Politics: Are Religious Travels Safe? - Jansatta
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राजनीतिः कितनी सुरक्षित हैं धार्मिक यात्राएं

धार्मिक यात्राओं के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में तीर्थयात्रियों की मृत्यु के आंकड़े हर साल बढ़ते ही जा रहे हैं।

Author June 3, 2017 2:11 AM

विवेक कुमार बडोला

चारधाम यात्रा का महात्म्य तो सदियों से है, पर पहले की यात्राएं दुर्गम पर्वतीय रास्तों के होते हुए भी इतनी असुरक्षित और जीवनघाती नहीं थीं। श्रद्धालुजन चारधाम तीर्थाटन का महत्त्व ही तब पूर्ण हुआ मानते थे जब वे इन पवित्र स्थानों तक पैदल ही आएं-जाएं। लेकिन अब परिवहन व्यवसाय के कारण तीर्थाटन
भी विसंगत हो चुका है।

धार्मिक यात्राओं के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में तीर्थयात्रियों की मृत्यु के आंकड़े हर साल बढ़ते ही जा रहे हैं। सामान्यत: उत्तराखंड राज्य में स्थित चार धामों की मोटर वाहनों (बसों) से तय की जाने वाली यात्रा दुर्गम पहाड़ी मार्गों के कारण जोखिम-भरी होती ही है। लेकिन तब भी ग्रीष्म ऋतु में चारधाम यात्रा के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। हिंदू धार्मिक पर्यटन की बात होती है तो यह देश में कहीं पर भी हो, फिर चाहे वह गंगा नदी के घाटों पर लगने वाले कुंभ आदि मेले हों, पर्वतों पर स्थित चारधाम के लिए की जाने वाली तीर्थयात्राएं हों या किसी जनमान्य मंदिर में चलने वाले धार्मिक उत्सव, प्राय: सभी स्थानों पर तीर्थयात्रियों की भीड़ दुर्घटनाओं की चपेट में आती ही रही है। इस प्रकार धार्मिक आस्था और भगवत-भक्ति में आयोजित इन उत्सवों में दुर्घटनाओं के कारण श्रद्धालुओं की मौत के दृश्य संवेदनशील मनुष्य को किंकर्तव्यविमूढ़ कर देते हैं। इस संदर्भ में चार वर्ष पूर्व आई केदारनाथ की आपदा भला कैसे भूली जा सकती है!

प्रतिवर्ष की तरह आजकल भी उत्तराखंड स्थित बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री नामक चार धामों सहित गढ़वाल व कुमाऊं मंडल के अन्य धार्मिक पर्यटन स्थलों पर देश-भर से तीर्थयात्रियों के अनेक दल आ रहे हैं। अन्य वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष मानसून की शीघ्र आवक के चलते इस समय पहाड़ों पर हिमपात, ओलावृष्टि, वर्षा, आंधी-तूफान के कारण राजमार्ग यात्रा के लिए सुरक्षित नहीं हैं। जगह-जगह भूस्खलन का संकट भी बना रहता है। पहाड़ी मार्गों पर भूस्खलन के बाद मिट्टी, गाद, पत्थर, जड़ सहित उखड़े विशाल वृक्ष मार्गों पर कभी भी गिर पड़ते हैं। बड़े-बड़े पत्थर, जिन्हें लोक निर्माण विभाग की आधिकारिक शब्दावली में बोल्डर कहा जाता है, वे भी भूस्खलन के चलते पहाड़ी मार्गों पर कहीं भी गिर सकते हैं।

पिछले कुछ दिनों से मौसम खराब रहने के कारण तीर्थयात्रियों के सम्मुख तीर्थाटन की परेशानियां उभर आई हैं। वर्षा के कारण पहाड़ी रास्तों पर पत्थर आ जाने से यात्रा सुगम नहीं रही। तीर्थयात्रियों के सामने रात गुजारने, खाने-पीने की समस्याएं खड़ी हो गई हैं। देश के सुदूर स्थानों से आए श्रद्धालुओं के लिए मुसीबत भरी ऐसी यात्राएं एक प्रकार से जीवन को संकट में डालने वाली सिद्ध हो रही हैं। इंदौर (मध्यप्रदेश) से चारधाम यात्रा पर आए तीर्थयात्रियों के दल को ले जा रही एक बस उत्तरकाशी और ऋषिकेश के मध्य स्थित नालूपानी के समीप खाई में गिर गई। बस में चालक-परिचालक सहित तीस लोग सवार थे। इनमें से इक्कीस लोगों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया और छह लोग बुरी तरह घायल हैं। ऐसे ही एक अन्य हादसे में कुमाऊं मंडल के तीर्थ स्थानों की यात्रा कर लौट रहे कोटद्वार गढ़वाल के तीर्थयात्रियों की बस के पिछले हिस्से पर पहाड़ी बोल्डर गिरने से छह महिलाओं की तत्काल मृत्यु हो गई। कुछ और श्रद्धालुओं की मौत के समाचार भी अनेक पहाड़ी स्थानों से मिले हैं।

