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राजनीति: कब साफ होगी गंगा

सवाल है, गंगा कैसे साफ होगी? सरकार को समझना चाहिए कि केवल नमामि गंगे मिशन बना देने से गंगा साफ नहीं होगी। इसके लिए पूरी जिम्मेदारी और मिशनरी भावना से काम भी करना होगा, जिसका सभी सरकारों में अभाव दिखता रहा है। ऐसे में सबके मन में एक सवाल जरूर उठता है कि इतनी योजनाएं चलाने के बाद भी क्यों हमारी गंगा आज भी मैली है? क्यों उन योजनाओं को सही तरीके से क्रियान्वित नहीं किया गया?

कहा गया कि गंगा मार्च, 2019 तक सत्तर से अस्सी फीसद तक साफ हो जाएगी। अब यह समय सीमा 2020 तक बढ़ा दी गई है।

प्रदूषण से कई नदियां खतरे में हैं। गंगा भी इससे अछूती नहीं है। गंगा इस कदर मैली हो चुकी है कि इसके अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है। गंगा की सफाई को लेकर सरकारें अब तक न जाने कितने वादे कर चुकी हैं, योजनाएं बना चुकी हैं, काम भी शुरू हुए, लेकिन गंगा साफ नहीं हुई, बल्कि दिनों-दिन इसमें गंदगी बढ़ती ही जा रही है। गंगा प्रदूषण से मुक्त होने का इंतजार कर रही है। गंगा का घटता जलस्तर भी गंभीर चिंता का विषय है। गंगा में जमी गाद को हटाने के लिए सरकार कर क्या रही है, इसका कोई ठोस जबाव किसी के पास नहीं है। पिछले साढ़े चार साल में गंगा के लिए अगल मंत्रालय भी बनाया गया। गंगा सफाई के नाम पर आवंटित होने वाले पैसों में भी कोई कमी नहीं है। लेकिन असली मसला है आवंटित पैसों के खर्च का। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि सरकार गंगा सफाई के लिए आवंटित राशि खर्च करने में नाकाम रही है। रिपोर्ट में कहा गया है, कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के साथ समझौता करने के साढ़े छह साल बाद भी स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन (एनएमसीजी) की लंबी अवधि वाली कार्य योजनाओं को पूरा नहीं किया जा सकता है। इसी वजह से राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी अधिसूचना के आठ साल बाद भी स्वच्छ गंगा के राष्ट्रीय मिशन में नदी बेसिन प्रबंधन योजना नहीं है।

जब सरकार ने गंगा नदी को साफ करने के लिए ‘नमामि गंगे’ कार्ययोजना को जोर-शोर से शुरू किया था तो लगा था कि वह और कुछ करे न करे, कम से कम गंगा को साफ जरूर कर देगी। सरकार ने इस योजना के तहत पांच साल में बीस हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाने का लक्ष्य रखा था, जो पिछले तीस साल में खर्च की गई सरकारी रकम से चार गुना ज्यादा था। तब नदी विकास और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय ने दावा किया था कि 2018 तक गंगा साफ हो जाएगी। बाद में कहा गया कि गंगा मार्च, 2019 तक सत्तर से अस्सी फीसद तक साफ हो जाएगी। अब यह समय सीमा 2020 तक बढ़ा दी गई है। लेकिन सबसे अहम सवाल है कि क्या यह वास्तव में संभव है? कई पर्यावरणविद इस पर भी आशंका जता रहे हैं। केंद्र सरकार की गंगा को लेकर प्रतिबद्धता के बाद भी यह सवाल खड़े हो रहे हैं, क्या इस बार गंगा वाकई साफ हो पाएगी। गंगा की सफाई को लेकर सबसे पहले काम 1986 में शुरू किया गया था। तब से लेकर अब तक हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। पिछले कुछ सालों से गंगा की निर्मल और अविरल धारा पर संकट गहरा रहा है। यह संकट बढ़ते प्रदूषण और घटते जल प्रवाह का है। यह संकट, भले ही नदी तंत्र के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग हो, पर हकीकत में वह पूरे नदी तंत्र का संकट है। इसे ध्यान में रख 1986 में भारत सरकार ने गंगा एक्शन प्लान प्रारंभ किया था। भारत सरकार ने फरवरी 2009 में गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा प्रदान कर अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की और अगस्त 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन कर अभियान के दूसरे चरण को प्रारंभ किया था। इन अभियानों का ध्येय, गंगा को सीधे-सीधे मिलने वाले प्रदूषित जल को उपचारित कर, गंगा के पानी को फिर से निर्मल बनाना था। इसके लिए सीवर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए थे, पर घोषणाओं, अभियानों, कार्यक्रमों, सीवर ट्रीटमेंट प्लांटों और बजट के बावजूद गंगा का प्रदूषण कम नहीं हुआ। प्रदूषण का चिंताजनक पक्ष यह है कि वह उन नए-नए स्थानों पर भी गंभीर हो रहा है जहां, पहले कभी उसकी आहट भी नहीं थी। लगता है, पूरा नदी तंत्र प्रदूषण की चपेट में है।

