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राजनीतिः क्यों नहीं चाहते बेटियां

घर-परिवार से लेकर समाज के माहौल तक, आज भी बेटियों के जन्म को लेकर न तो सकारात्मकता दिखती है और न ही दिली स्वीकार्यता। कभी भ्रूण हत्या तो कभी बेटियों को कूड़े के ढेर में छोड़ देने की असंवेदनशील और अमानवीय घटनाएं भी जब-तब सामने आती रहती हैं।

Author Updated: October 9, 2019 1:26 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

जिस समाज में बेटियों को दुनिया में आने का हक न मिले, वहां उनके दूसरे मानवीय अधिकारों की बात करना बेमानी है। अफसोस कि बेटे-बेटी के फर्क की बदौलत उपजी मानसिकता की मौजूदगी आज भी भारतीय समाज की कटु सच्चाई बनी हुई है। तभी तो लिंग परीक्षण और भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां न केवल अपनी जड़ें जमाए हुए हैं, बल्कि देश में बने सख्त कानूनों के चलते इन्हें अंजाम देने के लिए नए रास्ते भी खोजे जा रहे हैं। हाल में राजधानी दिल्ली में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा एक कॉल सेंटर पर छापा मारने पर ऐसा ही दुखद और हैरान करने वाला सच सामने आया है। इस कॉल सेंटर में आइवीएफ के जरिए महिलाओं को शत-प्रतिशत बेटा पैदा करने की गारंटी दी जाती थी। मोटी रकम वसूल कर बच्चे के लिंग की जांच का इंतजाम किया जाता था।

गौरतलब है कि हमारे देश में लिंग परीक्षण के लिए कड़े कानून बने हुए हैं। ऐसे में इस अमानवीय गोरखधंधे से जुड़े लोगों ने महिलाओं को विदेश भेज कर लिंग परीक्षण करवाने का रास्ता निकाल लिया। महिलाओं को उन देशों में भेजा जाता था, जहां गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग परीक्षण कराना गैर-कानूनी नहीं है। जांच में सामने आया कि इस आइवीएफ सेंटर के माध्यम से महिलाओं को मनचाही संतान पाने के लिए दुबई, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों में भेजा जाता था। राष्ट्रीय स्तर पर जाल फैलाए इस गिरोह का देश भर में करीब एक सौ आइवीएफ केंद्रों के साथ जुड़ाव था। कहने को प्रगतिशील और बदलाव की राह पर आगे बढ़ रहे हमारे समाज में परंपराओं और रूढ़ियों की जकड़न देखिए कि इस कॉल सेंटर के माध्यम से परीक्षण के लिए अभी तक करीब छह लाख लोगों को विदेशों में भेजा जा चुका है। ऐसे हालात तब हैं जब लिंगानुपात राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बना हुआ है।

दरअसल, बेटियों की सहज स्वीकार्यता न होने की यह स्थिति इस हकीकत को पुख्ता करती है कि हमारे समाज में विचार और व्यवहार के स्तर पर दोहरे मानक बने हुए हैं। कथनी और करनी का यह अंतर बेटियों के जीवन का दुश्मन बन गया है। नतीजतन, पितृसत्तात्मक सोच वाले हमारे सामाजिक ढांचे में बहुत कुछ बदल कर भी कुछ न बदलने की स्थितियां बनी हुई हैं। कुछ समय पहले आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सुनियोजित लिंगभेद के कारण भारत की आबादी से करीब पांच करोड़ लड़कियां और महिलाएं गायब हैं। अफसोस कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे तो लगते हैं, पर कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां भी जड़ें जमाए हुए हैं। तभी तो बेटे पैदा करने की चाह में लोग एजेंटों को मोटी रकम चुका कर विदेश तक जा रहे हैं।

राष्ट्रीय औसत के अनुसार देश में प्रति एक हजार लड़कों के पीछे नौ सौ तियालीस लड़कियां हैं। कई प्रांतों में यह औसत काफी कम है। बीते साल आई नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक देश के इक्कीस बड़े राज्यों में से सत्रह राज्यों में लिंगानुपात का आंकड़ा असंतुलित है। रिपोर्ट के मुताबिक इन सत्रह प्रांतों में लिंग अनुपात दस अंक गिरा है। ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ की रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार गुजरात के अलावा हरियाणा में भी लिंगानुपात में भारी गिरावट आई है। गौरतलब है कि नीति आयोग भी असंतुलित होते लिंगानुपात पर चिंता जताते हुए कह चुका है कि लिंगानुपात में सुधार लाने के लिए लोगों को बेटियों के महत्त्व को समझना होगा और जागरूकता लानी होगी।

