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राजनीति मंदी की आहट और उपाय

पिछले एक वर्ष के दौरान वैश्विक आर्थिक रफ्तार मंद पड़ने के कारण भारत में भी आर्थिक मंदी का जो असर शुरू हुआ, वह अब ज्यादातर क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले चुका है। इसका देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। आठ अगस्त को भारतीय रिजर्व बैंक ने वैश्विक सुस्ती के मद्देनजर वर्ष 2019-20 के लिए विकास दर का अनुमान घटा कर 6.9 फीसद कर दिया है। अन्य रेटिंग एजेंसियों ने भी विकास दर घटने की रिपोर्टें दी हैं।

Author Updated: August 21, 2019 2:57 AM
निश्चित रूप से वर्ष 2018 की विश्व बैंक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था का पिछड़ना चिंताजनक है। पिछले साल देश के आर्थिक परिदृश्य पर तेजी से बढ़ती हुई चार अहम आर्थिक चुनौतियां संपूर्ण अर्थव्यवस्था को चिंतित करती दिखाई दीं। एक, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने आर्थिक संकट को बढ़ाया। दूसरा, डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत में करीब बीस फीसद की वृद्धि हुई।

पिछले महीने विश्व बैंक ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के आकार के आधार पर जो रिपोर्ट जारी है, उसके अनुसार ब्रिटेन और फ्रांस ने पिछले साल भारत को पीछे कर दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत 2017 में दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश था। अब भारत सातवें स्थान पर आ गया है। अर्थव्यवस्था के आकार के आधार पर अमेरिका सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। दूसरे स्थान पर चीन, तीसरे पर जापान, चौथे पर जर्मनी, पांचवें पर ब्रिटेन और छठे स्थान पर फ्रांस है। वर्ष 2017 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.65 लाख करोड़ डॉलर था, जबकि ब्रिटेन 2.64 लाख करोड़ डॉलर और फ्रांस 2.59 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले देश थे। साल 2018 में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आकार 2.82 लाख करोड़ डॉलर और फ्रांस की अर्थव्यवस्था का आकार 2.78 लाख करोड़ डॉलर हो गया है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.73 लाख करोड़ डॉलर रहा। स्थिति यह रही कि 2018 में भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना में ब्रिटेन और फ्रांस की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ी।

निश्चित रूप से वर्ष 2018 की विश्व बैंक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था का पिछड़ना चिंताजनक है। पिछले साल देश के आर्थिक परिदृश्य पर तेजी से बढ़ती हुई चार अहम आर्थिक चुनौतियां संपूर्ण अर्थव्यवस्था को चिंतित करती दिखाई दीं। एक, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने आर्थिक संकट को बढ़ाया। दूसरा, डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत में करीब बीस फीसद की वृद्धि हुई। रुपए की तुलना में अमेरिकी डॉलर का मूल्य सत्तर रुपए पर पहुंच गया। परिणामस्वरूप रुपए की घटती हुई कीमत और महंगाई बढ़ने से अर्थव्यवस्था की परेशानियां बढ़ीं। तीन, देश का राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ा और चार, आयात बढ़ने और निर्यात पर्याप्त नहीं बढ़ने से विदेशी मुद्रा कोष में कमी आई। यह उल्लेखनीय है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 में निवेश में कमी, विनिर्माण क्षेत्र की धीमी वृद्धि और कृषि क्षेत्र में कमजोरी से पूरे वित्त वर्ष के लिए जीडीपी 6.8 फीसद रह गई। आॅटोमोबाइल क्षेत्र में भी स्थिति निराशाजनक रही। इन्हीं कारणों से अर्थव्यवस्था की गति सुस्त रही।

पिछले एक वर्ष के दौरान वैश्विक आर्थिक रफ्तार मंद पड़ने के कारण भारत में भी आर्थिक मंदी का जो असर शुरू हुआ, वह अब ज्यादातर क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले चुका है। इसका देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। आठ अगस्त को भारतीय रिजर्व बैंक ने वैश्विक सुस्ती के मद्देनजर वर्ष 2019-20 के लिए विकास दर का अनुमान घटा कर 6.9 फीसद कर दिया है। अन्य रेटिंग एजेंसियों ने भी विकास दर घटने की रिपोर्टें दी हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान 7.2 फीसद से घटा कर सात फीसद कर दिया है। विकास दर में कमी के लिए क्रिसिल ने मंदी को प्रमुख कारण बताया है।

गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने के बाद उत्पन्न समस्याओं से भी भारतीय अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ी हैं। बीती 30 जुलाई को भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने संसद में 2017-18 के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि जीएसटी संबंधी खामियों के कारण पहले साल के दौरान जीएसटी कर संग्रह काफी कम रहा। इस रिपोर्ट में कहा गया कि जीएसटी लागू होने के बाद इससे केंद्र के राजस्व (पेट्रोलियम और तंबाकू पर केंद्रीय उत्पाद कर छोड़ कर) में वित्त वर्ष 2016-17 की तुलना में 2017-18 के दौरान दस फीसद गिरावट दर्ज की गई। सीएजी ने रिपोर्ट में राजस्व विभाग, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) और जीएसटी नेटवर्क की असफलताएं रेखांकित कीं। रिपोर्ट में कहा गया कि रिटर्न व्यवस्था और तकनीकी व्यवधान की जटिलता की वजह से बिल मिलान, रिफंड के आॅटोजनरेशन और जीएसटी कर अनुपालन व्यवस्था संबंधी भारी कमियां सामने आई हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था के पिछड़ कर सातवें स्थान पर आने के बाद सरकार के सामने सबसे पहली चुनौती अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की है। आर्थिक वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए सरकार को नई रणनीति बनाना होगी। नई रणनीति के तहत आर्थिक वृद्धि को बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाना होगा, वैश्विक कारोबार में वृद्धि करनी होगी, करों और जीएसटी को सरल तथा प्रभावी बनाना होगा, श्रम सुधारों को लागू किया जाना होगा और ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवक सुनिश्चित करनी होगी।

अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए निर्यात पर खास ध्यान देने की जरूरत है। पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का निर्यात नौ फीसद बढ़ कर तीन सौ इकतीस अरब डॉलर पर पहुंच गया था, यद्यपि निर्यात का यह रिकॉर्ड स्तर है लेकिन निर्यात के तीन सौ पचास अरब डॉलर के लक्ष्य से कम ही है। इसी तरह पिछले वित्त वर्ष में देश का आयात भी करीब नौ फीसद बढ़ कर पांच सौ सात अरब डॉलर मूल्य का रहा। ज्ञातव्य है कि जीएसपी व्यवस्था के तहत अमेरिका विकासशील लाभार्थी देश के उत्पादों को अमेरिका में बिना आयात शुल्क प्रवेश की अनुमति देकर उसके आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत को वर्ष 1976 से जीएसपी व्यवस्था के तहत करीब दो हजार उत्पादों को शुल्क मुक्त रूप से अमेरिका में भेजने की अनुमति मिली हुई थी। अमेरिका से मिली व्यापार छूट के तहत भारत से किए जाने वाले करीब 5.6 अरब डॉलर यानी चालीस हजार करोड़ रुपए के निर्यात पर कोई शुल्क नहीं लगता था।

आंकड़े बता रहे हैं कि जीएसपी के तहत तरजीही के कारण अमेरिका को जितने राजस्व का नुकसान होता है, उसका एक चौथाई भारतीय निर्यातकों को प्राप्त होता था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि वैश्विक मंदी और निर्यात की चुनौतियों के बीच निर्यात मौकों को मुट्ठियों में लेने के लिए हमें रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। देश में निर्यातकों को सस्ती दरों और समय पर कर्ज दिलाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी होगी। पिछले कुछ सालों में निर्यात कर्ज का हिस्सा कम हुआ है। ऐसे में किफायती दरों पर कर्ज दिया जाना जरूरी है। इसके अलावा सरकार को अन्य देशों की गैर शुल्कीय बाधाएं, मुद्रा का उतार-चढ़ाव और सेवा कर जैसे निर्यात को प्रभावित करने वाले मुद्दों से निपटने की रणनीति पर चलना होगा। कर प्रक्रियाओं को सहज बनाना आवश्यक है। निर्यातकों को टैक्स क्रेडिट मुहैया कराने के पहले अत्यधिक जांच-परख से बचाना होगा। इसके अलावा निर्यातकों की जीएसटी रिफंड संबंधी कठिनाइयों को दूर करना होगा और ब्याज सब्सिडी बहाल करनी होगी।

अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए उपभोग और क्रय शक्ति बढ़ाने जैसे कदम उठाने होंगे। बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए आर्थिक और वित्तीय नीतियों में निरंतरता की जरूरत है। ऐसे में कर्ज बाजार के दबाव को दूर करना सरकार और आरबीआइ का एजेंडा होना चाहिए। वैश्विक मंदी के बीच रोजगार बढ़ाना भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। अगर रोजगार के मौके पैदा नहीं होंगे तो अर्थव्यवस्था गति नहीं पकड़ पाएगी। मंदी की वजह से ज्यादातर क्षेत्रों में नौकरियों का संकट खड़ा हो गया है। भारत में यह संकट सबसे ज्यादा ऑटोमोबाइल उद्योग में गहराया हुआ है। ऐसे में उद्योगों को बचाने और उन्हें रफ्तार देने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी। तभी अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट पाएगी।

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