ऐसा कोई शहर नहीं है जिसके किनारों से बहती गंगा साफ हो और जिसकी सफाई को लेकर लोग संतुष्ट हों। असल में जीवनदायनी गंगा पिछले कुछ साल में लगभग ढाई गुना प्रदूषित हो चुकी है। गंगा को साफ करने की अब तक की सारी योजनाएं भी नाकाम ही साबित हुई हैं। ठोस योजनाओं के अभाव में अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हुए। एक अन्य बड़ा अवरोध सरकार व अलग-अलग संगठनों का नदियों की सफाई के काम में तालमेल की कमी है। इससे नदियों की सफाई की योजना को अमलीजामा पहनाना असंभव हो जाता है। गंगा की सफाई पर अब तक बीस हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। गंगा की कुल लंबाई 2525 किलोमीटर की है। गंगा का बेसिन सोलह लाख वर्ग किलोमीटर का है। इसमें 468.7 अरब मीट्रिक पानी साल भर में प्रवाहित होता है जो देश के कुल जल स्रोत का 25.2 फीसद भाग है। इसके बेसिन में पैंतालीस करोड़ की आबादी बसती है। देश की चालीस फीसद आबादी गंगा नदी पर निर्भर है। बहरहाल, भारत ने औद्योगिक क्रांति के बल पर विकास की बुलंदी तो हासिल कर ली, लेकिन इस प्रगति से निकले प्रदूषण नामक जिन्न ने जीवनदायिनी नदियों की स्वच्छता को नष्ट कर दिया। सवाल है, गंगा कैसे साफ होगी? सरकार को समझना चाहिए कि केवल नमामि गंगे मिशन बना देने से गंगा साफ नहीं होगी। इसके लिए पूरी जिम्मेदारी और मिशनरी भावना से काम भी करना होगा, जिसका सभी सरकारों में अभाव दिखता रहा है। ऐसे में सबके मन में एक सवाल जरूर उठता है कि इतनी योजनाएं चलाने के बाद भी क्यों हमारी गंगा आज भी मैली है? क्यों उन योजनाओं को सही तरीके से क्रियान्वित नहीं किया गया? सरकार ने 2020 तक अस्सी फीसद गंगा साफ करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन अभी तक कितनी साफ हुई है, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है।

गंगा सफाई के लिए सरकार के प्रयासों का मूल्यांकन करने वाली एक संसदीय समिति ने बताया था कि गंगा सफाई के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम पर्याप्त नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ‘मौजूदा स्थिति ये बताती है कि सीवर परियोजनाओं से संबंधित कार्यक्रमों को राज्य द्वारा सही तरीके से लागू नहीं किया गया और ये सरकार का गैर जिम्मेदाराना रवैया दर्शाता है। सीवर परियोजना सीवेज ट्रीटमेंट और जल निकायों में सीवेज के डंपिंग के मुद्दों का हल करने के लिए थी।’ गंगा सफाई के लिए पिछले साल एक सौ बारह दिन तक अनशन पर बैठने वाले पर्यावरणविद् प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने अपना जीवन गंगा की सफाई के लिए दे दिया था। उनकी मांग थी कि गंगा और इसकी सह-नदियों के आस-पास बन रही बिजली परियोजनाएं बंद की जाएं और गंगा संरक्षण प्रबंधन अधिनियम को लागू किया जाए। उन्होंने कहा था, ‘अगर इस मसौदे को पारित किया जाता है तो गंगाजी की ज्यादातर समस्याएं लंबे समय के लिए खत्म हो जाएंगी। मौजूदा सरकार अपने बहुमत का इस्तेमाल कर इस मसौदे पास करा सकती है मै अपना अनशन उस दिन तोडूंगा जिस दिन ये विधेयक पारित हो जाएगा। यह मेरी आखिरी जिम्मेदारी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो कई लोग मर जाएंगे।’ उनकी ये मांग दूरगामी खतरों की ओर इशारा करने वाली थी। लेकिन इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

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