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राजनीति: चुनौतियां और प्राथमिकताएं

दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक और सामाजिक विषमता को कम करने की है। सामाजिक विषमता तो विशेषकर सामाजिक असंतोष के बढ़ने के लिए जिम्मेदार होती है। सामाजिक विषमता को न्यूनतम करने के लिए धर्म, जाति, रंग, नस्ल, लिंग आदि पर आधारित सभी तरह के भेदभावों को खत्म करना होगा। एक आशाजनक बदलाव यह आया है कि सामाजिक विषमता को खत्म करने के प्रति समाजों में अब चेतना बढ़ रही है।

दुनिया भर में बढ़ती असमानता और चुनौतियों के बीच आम जनता के लिए कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।

भारत डोगरा

हाल के दौर में विश्व में दैनिक जीवन की कठिनाइयां ही नहीं बढ़ी हैं, अपितु अनेक देशों में व्यापक आर्थिक संकट ने भी दस्तक दे दी है। ज्यादातर देश मंदी की मार का सामना कर रहे हैं। इसके साथ ही बढ़ते सामाजिक तनाव ने भी नए संकट पैदा किए हैं। यह स्थिति निश्चय ही चिंताजनक है। लेकिन कई बार यह भी देखा गया है कि ऐसी चिंताजनक स्थितियों में लोग जरूरी सुधारों, विकल्पों और बदलावों को अपनाने के लिए अधिक तैयार रहते हैं। इस दृष्टि से देखें तो विश्व के जागरूक लोगों को इस कठिन स्थिति में निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि विश्व में सही प्राथमिकताओं को प्रतिष्ठित करने के लिए अपनी सक्रियता बढ़ानी चाहिए।

एक बहुत बड़ी प्राथमिकता विश्व में विषमता कम करने और समता बढ़ाने की है। हाल के वर्षों में विश्व स्तर पर और विश्व के अनेक महत्त्वपूर्ण देशों के स्तर पर विषमता तेजी से बढ़ी है। यह बढ़ती विषमता ही निर्धनता दूर करने की राह में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। इस बढ़ती विषमता के दौर में ही सामाजिक असंतोष भी बढ़ता है और हिंसा के हालात बनते हैं।

विश्व स्तर पर हाल के समय में इतनी अधिक संपत्ति और आय सबसे बड़े अरबपतियों के हाथ में संचित हुई है कि चंद व्यक्तियों की बड़े बदलावों को प्रभावित और नियंत्रित करने की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी खतरनाक है। अनेक देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं भी अरबपतियों की संपदा के अनुचित उपयोग के कारण प्रभावित हो रही हैं।

दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक और सामाजिक विषमता को कम करने की है। सामाजिक विषमता तो विशेषकर सामाजिक असंतोष के बढ़ने के लिए जिम्मेदार होती है। सामाजिक विषमता को न्यूनतम करने के लिए धर्म, जाति, रंग, नस्ल, लिंग आदि पर आधारित सभी तरह के भेदभावों को खत्म करना होगा। एक आशाजनक बदलाव यह आया है कि सामाजिक विषमता को खत्म करने के प्रति समाजों में अब चेतना बढ़ रही है। सदियों से जिन्होंने सामाजिक विषमता सही है, वे इसके विरोध के लिए अब सक्रिय हैं और उन्हें नए कानूनों और समाज के दूसरे तबकों से समर्थन मिल रहा है।

दूसरी ओर इन समतावादी प्रक्रियाओं का विरोध भी हो रहा है। हालांकि यह क्रिया की प्रतिक्रिया का ही रूप माना जा सकता है। सामाजिक विषमता को कम करने के प्रयास सशक्त हों और अमन-शांति की राह पर सफलता प्राप्त करें, इसके लिए अभी बहुत सुलझे हुए प्रयासों की दरकार है।

विषमता कम करने के साथ-साथ दूसरी बड़ी जरूरत अमन-शांति स्थापित करने की है। आज दुनिया ऐसे दौर में है जब अति विध्वंसकारी परमाणु और अन्य हथियारों की क्षमता धरती पर संपूर्ण प्राणी जगत को नष्ट करने की है। इसके अतिरिक्त अंतरिक्ष-युद्ध का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। युद्ध के तरीकों का रोबोट-सैन्यीकरण हो रहा है। दूसरी ओर, दैनिक जीवन के स्तर पर धरेलू हिंसा, गली-मोहल्ले की हिंसा, अपराध व यौन-अपराधों की हिंसा की चपेट में प्रतिदिन लाखों लोग आ रहे हैं।

इसलिए अमन-शांति के लिए एक ओर तो वैश्विक स्तर पर सभी विध्वंसक हथियारों में भारी कमी लाने की जरूरत है, और यह कार्य बिना सभी देशों के सामूहिक प्रयासों के बिना संभव नहीं है। दूसरी ओर दैनिक जीवन में हिंसा को कम करने का बहुत व्यापक स्तर का प्रयास होना जरूरी है। अमन-शांति के प्रयासों के लिए यह भी स्पष्ट है कि हम न्याय और समता आधारित शांति चाहते हैं, क्योंकि नैतिक आधार न्याय व समता आधारित अमन-शांति के प्रयासों को ही प्राप्त होता है और इस तरह की अमन-शांति ही टिकाऊ हो सकती है। अमन-शांति की प्राथमिकता का मिलन विषमता कम करने की प्राथमिकता से होता है।