चारधाम यात्रा का महात्म्य तो सदियों से है और इसी का अनुभव पाने के लिए श्रद्धालु भी सदियों से इन धामों की यात्रा करते रहे हैं। पर पहले की यात्राएं दुर्गम पर्वतीय रास्तों के होते हुए भी इतनी असुरक्षित और जीवनघाती नहीं थीं। तब तीर्थाटन का उद््देश्य विशुद्ध धार्मिक और आध्यात्मिक था। इस प्रवृत्ति के वशीभूत हो तीर्थाटन करने वाले लोग धैर्यवान थे। वे कई दिन कई रात तक पैदल ही चारधाम यात्रा किया करते थे। अपने पैरों से ही पर्वतों को नापने के ईनाम के तौर पर तीर्थयात्रियों को अनेक प्राकृतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अनुभवों की पूंजी भी मिलती थी। तब यातायात के साधन नहीं थे। बल्कि तीस-चालीस वर्ष पूर्व तक भी श्रद्धालुजन चारधाम तीर्थाटन का महत्त्व ही तब पूर्ण हुआ मानते थे जब वे इन पवित्र स्थानों तक पैदल ही आएं-जाएं। लेकिन अब यह प्रचलन नहीं रहा। परिवहन व्यवसाय के कारण तीर्थाटन भी विसंगत हो चुका है। कमाई के लालच में लोगों को वस्तुओं की तरह मोटर वाहनों में लाद कर ले जाने और लाने की प्रवृत्ति ने चारधाम यात्रा का मूल धार्मिक उद््देश्य ही नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है।

चारधाम यात्रा के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं के लिए केवल मानसून को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अज्ञात कारणों की भी पड़ताल करनी चाहिए ताकि भविष्य में यात्रा के दौरान लोगों की जान का जोखिम न हो। यात्रा के दौरान होने वाली समस्याओं को चिह्नित कर दुर्घटनाओं की पड़ताल आसानी से की जा सकती है। इसके लिए कुछ उपाय हैं। जैसे, धार्मिक यात्राओं के लिए यात्रियों और वाहनों का पंजीकरण राज्य सरकार अपनी निगरानी में कराए। निगरानी में प्रत्येक यात्री वाहन की संपूर्ण जांच हो कि उसमें कुछ खराबी या कमी तो नहीं। वाहनों के चालकों-परिचालकों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य किया जाए। इससे पता चल जाएगा कि वे सुरक्षा और दायित्व-बोध के साथ यात्रा कराने योग्य हैं अथवा नहीं। अनधिकृत रूप से श्रद्धालुओं को तीर्थाटन कराने वाली बसों के परमिट स्थायी तौर पर खत्म किए जाएं। प्रत्येक वाहन स्वामी से सरकार यह शपथपत्र मांगे कि जब तक एक तीर्थयात्री दल संपूर्ण तीर्थाटन कर सुरक्षित नहीं लौट जाता, तब तक दूसरी यात्रा के लिए चालक-परिचालक को कोई निर्देश न दे। वाहन स्वामी पहाड़ी मार्गों के लिए निर्धारित यातायात गति सीमा से ज्यादा तेज गति में वाहन न चलाएं।

दुर्घटनाओं का सारा दोष केवल वाहन स्वामियों, चालकों-परिचालकों पर नहीं डाला जा सकता। राज्य के संभागीय परिवहन अधिकारियों तथा सहायक संभागीय परिवहन अधिकारियों को भी अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए। यात्राओं के दौरान ऐसे अधिकारियों को परिवहन व्यवस्था की समुचित निगरानी करने का आधिकारिक निर्देश दिया जाए।

धार्मिक यात्राओं के दौरान ही नहीं, सामान्य रूप से भी बढ़ रही सड़क दुर्घटनाओं के मद््देनजर विगत अप्रैल माह के प्रथम सप्ताह में संशोधित मोटरवाहन अधिनियम लोकसभा में बहुमत से पारित हुआ। अभी यह विधेयक राज्यसभा से पारित होना शेष है। कुल मिलाकर अधिनियम में किए गए संशोधन सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को आर्थिक-सामाजिक रूप से यथोचित संरक्षण देने तथा दोषियों पर कठोर अर्थदंड आरोपित करने, उनका मोटर वाहन लाइसेंस स्थायी रूप से निरस्त करने तथा उन्हें कारावास भेजने के ठोस प्रावधानों से लैस हैं। अधिनियम क्रियान्वित होने पर सड़क यातायात की विसंगतियों से छुटकारा मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

उल्लेखनीय है कि सड़क दुर्घटनाओं में कीमती मानव जीवन की हानि से चिंतित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने भी एक ऐतिहासिक निर्णय विगत दिनों दिया, जिसके तहत राष्ट्रीय राजमार्गों की पांच सौ मीटर की परिधि में मदिरा की दुकान खोलने पर प्रतिबंध लगाया गया है। सड़क दुर्घटनाओं का वाहन चालकों की दिमागी हालत से सीधा संबंध रहता है। इसलिए शराब पीकर गाड़ी चलाना खतरे को न्योता देना है। पर इन परिस्थितियों में एक प्रश्न विस्मयाकुल करता ही है कि जिसे मदिरा की लत है वह तब तक खुद को पीने से किस प्रेरणावश रोकेगा, जब तक सरकारी आबकारी नीति के तहत राजस्व के लिए मदिरा बनाई जाती रहेगी। सड़क दुर्घटनाओं के लिए चालक या परिचालक को केवल इसलिए दोषी ठहराना कि वह मदिरा पीकर गाड़ी चला रहा था, उचित नहीं होगा। क्योंकि चालक हो या कोई अन्य व्यक्ति, उसका दिमागी असंतुलन कोई एक दिन के शराब पीने या एक क्षण की अशांति से नहीं होता। इसके पीछे कई कारक हैं। नियमित मदिरा का सेवन, अशांत मस्तिष्क, अनिद्रा व असभ्य व्यवहार की आदत से भी लोगों का दिमागी संतुलन डगमगा रहा है।

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