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राजनीतिः चुनाव सुधार और राजनीतिक दल

जब लोकतंत्र में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का प्रवेश होगा तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रह पाएगा। सुप्रीम कोर्ट तक राजनीति के अपराधीकरण पर कई बार चिंता व्यक्त कर चुका है और इस बारे में संसद को कानून बनाने को कह चुका है। लेकिन यह ऐसा मुद्दा है जिस पर सारे राजनीतिक दलों ने चुप्पी साध रखी है।

Author Updated: February 13, 2020 1:57 AM
चुनाव आयोग के निर्देशों के मुताबिक सभी राज्यों में एक उम्मीदवार चुनाव प्रचार के लिए अधिकतम सत्तर लाख रुपए खर्च कर सकता है। छोटे राज्यों में यह सीमा अट्ठाईस लाख तक है। अरुणाचल प्रदेश, गोवा और सिक्किम में खर्च की अधिकतम सीमा चौवन लाख रुपए है।

लालजी जायसवाल

चुनाव सुधार को लेकर उम्मीदें तो कई सालों से की जा रही हैं, लेकिन अभी भी इस दिशा में ठोस कदम बढ़ नहीं पाए हैं। इसीलिए चुनाव सुधारों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, खासकर तब जब चुनाव नजदीक होते हैं। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतने महत्त्वपूर्ण विषय पर चुनाव आयोग और सरकार गंभीर क्यों नहीं हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि चुनाव आयोग शक्तिहीन संस्था हो चुकी है। आज भी चुनाव आयोग में संपूर्ण शक्तियां विद्यमान हैं। अगर भारत में चुनाव सुधारों को लेकर की गई पहल पर गौर करें, तो नब्बे के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन ने सबसे पहले इस दिशा में बड़े कदम उठाए थे। शेषन ने राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की वास्तविक शक्तियों का अहसास कराया था। इसके बाद ज्यादातर मुख्य चुनाव आयुक्तों ने चुनाव सुधार की दिशा में कुछ न कुछ ऐसा जरूर किया, जिससे आयोग की शक्तियों के बारे में आमजन को भी पता चला।

लेकिन लंबे समय से यह देखा जा रहा है कि देश की सर्वोच्च अदालत तो चुनाव सुधार को लेकर सक्रिय है और समय-समय पर इस बारे में निर्देश भी जारी होते रहे हैं, लेकिन हमारे राजनीतिक दल इसमें सहयोग करने के बजाय असहयोग और विरोध का रास्ता ही अपनाते रहे हैं। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि राजनीतिक दलों को इस बात का भय सताता रहता होगा कि अगर चुनाव प्रक्रिया सुधरी तो इसका पहला और सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ेगा और आपराधिक संलिप्तता व चुनावों में धन के अथाह इस्तेमाल पर रोक लग जाएगी।

राजनीतिक दल चुनावों में जिस तरह से भारी मात्रा में पैसे का इस्तेमाल करते हैं, वह एक कड़वी सच्चाई है। चुनाव आयोग के अथक प्रयासों के बावजूद चुनावी खर्च की सीमा बेमानी साबित होती जा रही है। इससे राजनीति में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होती चली गईं और अंतत: भ्रष्टाचार सारी व्यवस्था को अपने लपेटे में लेकर कमजोर बना देता है। अक्सर ऐसे चुनावी धन का स्रोत अपराध में छिपा होता है। चुनावों में बेहिसाब धन अपराधी तत्वों द्वारा इस उम्मीद से लगाया जाता है कि चुनाव बाद वे सरकारी ठेके और दलाली पर काबिज हो सकेंगे। यहीं से राजनीतिक भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है।

चुनाव आयोग जब राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले उल्लंघनों और अनुचित व्यवहार को रोक पाने में असफल रहता है, तो इससे उसकी छवि को नुकसान पहुंचता है। जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 के अंतर्गत धारा 29 (ए) में इसे पंजीकरण का अधिकार प्राप्त है, परंतु नियमों के उल्लंघन की चरम सीमा तक जाने पर भी उसे राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार नहीं है। सन 1998 में ही चुनाव आयोग में सुधारों की सिफारिश की गई थी। चुनाव आयुक्त ने अपने अधिकार बढ़ाए जाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा भी दिया था। लेकिन राजनीतिक दल, चुनाव आयोग की कमजोरियों का लाभ उठाते हुए लगातार चुनाव आचार संहिता को तोड़े जा रहे हैं।