तीसरी बड़ी प्राथमिकता है पर्यावरण रक्षा की है। जलवायु बदलाव के संकट के बारे में अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों की राय बन चुकी हैं कि यह जीवन पनपाने की स्थितियों को अस्त-व्यस्त कर देने वाला संकट है। फिर बात केवल जलवायु बदलाव की ही नहीं है, जबकि वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक चर्चा जलवायु बदलाव को लेकर ही हो रही है है। लेकिन अनेक अन्य पर्यावरणीय समस्याएं भी इतनी गंभीर हो चुकी है कि वे धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं को खतरे में डाल रही हैं। इसलिए समय रहते इन समस्याओं का समाधान निकालने को बड़ी प्राथमिकता बनाना पड़ेगा। इस बारे में व्यापक वैज्ञानिक मान्यता के बावजूद इन समस्याओं के नियंत्रण के लिए उठाए जा रहे कदम अभी वास्तविक जरूरत से बहुत कम स्तर पर हैं और कुछ समस्याएं तो पहले के मुकाबले अब अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। यह एक बड़ी चुनौती है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि पर्यावरण रक्षा केवल बड़े समझौतों के स्तर पर संभव नहीं हो सकती है, बल्कि इसे दैनिक जीवन से जोड़ना जरूरी है। पर्यावरण की रक्षा के लिए जमीनी स्तर पर सबसे जरूरी यह है कि सादगी के आदर्श को अपनाया जाए और भोग-विलास, उपभोक्तावाद की सोच से बचा जाए। इस तरह पर्यावरण रक्षा की प्राथमिकता का मिलन भी विषमता कम करने की प्राथमिकता से है। अनिवार्य तौर पर अमन-शांति व विभिन्न राष्ट्रों के सहयोग के माहौल में ही पर्यावरण रक्षा के बड़े समझौते हो सकते हैं और निभ सकते हैं। युद्धों व युद्धों की तैयारियों से भयंकर प्रदूषण होता है और इस प्रदूषण को न्यूनतम करना भी जरूरी है।

लोकतंत्र की रक्षा और लोकतंत्र को सही व व्यापक अर्थों में अपनाने को भी एक बड़ी प्राथमिकता बनाना आवश्यक है। उपर्युक्त प्राथमिकताओं को अपनाने और उनकी राह पर चलने के लिए लोकतंत्र की मजबूती और उसे सही भावना से अपनाना बहुत जरूरी है। बाहरी तौर पर विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था का खूब प्रसार हुआ है। वैसे जो लोकतांत्रिक नहीं हैं, वे भी अपने को लोकतांत्रिक कहलाना ही पसंद करते हैं। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकतंत्र की मूल भावनाओं का तेजी से ह्रास हो रहा है।

यह एक महत्त्वपूर्ण वजह है कि अन्य गंभीर समस्याओं को सुलझाने में कठिनाइयां पेश आ रही हैं। जनसाधारण तक सभी महत्त्वपूर्ण समस्याओं, उनके संभावित समाधानों और विकल्पों की जरूरी जानकारी ठीक से पंहुचे, व्यापक विमर्श हो और ऐसी प्रक्रियाएं हों जिनके माध्यम से उचित समाधानों को कार्यान्वित किया जाए, यह सब लोकतंत्र के मजबूत होने के साथ संभव होना चाहिए था। लेकिन विश्व के अधिकांश समाज और देश इस दिशा से भटक गए हैं। यही वजह है कि सबसे गंभीर समस्याओं के समाधान से हम दूर हैं। यहां तक कि धरती पर जीवन के अस्तित्व को खतरे में डालने वाली समस्याओं की भी घोर अनदेखी हो रही है।

पांचवी प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि दैनिक व सार्वजनिक जीवन में नैतिकता प्रतिष्ठित करने के लिए निरंतरता से प्रयास होने जरूरी हैं। यह नैतिकता किसी एक धर्म या संप्रदाय की नैतिकता नहीं है, अपितु यहां अर्थ नैतिकता के ऐसे शाश्वत मूल्यों से है, जिन्हें विश्व स्तर पर मान्यता मिल सकती है। किसी के साथ रंग, जाति, धर्म, नस्ल आदि के आधार पर भेदभाव न करना, किसी को जान-बूझ कर क्षति न पहुंचाना, दूसरों के हक न छीनना, समता व सादगी के आदर्शों को स्वीकार करना और प्रकृति व पर्यावरण के लिए रक्षा की प्रवृत्ति अपनाना। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि विकसित देशों में ये मूल्य गायब होते जा रहे हैं।

अमेरिका की ताजा नस्लवादी हिंसा ने दुनिया को एक बार फिर सकते में डाल दिया है। परिवार, शिक्षा संस्थानों, विभिन्न अन्य सामुदायिक स्तरों पर निरंतरता से इन जीवन-मूल्यों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास यदि विश्व स्तर पर हो तो अल्प समय में ही कल्याणकारी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

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