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अक्षय ऊर्जा: विकल्प और चुनौतियां

भारत में अपार मात्रा में जैवीय पदार्थ, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस व लघु पनबिजली उत्पादक स्रोत हैं लेकिन इनसे ऊर्जा उत्पादन करने वाले उपकरणों का निर्माण देश में नहीं के बराबर होता है। अभी तक ऐसे अधिकांश उपकरण आयात किए जाते हैं। विगत तीन वर्षों में सौर ऊर्जा के लिए ही करीब नब्बे फीसद उपकरण आयात किए गए। इससे बिजली उत्पादन की लागत काफी बढ़ जाती है, जिसका सीधा-सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

Author Updated: August 20, 2019 2:22 AM
अक्षय ऊर्जा उत्पादन की देशभर में कई छोटी-छोटी इकाइयां हैं जिन्हें एक ग्रिड में लाना बेहद चुनौतीभरा काम है। इससे बिजली की गुणवत्ता प्रभावित होती है। भारत में अपार मात्रा में जैवीय पदार्थ, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस व लघु पनबिजली उत्पादक स्रोत हैं लेकिन इनसे ऊर्जा उत्पादन करने वाले उपकरणों का निर्माण देश में नहीं के बराबर होता है।

योगेश कुमार  गोयल

ऊर्जा आज पूरी दुनिया में आधुनिक जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। ऊर्जा के बिना आधुनिक सभ्यता की कल्पना ही नहीं की जा सकती, क्योंकि इसी से विकास के नए-नए रास्ते निकलते हैं। हमारा समस्त जीवन अब इसी ऊर्जा पर निर्भर है। पृथ्वी पर ऊर्जा के परंपरागत साधन बहुत ही सीमित रह गए हैं। ऐसे में यह खतरा मंडरा रहा है कि अगर ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों का इसी प्रकार दोहन किया जाता रहा तो इन परंपरागत स्रोतों के समाप्त होने पर गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाएगी और ऊर्जा के बिना आधुनिक सभ्यता के अस्तित्व पर ही बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग जाएगा। आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ती दुनिया के लिए ऊर्जा के इन स्रोतों और संसाधनों का उपयोग करना जरूरी भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आने वाले समय में परंपरागत ऊर्जा के स्रोत समाप्त हो गए तो हम क्या करेंगे? आने वाले वक्त की इसी समस्या के मद्देनजर अब ऊर्जा के ऐसे गैर परंपरागत स्रोतों की खोज करना बेहद जरूरी हो गया है जिनकाक्षय भी न हो और वे प्रदूषणकारक भी न हों।

ऊर्जा का पर्यावरण से सीधा संबंध है। कोयला, गैस, पेट्रोलियम इत्यादि ऊर्जा के परंपरागत साधन सीमित मात्रा में होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी बहुत हानिकारक साबित हो रहे हैं। अक्षय ऊर्जा, जिसे ‘नवीकरणीय ऊर्जा’ के नाम से भी जाना जाता है, वास्तव में ऐसी ऊर्जा है जिसके स्रोत सूर्य, जल, पवन, ज्वार-भाटा, भू-ताप आदि हैं और ये स्रोत प्रदूषणकारक नहीं होते। इनका कभी क्षय भी नहीं होता। प्रकृति प्रदत्त सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल-विद्युत ऊर्जा, ज्वार-भाटे से प्राप्त ऊर्जा, बायोमास, जैव र्इंधन इत्यादि अक्षय ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।

हमारे पास अक्षय ऊर्जा के इन विविध स्रोतों का अपार भंडार है और किसी भी राष्ट्र को विकसित बनाने के लिए इन प्रदूषणरहित स्रोतों का समुचित उपयोग किए जाने की आवश्यकता भी है। यही कारण है कि भारत सरकार ने वर्ष 2004 में अक्षय ऊर्जा के विकास को लेकर जागरूकता अभियान चलाने के उद्देश्य से अक्षय ऊर्जा दिवस की शुरुआत की थी। आज देश में ऊर्जा की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय पावर पोर्टल के अनुसार वर्तमान में देश में साढ़े तीन लाख मेगावाट से भी अधिक बिजली का उत्पादन किया जा रहा है लेकिन यह भी हमारी कुल मांग से करीब ढाई फीसद कम है। अक्षय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देने से हमारी ऊर्जा की मांग एवं आपूर्ति के बीच का अंतर भी खत्म हो जाएगा और इससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक जीवन स्तर में भी सुधार होगा।

अक्षय ऊर्जा उत्पादन की देशभर में कई छोटी-छोटी इकाइयां हैं जिन्हें एक ग्रिड में लाना बेहद चुनौतीभरा काम है। इससे बिजली की गुणवत्ता प्रभावित होती है। भारत में अपार मात्रा में जैवीय पदार्थ, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस व लघु पनबिजली उत्पादक स्रोत हैं लेकिन इनसे ऊर्जा उत्पादन करने वाले उपकरणों का निर्माण देश में नहीं के बराबर होता है। अभी तक ऐसे अधिकांश उपकरण आयात किए जाते हैं। विगत तीन वर्षों में सौर ऊर्जा के लिए ही करीब नब्बे फीसद उपकरण आयात किए गए। इससे बिजली उत्पादन की लागत काफी बढ़ जाती है, जिसका सीधा-सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए बेहद जरूरी है कि देश के भीतर ही इन उपकरणों के निर्माण के लिए अपेक्षित कदम उठाए जाएं।

भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित बीसवीं ऊर्जा सांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 से 2016-17 के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत 3.54 फीसद बढ़ गई है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो वर्ष 2005-06 से 2018-19 के दौरान प्रति व्यक्ति बिजली उपभोग में करीब दो गुना वृद्धि दर्ज की गई है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की अप्रैल 2019 की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1181 किलोवाट बिजली का उपभोग किया जाता है। इसका एक अहम कारण देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या भी है। विशेषकर बिजली और ईंधन के रूप में उपभोग की जा रही ऊर्जा की मांग घरेलू व कृषि क्षेत्र के अलावा औद्योगिक क्षेत्रों में भी लगातार बढ़ रही है।

औद्योगिक क्षेत्रों में ही बिजली और पेट्रोलियम जैसे ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण स्रोतों का करीब 58 फीसद उपभोग किया जाता है। इसके अलावा कृषि क्षेत्र और घरेलू कार्यों में भी ऊर्जा की मांग और खपत पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। हम जिस बिजली से अपने घरों, दुकानों या दफ्तरों को रोशन करते हैं, जिस बिजली या पेट्रोलियम इत्यादि ऊर्जा के अन्य स्रोतों का इस्तेमाल कर खेती-बाड़ी या उद्योग-धंधों के जरिए देश को विकास के पथ पर अग्रसर किया जाता है, क्या हमने कभी सोचा है कि वह बिजली या ऊर्जा के अन्य स्रोत हमें कितनी बड़ी कीमत पर हासिल होते हैं? यह कीमत न सिर्फ आर्थिक बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी धरती पर विद्यमान हर प्राणी पर बहुत भारी पड़ती है।

भारत में थर्मल पावर स्टेशनों में बिजली पैदा करने के लिए कोयला, सौर ताप, नाभिकीय ताप, कचरे और बायो र्इंधन का उपयोग किया जाता है। लेकिन अधिकांश बिजली कोयले के इस्तेमाल से ही पैदा होती है। ताप बिजली घरों में भाप पैदा करने के लिए कोयला जलाने से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है क्योंकि इस प्रक्रिया में निकलने वाली हानिकारक गैसें हवा में मिल कर पर्यावरण को बुरी तरह प्रदूषित करती हैं, साथ ही कोयला या अपशिष्ट जलाने के बाद बचने वाले अवशेषों के निबटारे की भी बड़ी चुनौती बनी रहती है। सार्वजनिक क्षेत्र के सवा सौ से भी अधिक थर्मल पावर स्टेशनों में प्रतिदिन करीब 18.17 लाख टन कोयले की खपत होती है।

अमेरिका के वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के एक शोध के अनुसार वर्ष 2005 से 2013 के बीच भारत में 25.54 अरब टन कार्बन डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन हुआ और उस दौरान उसमें प्रतिवर्ष साढ़े पांच फीसद की वृद्धि भी होती रही। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2005 से 2013 के बीच कुल कार्बन उत्सर्जन में 68 फीसद की प्रमुख वजह ऊर्जा क्षेत्र ही रहा। यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि ऊर्जा क्षेत्र में सतहत्तर फीसद कार्बन उत्सर्जन बिजली उत्पादन से ही होता है। इन्हीं पर्यावरणीय खतरों को देखते हुए बिजली पैदा करने के लिए दुनियाभर में अब सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा के अन्य स्रोतों को विशेष महत्त्व दिया जाने लगा है।

आईसलैंड आज दुनिया का एकमात्र ऐसा देश बन चुका है जहां अक्षय ऊर्जा से ही सौ फीसद बिजली पैदा की जा रही है। इसके अलावा स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, कोस्टारिका, निकरागुआ, उरुग्वे इत्यादि देश भी आगामी दो वर्षों के भीतर अक्षय ऊर्जा से ही सौ फीसद बिजली उत्पादन के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं। यूरोपीय संघ और अमेरिका भी कोयले से बिजली बनाने वाले अधिकांश बिजली संयंत्रों को बंद करने का फैसला कर चुके हैं। ब्रिटेन में कोयले से चलने वाले जो गिने-चुने बिजलीघर बचे हैं और उन्हें भी 2025 तक बंद कर दिए जाने की उम्मीद है।

भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां अक्षय ऊर्जा के विकास के लिए अलग मंत्रालय गठित है और ‘राष्ट्रीय पवन-सौर स्वच्छता नीति-2018’ के अनुसार पवन-सौर ऊर्जा उत्पादन के वर्तमान लक्ष्य अस्सी गीगावाट को वर्ष 2022 तक दोगुने से भी ज्यादा यानी दो सौ पच्चीस गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य है। आज समय है आर्थिक बदहाली औैर भारी पर्यावरणीय विनाश की कीमत पर ताप, जल व परमाणु ऊर्जा जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के बजाय अपेक्षया बेहद सस्ते और कार्बन रहित पर्यावरण हितैषी ऊर्जा स्रोतों के व्यापक स्तर पर विकास के लिए तेजी से काम हो लेकिन साथ ही हमें ऊर्जा की बचत की आदतें भी अपनानी होंगी।

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