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राजनीतिः आशियाना बचाने की लड़ाई

देश में जनजातियों के आर्थिक विकास पर केंद्रित राष्ट्रीय जनजाति वित्त विकास निगम की भी स्थापना की गई है। इसके तहत भारी धनराशि का प्रावधान किया जाता है लेकिन हकीकत यह है कि इससे जनजातीय लोगों को वांछित लाभ नहीं मिल पाता। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों की घोर उपेक्षा के शिकार आदिवासी और वनवासी मुख्यधारा से पूरी तरह कटे हुए हैं। इन्हें देश की मुख्यधारा में शामिल करने की कभी भी सही कोशिशें नहीं की गईं।

Author Published on: July 18, 2019 12:59 AM
देश में जनजातियों के आर्थिक विकास पर केंद्रित राष्ट्रीय जनजाति वित्त विकास निगम की भी स्थापना की गई है जिसके तहत भारी धनराशि का प्रावधान किया जाता है, लेकिन इसकी हकीकत यह है कि इससे जनजातीय लोगों को वांछित लाभ नहीं मिल पाता। केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों की घोर उपेक्षा के शिकार आदिवासी और वनवासी मुख्य धारा से पूरी तरह कटे हुए हैं।

संजय ठाकुर

मुख्यधारा से कटी भारत के वनों पर आश्रित एक बड़ी आबादी को देश के सर्वोच्च न्यायालय में अपना आशियाना बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। हाल में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (वनाधिकार कानून) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने वनों पर आश्रित आदिवासी समुदायों को अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए वन-भूमि से बेदखल करने का फैसला सुनाया था। इसके तहत इक्कीस राज्यों के मुख्य सचिवों को उन सभी मामलों में जिनके भूमि-स्वामित्व के दावे खारिज कर दिए गए हैं, वन-भूमि से बेदखल करने और देहरादून स्थित भारतीय वन सर्वे को हटाए गए कब्जाधारियों से संबंधित उपग्रह-छवि आधारित रिपोर्ट पेश करने को कहा गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे मामलों में जहां सत्यापन, पुनर्सत्यापन या पुनर्विचार की प्रक्रिया लंबित है वहां राज्यों को प्रक्रिया पूरी कर एक रिपोर्ट पेश करने को भी कहा था। फिर एक अन्य याचिका दायर होने पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले के आदेश पर रोक लगाते हुए केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों को फटकार लगाई और कहा कि उन्होंने अभी तक आदिवासियों की इस समस्या को क्यों नहीं सुलझाया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम राहत दिए जाने के बाद भी आदिवासियों की चिंता बरकरार है क्योंकि सही कानून की गैर-मौजूदगी में यह राहत स्थायी नहीं है और उनका आशियाना उजड़ने का खतरा बना हुआ है।
आदिवासियों के दावों की ज्यादातर अस्वीकृतियां ग्रामसभा स्तर पर ही की गई हैं।

वनाधिकार कानून के तहत इसके बाद दावे उपखंड स्तरीय समिति और फिर जिला स्तरीय समिति में जाते हैं। दावा इन तीनों में से किसी भी स्तर पर खारिज हो सकता है। दावे के किसी भी स्तर पर खारिज होने के बाद अगले स्तर पर अपील की जा सकती है। दावे के जिला स्तरीय समिति में खारिज होने के बाद फैसले को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन ज्यादातर मामले न्यायालय तक नहीं पहुंचते क्योंकि एक तो आदिवासियों में अशिक्षा के कारण जागरूकता की कमी है और दूसरे इन लोगों की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है। दावों की ज्यादातर अस्वीकृतियां सबूतों की कमी के कारण होती हैं जिन्हें आदिवासी जुटा नहीं पाते। इस तरह से व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार के दावे सही छानबीन के बगैर ही खारिज कर दिए जाते हैं।

ज्यादातर यह देखने में आया है कि पर्यावरण व वन्य संरक्षण के नाम पर वनों पर आश्रित आदिवासी और गैर-आदिवासी गरीब लोगों को ऐसी वन-भूमि से बेदखल कर दिया जाता है जिस पर वे सदियों से रहते आए हैं। ऐसा करना निश्चित रूप से वनाधिकार कानून के प्रावधानों के खिलाफ है जिससे इनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। वास्तविकता तो यह है कि आदिवासी पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं और कभी भी जरूरत से ज्यादा प्रकृति या प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं करते।

संसद में 18 दिसंबर, 2006 को अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 सर्वसम्मति से पारित किया गया था। एक साल बाद 31 दिसंबर, 2007 को इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की गई। इससे पहले भारत में वनों के संबंध में साल 1876 से साल 1927 के बीच पारित किए गए भारतीय वन कानूनों के प्रावधानों को ही लागू किया जाता था। एक लंबे वक्त तक साल 1927 का वन कानून ही भारत का वन कानून रहा। हालांकि ऐसे किसी भी कानून का पर्यावरण और वन संरक्षण से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन फिर भी पर्यावरण और वन संरक्षण के नाम पर जहां-तहां इसका बेजा इस्तेमाल किया जाता रहा। भारत सरकार की टाइगर टास्क फोर्स ने भी यह माना है कि वन संरक्षण के नाम पर अवैध और असंवैधानिक रूप से भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है। ऐसे में निश्चित रूप से वर्ष 2006 में पारित वनाधिकार कानून की जरूरत और उपयोगिता समझी जा सकती है।

भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति श्रेणी में रखा गया है। वर्ष 1960 में चंदा समिति ने अनुसूचित जनजातियों के तहत किसी भी जाति को शामिल करने के लिए भौगोलिक एकाकीपन, विशिष्ट संस्कृति, पिछड़ापन, संकुचित स्वभाव और आदिम जाति के लक्षण जैसे पांच मानक निर्धारित किए थे। इस समिति द्वारा निर्धारित लक्षणों के अनुसार देश में कुल चार सौ इकसठ जनजातियां हैं। आदिवासियों की सबसे ज्यादा संख्या मध्यप्रदेश में है जहां इक्कीस फीसद आदिवासी हैं। संथाल देश की सबसे बड़ी जनजाति है। मध्यप्रदेश में विधानसभा की कुल दो सौ तीस सीटों में से सैंतालीस सीटें जनजातीय श्रेणी के लिए आरक्षित हैं जिनमें तकरीबन आधा हिस्सा पश्चिमी जिलों मालवा और निमाड़ का है।

देश की चार सौ इकसठ जनजातियों में से चार सौ चौबीस जनजातियां देश के उत्तरी, पूर्वी, मध्य, पश्चिमी, दक्षिणी और द्वीपीय क्षेत्रों में रहती हैं। उत्तरी क्षेत्र में उत्तराखंड, जम्मू व कश्मीर और हिमाचल प्रदेश राज्य आते हैं जहां बुक्सा, माहगीर, थारू, खरवार, शोर्का, जौनसारी, राजी, भूटिया, लेपचा, खांपटी, गुर्जर, भरवर वाल, गद्दी, लामा, लाहौली, पंगवाल, बकरायल और किन्नौरा समुदायों के लोग रहते हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, असम, नगालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय और सिक्किम आते हैं जहां मिजो, मिकिर, चकमा, लुसाई, लखेर, हमर, वुकी, मोनपास, शेरदुक पेस, भारी, बर्मास, गालोंग, अक्का, अबोर, कुकी, खासी, अबोर, नगा, मिशमिस, अपतनिस, अंगामी, सिंधो, पुरुम, कुकी, सीमा, भूटिया, खशिया, लुशाई, हलम, माग, मुण्डा, भील, संथाल, जमनिया, उचाई, रियांग, गारो, खासी, जयंतिया और लेपचा समुदायों के लोग हैं। ये सभी जातियां भी मोंगोलॉयड हैं। पूर्वी क्षेत्र में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा आते हैं जहां भुइयां, मुंडा, खोंड, बनजारा, संथाल, बैगा, गोंड, बिरहोर, खड़िया, असुर, मुंडा, कोरबा जनजातियां हैं। मध्य क्षेत्र में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पूर्वी आंध्र प्रदेश और कर्नाटक आते हैं जहां बिरहोर, भील, गुड़ावा, मिहाल, नट, कमार, धनवार या धनुहार, कोरवा बेनबरिया, हल्बा, कोरकू, गोण्ड, बैगा, परधान, उरांव, कोल, भारिया, अगरिया आदि समुदायों के लोग आते हैं।

हकीकत तो यह है कि केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों के पास न तो वनों से संबंधित कोई पुख्ता रिकार्ड है और न ही आदिवासियों और वनवासियों को लेकर कोई सही आंकड़े हैं। वनों, आदिवासियों और वनवासियों को लेकर कभी भी सही सर्वेक्षण नहीं कराया गया। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा आदि राज्यों का बहुत बड़ा क्षेत्र वनाच्छादित है जहां के वन, आदिवासी और वनवासी पूरी तरह से उपेक्षित हैं। मध्यप्रदेश के 82.9 फीसद वन क्षेत्र का कभी सर्वेक्षण नहीं कराया गया और ओड़िशा का चालीस फीसद से ज्यादा रिजर्व वन-क्षेत्र सरकार की घोर उपेक्षा का शिकार है। यही हाल दूसरे राज्यों का भी है। इस तरह से अभी तक देश के साठ फीसद राष्ट्रीय उद्यानों की जांच और अधिकारों के निपटान की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है। यों तो देश में अनुसूचित जनजाति श्रेणी के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए योजनाओं और धन की समुचित व्यवस्था है, लेकिन न तो इन योजनाओं का व्यावहारिक रूप ही कहीं देखने में आता है और न ही धन का सही उपयोग।

देश में जनजातियों के आर्थिक विकास पर केंद्रित राष्ट्रीय जनजाति वित्त विकास निगम की भी स्थापना की गई है जिसके तहत भारी धनराशि का प्रावधान किया जाता है, लेकिन इसकी हकीकत यह है कि इससे जनजातीय लोगों को वांछित लाभ नहीं मिल पाता। केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों की घोर उपेक्षा के शिकार आदिवासी और वनवासी मुख्य धारा से पूरी तरह कटे हुए हैं। इन्हें देश की मुख्यधारा में शामिल करने की कभी भी सही कोशिशें नहीं की गर्इं। मौजूदा वक्त में आदिवासियों और वनवासियों के लिए कोई ठोस नीति बनाए जाने की सख्त जरूरत है।

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