द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2050 तक आज का युवा भारत तब ‘बूढ़ा’ हो जाएगा। उस समय देश में पैंसठ साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ जाएगी। सवाल यह है कि क्या तब हम अपनी ‘वृद्ध’ जनसंख्या के समुचित देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था कर पाएंगे? ‘ग्लोबल एज वॉच इंडेक्स’ की 2015 की रिपोर्ट में छियानवे देशों की सूची में भारत को इकहत्तरवें स्थान पर रखा गया था। इससे जाहिर होता है कि वृद्धों को स्वास्थ्य, शिक्षा, धन और सहयोगी वातावरण उपलब्ध कराने के मामले में भारत की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कुछ समय पहले देश के तेईस शहरों में कराए गए सर्वेक्षण में जो नतीजे सामने आए, वे भी चौंकाने वाले हैं। शोध के मुताबिक भारतीय घरों में कई तरीकों से बुजुर्गों को प्रताड़ित किया जा रहा है। इनमें परिजनों द्वारा अपमान, गाली-गलौच, उपेक्षा, आर्थिक शोषण और शारीरिक उत्पीड़न जैसे अमानवीय तरीके प्रमुख शामिल हैं। यह सब देख कर लगता है कि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिहाज से भारतीय समाज दिन-प्रतिदिन असंवेदनशील होता जा रहा है। रिपोर्ट में यह बात भी उभर कर सामने आई है कि सताए गए बयासी फीसद बुजुर्ग अपने साथ हुए बुरे बर्ताव की शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं। वे इन मामलों को पारिवारिक मान कर छोड़ देते हैं या भविष्य की असुरक्षा को सोच कर भूल जाना पसंद करते हैं। हालांकि जिस गति से देश में बुजुर्गों के मान-सम्मान में कमी आई है, वह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के अवमूल्यन को परिलक्षित करती है।

भारतीय संस्कृति में बड़ों का सम्मान और आदर करना आदर्श संस्कार रहा है। लेकिन उपभोक्तावाद, भौतिकवाद और पाश्चात्य संस्कृति को आत्मसात करने में हम इतने मशगूल हैं कि हमें ‘अपनों’ की फिक्र ही नहीं है। आज हम उन्हीं को सम्मान देते हैं, जिनसे हमें कुछ लाभ की उम्मीद होती है। समझना होगा कि घर के सदस्यों का सम्मान लाभ-हानि के सिद्धांत से परे है। बुजुर्ग भले ही आर्थिक रूप से अनुत्पादक होते हैं, किंतु परिवार को उचित दिशा दिखाने में उनकी महती भूमिका होती है। कुछ दशक पूर्व तक घर के बड़े-बुजुर्गों द्वारा बच्चों को सुनाई जाने वाली पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियां तथा जातक कथाएं बच्चों को मनोरंजन कराने के साथ ही, उन्हें समझदार और संस्कारी बनाने में मदद करती थीं। बचपन में बच्चों को मिले सामाजिक आदर्श, मूल्य व नैतिकता से ही सभ्य समाज के निर्माण को बल मिलता था। लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। विडंबना है कि जब बच्चे को दादा-दादी, नाना-नानी की गोद की जरूरत होती है, तब वे शहर के किसी प्ले स्कूल में रो रहे होते हैं। बच्चे कुछ और बड़े होते हैं तो हाथों में अभिभावकों द्वारा वीडियो गेम, मोबाइल फोन आदि थमा दिए जाते हैं। नई पीढ़ी का परंपरा, संस्कार व सामाजिक मूल्यों से दूर होने का एक बड़ा कारण बुजुर्गों की अवहेलना है। एक अध्ययन के अनुसार साठ साल की उम्र के बाद देश में पैंसठ फीसद बुजुर्गों को आय संबंधी परेशानी होती हैं। अक्सर देखा गया है कि बुजुर्ग माता-पिता के पास जब तक संपत्ति रहती है, तब तक बच्चे उनका आदर और परवरिश करते हैं। संपत्ति खत्म होते ही उनसे सौतेला व्यवहार किया जाने लगता है। हैरानी इस बात की है कि जो माता-पिता बच्चों के पालन-पोषण में अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं, कुछ समय बाद उनका ही घर में रहना बच्चों को नागवार गुजरने लगता है! जबकि यह समय माता-पिता की सेवा करने का होता है।

भारत में वृद्धों की सेवा और उनकी रक्षा के लिए कई कानून बनाए गए हैं। केंद्र सरकार ने भारत में वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए वर्ष 1999 में राष्ट्रीय नीति बनाई थी। इस नीति का उद्देश्य व्यक्तियों को स्वयं, पति या पत्नी के बुढ़ापे के लिए व्यवस्था करने के लिए प्रोत्साहित करना था। इसमें परिवारों को अपने वृद्ध सदस्यों की देखभाल के लिए प्रोत्साहित करने का भी प्रयास करने का भरोसा था। इसके बाद 2007 में ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक’ संसद में पारित किया गया। इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया। लेकिन आज देश में ज्यादातर बुजुर्ग जिस हालत में हैं उसे देख कर तो लगता है कि ये नीतियां और कानून फाइलों में दबे रह गए और बुजुर्गों की हालत दिन-प्रतिदिन दयनीय होती चली गई। हमारा समाज किस दिशा की ओर जा रहा है, विचार करने की जरूरत है, क्योंकि इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि नैतिक जिम्मेदारी समझने की बजाय बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा के लिए हमें कानून बनाने पड़ रहे हैं! घर के बुजुर्गों की सुरक्षा की जिम्मेदारी महज सरकारी दायित्व मान कर युवाओं का अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ना अनुचित है। पेंशन से अधिक जरूरी घर के सदस्यों से मिलने वाला प्यार और सम्मान है। बुजुर्ग प्यार और सम्मान के भूखे होते हैं, पैसों के नहीं। बुजुर्ग अवस्था, मानव जीवन की संवेदनशील अवस्था होती है। एक निश्चित आयु के बाद बुजुर्गों को कई तरह की शारीरिक-मानसिक समस्याओं से गुजरना पड़ता है। एक अजीब-सा मनोवैज्ञानिक डर और असुरक्षा की भावना मन में घर करने लगती है। चिंता में डूबे रहने के कारण वृद्धों में तनाव और अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। लेकिन ज्यादातर लोग इसे समझते नहीं हैं और बुजुर्गों के साथ अनुचित व्यवहार करते हैं। जब तक मन में यह भाव नहीं होगा कि आखिर हमें भी एक दिन ऐसे ही दौर से गुजरना है, लिहाजा इस दर्द को हमें समझना होगा, तब तक हम बुजुर्गों की सेवा नहीं कर पाएंगे।

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