चुनाव तो लोकतंत्र का आधार है, और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ही लोकतांत्रिक वैधता का केंद्र है। चुनाव के संरक्षक को आज स्वयं की स्वायत्तता की रक्षा की आवश्यकता आन पड़ी है, इस पर तुरन्त ही कोई कदम उठाए जाने की दरकार है। अगर चुनाव में खर्च की बात की जाए, तो प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक उम्मीदवार को चुनाव प्रचार, परिवहन जैसी मदों पर लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। चुनाव आयोग के निर्देशों के मुताबिक सभी राज्यों में एक उम्मीदवार चुनाव प्रचार के लिए अधिकतम सत्तर लाख रुपए खर्च कर सकता है। छोटे राज्यों में यह सीमा अट्ठाईस लाख तक है। अरुणाचल प्रदेश, गोवा और सिक्किम में खर्च की अधिकतम सीमा चौवन लाख रुपए है। दिल्ली के लिए यह सीमा सत्तर लाख रुपए और अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के लिए चौवन लाख रुपए है। लेकिन देखने में आया है कि पिछले कुछ वर्षों में कानून-सम्मत और वास्तविक खर्च के बीच अंतर काफी बढ़ा है।

गौरतलब है कि राजनीतिक दल न केवल नियमों का उल्लंघन करते रहे हैं, बल्कि उनमें नियम और कानून का जमकर मखौल उड़ाने की प्रवृत्ति घर कर चुकी है। अगर, पिछले वर्षों के कुछ आंकड़ों पर नजर डाली जाए, तो यह साफ हो जाता है कि चुनावों में धन का अपार प्रभुत्व कायम रहता है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में केवल भारतीय जनता पार्टी ने एक हजार दो सौ चौंसठ करोड़ रुपए खर्च किए थे और तीन सौ तीन सीटों पर जीत हासिल की, यानी एक सीट पर 4.17 करोड़ रुपए औसत खर्च बैठा। इसी प्रकार कांग्रेस पार्टी ने कुल आठ सौ बीस करोड़ रुपए खर्च किए और बावन सीटों पर जीत हासिल की, यानी इसने एक सीट जीतने के लिए पंद्रह करोड़ से ज्यादा रुपए खर्च किए। ऐसे में यहां स्वयं ही विचारणीय है कि चुनाव आयोग ने खर्च की सीमा सत्तर लाख निर्धारित की है, तो फिर राजनीतिक दल इतना ज्यादा पैसा खर्च कैसे कर रहे हैं।

गौरतलब बात यह है कि चुनाव आयोग ने धन की यह सीमा अपने फंड से खर्च करने की बात कही है, राजनीतिक पार्टी कोष से नहीं। राजनीतिक पार्टियों को अलग से अपना चुनावी बांड आदि से खर्च करने की छूट है, इसलिए इनके चुनावी खर्च के आंकड़े गणना से परे जा पहुंचते हैं। अत: आवश्यकता है कि पार्टियों के खर्च की निर्धारित सीमा तय किया जाए। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी व्यक्ति सूचना के अधिकार (आरटीआइ) कानून के तहत यह पूछने का हकदार भी नही है कि किस-किस दल ने कितना खर्च किया, क्योंकि यह आरटीआइ के दायरे से परे है। इस प्रकार राजनीतिक अनैतिकता को और छूट मिल जाती है।

चुनाव सुधारों की प्रक्रिया का मुख्य केंद्र लोकतंत्र के मूल अर्थ को व्यापक बनाना और इसे नागरिकों के अधिक अनुकूल बनाना है। यह भी सही है कि चुनाव भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत बन चुका है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद करोड़ों की नकदी जब्त होना एक परंपरा-सी बन गई है। उम्मीदवार महंगाई को देखते हुए खर्च की सीमा बढ़ाने की मांग करते हैं। अगर कालेधन के इस्तेमाल को रोकना है तो निर्वाचन आयोग को इस बारे में तर्कसंगत तरीके से सोचना होगा, क्योंकि लोकतंत्र अब धीरे-धीरे अमीरो का तंत्र बनता जा रहा है, इसमें गरीब अथवा ज्यादा धन खर्च न कर पाने वाले उम्मीदवार इन धन कुबेरों के आगे बौने पड़ गए हैं।

राजनीति का अपराधीकरण गंभीर चिंता का विषय है। अगर चौदहवीं लोकसभा के आंकड़ों पर गौर करें तो चौबीस फीसद सदस्य आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे थे। पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा तीस फीसद और सौलहवीं में चौंतीस फीसद तक पहुंच गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि जब लोकतंत्र में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का प्रवेश होगा तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रह पाएगा। सुप्रीम कोर्ट तक राजनीति के अपराधीकरण पर कई बार चिंता व्यक्त कर चुका है और इस बारे में संसद को कानून बनाने को कह चुका है। लेकिन यह ऐसा मुद्दा है जिस पर सारे राजनीतिक दलों ने चुप्पी साध रखी है।
आज यह वक्त की जरूरत है कि भारतीय राजनीति में धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में मजबूत कदम उठाए जाए, ताकि लोकतंत्र को सही अर्थों में ‘लोगों का तंत्र’ बनाया जा सके। चुनाव सुधार के बारे में कुछ ठोस कदम उठाने की दरकार है, क्योंकि साफ-सुथरे चुनावों और राजनीतिक पारदर्शिता से ही लोकतंत्र को वैधता मिलती है।

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