चिंतनीय है कि बेटियों को गर्भ में मार डालने का कृत्य आपराधिक मामला भर नहीं है। यह पूरे समाज का ताना-बाना बिगाड़ने वाली सोच है। लिंगानुपात का असंतुलन कई मोर्चों पर चिंताका विषय बन रहा है। कई प्रदेशों में बेटों के लिए दुल्हन नहीं मिल रही है। दूसरे राज्यों से दुल्हन लाकर बेटों का घर बसाया जा रहा है। इतना ही नहीं, बेटे और बेटी में किए जाने वाले भेदभाव की मानसिकता के चलते आज भी दूर-दराज के गांवों में तो बेटियों की शिक्षा और स्वास्थ्य को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। समग्र रूप से देखा जाए तो हमारे समाज में कुपोषित बच्चियों का प्रतिशत काफी ज्यादा है। हर क्षेत्र में अपनी काबिलियत के बल पर पहचान बना कर आगे बढ़ती बेटियां आज भी अपने अस्तित्व के लिए जूझती नज़र आ रही हैं। मोर्चे पर खुद को साबित करने के बावजूद बेटियों की यह जंग उनके जन्म लेने से पहले ही शुरू हो जाती है।

देश का सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण बताता है कि आज भी समाज में बेटियां, जन्म लेने से लेकर परवरिश पाने तक हर तरह के भेदभाव की शिकार हैं। यह दुखद ही है कि साक्षरता के बढ़ते आंकड़े, तकनीक की पहुंच और बदलते सामाजिक-पारिवारिक परिवेश में भी बेटियों को लेकर सोच जस की तस बनी हुई है। कुछ समय पहले भारत के महापंजीयक की ओर से करवाए गए वार्षिक सर्वे (एसआरएस) में यह बात सामने आई थी कि बालिका भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक विकृति देश के सबसे समृद्ध और शिक्षित राज्यों में भी मौजूद है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि लोगों की मानसिकता में बदलाव आना जरूरी है।
भ्रूण हत्या और लिंगभेद के खिलाफ तमाम सरकारी अभियानों और सामाजिक जागृति लाने के प्रयासों के बावजूद लिंगानुपात में भारी गिरावट आ रही है, क्योंकि देश में बने कानूनों का तोड़ निकाल कर लिंग परीक्षण के नए मार्ग तलाश लिए गए हैं।

संगठित गिरोह की तरह काम करने वाले ऐसे एजेंट मोटी कमाई करने के लिए बेटियों के जन्म को बाधित करने की सोच रखने वाले परिवारों की राह आसान बना रहे हैं। आखिर क्यों बेटियों के स्वागत और सम्मान का माहौल आज भी केवल एक उम्मीद भर है? घर-परिवार से लेकर समाज के माहौल तक, आज भी बेटियों के जन्म को लेकर न तो सकारात्मकता दिखती है और न ही दिली स्वीकार्यता। कभी भ्रूण हत्या तो कभी बेटियों को कूड़े के ढेर में छोड़ देने की असंवेदनशील और अमानवीय घटनाएं भी जब-तब सामने आती रहती हैं।

सवाल है, आखिर ऐसा क्यों है कि खेलों से लेकर अंतरिक्ष तक प्रभावी दखल रखने और कीर्तिमान बनाने वाली बेटियों के लिए दुनिया में आने से पहले ही संघर्ष का सफर शुरू हो जाता है? बेटी का जन्म क्यों परिवारजनों के माथे पर शिकन ले आता है? अफसोस इस बात का है कि गांवों-कस्बों में ही नहीं, पढ़े-लिखे शहरी परिवारों को भी बिटिया की चाह नहीं है। यही वजह है कि इसका हल सरकारी अभियान और कानूनी सख्ती से ज्यादा सामाजिक सोच में संवेदनशीलता आने से निकल पाएगा। साथ ही, लिंग अनुपात दुरुस्त करने के लिए सामाजिक परिवेश को सुरक्षित और महिलाओं के लिए सम्माननीय भी बनाना होगा।

बेटे की चाहत ही नहीं दहेज, बढ़ते महिला अपराध, लैंगिक असमानता और सामाजिक भेदभाव ऐसे बड़े कारण हैं जो बेटियों की स्वीकार्यता में बाधक बनते हैं। बेटियों के साथ जन्म से पहले ही दोयम दर्जे का व्यवहार न हो इसके लिए लोगों की भावनाओं का बदलना आवश्यक है। भावनात्मक संवेदनशीलता लड़कियों के प्रति समाज का नजरिया बदलने में सकारात्मक और सहयोगी साबित होगी। यों भी बेटियों की शिक्षा, सम्मान और उनके सर्वांगीण विकास के लिए ऐसे ही परिवेश की दरकार है। हमारे यहां सामुदायिक स्तर पर बेटियों के प्रति मौजूद भेदभाव और असंवेदनशील माहौल के चलते ही मां-बाप को लड़कियां जन्म से पहले ही भार लगने लगती हैं। यह एक जमीनी हकीकत है कि आज भी गांवों-कस्बों से लेकर महानगरों तक बेटियों की सुरक्षा और उनके प्रति कुंठित सोच से उपजी समस्याएं कम नहीं हैं। निस्संदेह यह कुरीति सामूहिक सहभागिता और इससे जुड़े समस्त पहलुओं पर जागरूकता आने से ही दूर हो पाएगी।

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