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राजनीतिः मुशर्रफ को मिली फांसी की सजा से हैरान सेना

पाकिस्तान में पिछले कुछ सालों में न्यायिक सक्रियता से पाकिस्तान की सेना, खुफिया एजेंसी आइएसआइ और राजनीतिक दलों के नेता बेचैन हैं। हाल में पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल बाजवा की उम्र विवाद को लेकर भी सेना और अदालत आमने-सामने रही। इस मामले में न्यायाधीशों पर अशोभनीय टिप्पणी की गई। यहां तक कि उन्हें भारत और अमेरिका का एजेंट बताने की कोशिश भी हुई।

मुशर्रफ का बचाव करते हुए सेना की ओर से कहा गया कि पूर्व सेना प्रमुख और पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने मुल्क की चालीस साल तक सेवा की है। जिस व्यक्ति ने मुल्क के लिए जंग लड़ी, वो कभी देशद्रोही नहीं हो सकता है।

ब्रह्मदीप अलूने

नीतियों, साधनों, कार्यों और दृष्टिकोण से सेना का सर्वसत्तावाद प्रजातांत्रिक व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत होता है। ऐसे में न्यायपालिका की निष्पक्षता उसे स्वीकार नहीं हो सकती। सैन्य शासन की परंपराओं से अभिशप्त राष्ट्र पाकिस्तान में लोकतंत्र होने का दिखावा भले किया जाए, लेकिन पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ को देशद्रोह के आरोप में फांसी की सजा देने के अदालती फैसले के बाद विरोध से समूची व्यवस्था की कलाई खुल गई है। 14 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में आए पाकिस्तान ने तीन दशक से ज्यादा का सैन्य शासन देखा और भोगा है। 1956 में देश का संविधान लागू हुआ और इसे इस्लामिक गणतंत्र का नाम दिया गया। लेकिन गणतांत्रिक परंपराओं के स्थापित होने से पहले ही 1958 में पाकिस्तान में सेना द्वारा शासन पर नियंत्रण कर लिया गया। मार्शल अय्यूब खान पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति बने और इस प्रकार पाकिस्तान के संसदीय लोकतंत्र को सेना ने अपने कब्जे में कर लिया। इसके बाद से लगातार सेना पाकिस्तान की सुरक्षा और भारत विरोध के नाम पर अपना प्रभुत्व जमाए हुए है। आक्रामक और कूटनीतिक तरीकों से सेना का अधिनायकवाद मजबूत होता रहा और यह अब पाकिस्तान की नियति बन गया है।

वैश्विक दबाव के आगे पाकिस्तान को लोकतांत्रिक दिखाने की कोशिशें भी की गईं, लेकिन इतिहास में एक बार ही कोई निर्वाचित सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर सकी। इस समय देश में इमरान खान की सरकार है और वे सेना द्वारा स्थापित प्रधानमंत्री कहे जाते हैं। इन परिस्थितियों में देश की न्यायपालिका के पूर्व सेना अधिकारी पर एक न्यायिक निर्णय से सत्ता और सेना परेशान और हैरान है। पूर्व सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ के खिलाफ देशद्रोह का मामला तीन नवंबर 2007 को पाकिस्तान में आपातकाल लगाने से जुड़ा था। उस समय मुशर्रफ ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए देश में आपातकाल घोषित कर संविधान को निलंबित कर दिया था।

समान व्यवहार और समान दृष्टिकोण से ही न्यायिक व्यवस्था मजबूत और विश्वसनीय होती है। लेकिन पाकिस्तान में सेना का संकल्पित सर्वाधिकार न्यायपालिका को स्वतंत्र न्यायिक निर्णय की आजादी नहीं देता। ऐसे में सेना ने अपने पूर्व अधिकारी को अदालत द्वारा दी गई कड़ी सजा को चुनौती देने में देर नहीं की। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने बाकायदा बयान जारी कर अदालत के फैसले की आलोचना करते हुए इसे जल्दबाजी में सुनाया गया फैसला बताया।

मुशर्रफ का बचाव करते हुए सेना की ओर से कहा गया कि पूर्व सेना प्रमुख और पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने मुल्क की चालीस साल तक सेवा की है। जिस व्यक्ति ने मुल्क के लिए जंग लड़ी, वो कभी देशद्रोही नहीं हो सकता है। इस अदालती कार्यवाही में संविधान की भी उपेक्षा की गई है, यहां तक कि अदालत में मुशर्रफ को खुद का बचाव करने का भी मौका भी नहीं दिया गया, जो किसी भी नागरिक का बुनियादी अधिकार है। सेना की इस कड़ी टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान का लोकतंत्र सैन्य नियंत्रित है और वहां न्यायपालिका सैन्य अधिकारियों को न्याय की समान परिधि में रखने का साहस नहीं कर सकती। सेना ने न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करते हुए यह भी कह दिया कि जनरल परवेज मुशर्रफ किसी सूरत में गद्दार नहीं हो सकते।

पाकिस्तान में पिछले कुछ सालों में न्यायिक सक्रियता से पाकिस्तान की सेना, खुफिया एजेंसी आइएसआइ और राजनीतिक दलों के नेता बेचैन हैं। हाल में पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल बाजवा की उम्र विवाद को लेकर भी सेना और अदालत आमने-सामने रही। इस मामले में न्यायाधीशों पर अशोभनीय टिप्पणी की गई। यहां तक कि उन्हें भारत और अमेरिका का एजेंट बताने की कोशिश भी हुई। इस मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आसिफ सईद खोसा ने अपनी टिप्पणी में इसे निराशाजनक बताते हुए कहा था कि संवैधानिक संस्थाओं के बारे में ऐसी बातें नहीं होनी चाहिए। इसके पहले न्यायपालिका पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और नवाज शरीफ को भी कड़ी सजा सुना चुकी है।

हालांकि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने खुफिया एजेंसी आइएसआइ और सेना को सियासत से अलग रहने का निर्देश दिया था। इसके बाद आइएसआइ पर तंज कसने के चलते हाईकोर्ट के जज शौकत अजीज सिद्दीकी को पद से हटा दिया गया था। इस घटना से यह साफ हो गया था कि आइएसआइ की पाकिस्तान में बहुत अहमियत है और उस पर अदालती फैसला लागू करना आसान काम नहीं है। किसी लोकतांत्रिक देश में न्यायपालिका के फैसलों पर विपरीत टिप्पणी करने का साहस किसी सत्ताधारी प्रधानमंत्री का नहीं हो सकता। लेकिन सेना के दबाव में इमरान खान ने मुशर्रफ पर दिए गए फैसले को अराजकता उत्पन्न करने वाला बताया, वहीं देश के अटार्नी जनरल ने ऊपरी अदालत में मुशर्रफ का बचाव करने की बात कही।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए राजनीतिक दलों में मुद्दों पर आधारित विरोध के साथ ही आम सहमति भी जरूरी है, लेकिन पाकिस्तान में सेना अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए सत्ता के संवैधानिक संकट को पसंद करती है। राजनीतिक अस्थिरता से लोगों का भरोसा सेना पर बढ़ता है और यह स्थिति सेना के लिए मुफीद मानी जाती है। कुछ साल पहले तक सेना राजनीतिक अस्थिरता फैलाने के लिए राष्ट्रपति का सहारा लेती थी। जनरल जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ जैसे तानाशाहों ने इसका भरपूर दुरुपयोग किया।

साल 2008 में जरदारी ने राष्ट्रपति बनते ही इस स्थिति को उलट दिया और देश की व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव कर दिया। एक संवैधानिक संशोधन से राष्ट्रपति की शक्तियां बहुत ही सीमित कर दी गर्इं और पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार को भंग करना मुश्किल बना दिया गया। ऐसे में सेना न्यायपालिका की ओर देखती है जिससे लोकतांत्रिक सरकारों को काबू किया जा सके। साल 2018 में नवाज शरीफ पर प्रतिबंध लगाते हुए न्यायमूर्ति उमर अता बंदियाल के फैसले में कहा गया था कि भविष्य में किसी भी सांसद या लोक सेवक को अगर अनुच्छेद 62 के तहत अयोग्य ठहराया जाता है, तो उन पर यह प्रतिबंध स्थायी होगा, ऐसे व्यक्ति चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेंगे और न ही संसद के सदस्य बन सकेंगे। पाकिस्तान में सेना ऐसे न्यायिक निर्णयों को लोकतांत्रिक नेताओं पर लगाम लगाने के तौर पर पसंद करती है, लेकिन उसे अपने मामलों में कोई दखल स्वीकार नहीं है।

पाकिस्तान में कोई भी लोकतांत्रिक सरकार सेना की इच्छाओं की अनदेखी करने का साहस नहीं जुटा पाती है। नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो ने ऐसा करने की कोशिश की थी और उन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। बेनजीर भुट्टो की हत्या एक आतंकवादी हमले में साल 2007 में हो गई थी और ऐसा माना जाता है कि सेना के उच्च अधिकारियों ने उनकी सुरक्षा को लेकर जानबूझ कर लापरवाही की। यहां तक कि बेनजीर बुट्टो की हत्या में भी सेना और आइएसआइ की साजिश की बातें सामने आती रही हैं। जनरल जिया उल हक ने न्याय को नजरअंदाज कर हत्या के एक मामले में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटकवा दिया था। पाकिस्तान सेना ने इन तानाशाहों का हमेशा समर्थन किया है।

परवेज मुशर्रफ को लेकर पाकिस्तान के विपक्षी दल और न्यायपालिका सख्त हैं। ऐसे में इमरान खान यदि सेना के साथ मिलकर मुशर्रफ को बचाने का प्रयास करते है तो देश में विरोधी दलों के स्वर बुलंद हो सकते हैं। बहरहाल, पाकिस्तान में सेना और न्यायपालिका आमने-सामने है। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने मुशर्रफ के पक्ष में बयान देकर और अदालती फैसले की आलोचना कर अदालत की अवमानना की है और यह स्थिति पाकिस्तान का आंतरिक, राजनीतिक और संवैधानिक संकट बढ़ा सकती है।

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