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राजनीतिः बाढ़ में तैरते सवाल

बांधों के टूटने और उनमें आई दरारों के कारण हर साल बाढ़ का जो विकराल रूप सामने आता है, उसके मद्देनजर यह सवाल बहुत अहम है कि बाढ़ को प्राकृतिक आपदा का नाम देकर पल्ला झाड़ने के बजाय ऐसे बांधों की मानसून से पहले ही ईमानदारी से जांच करा कर उनकी मजबूती और मरम्मत के लिए समुचित कदम क्यों नहीं उठाए जाते? प्रशासन क्यों मानसून से पहले ही भारी वर्षा से उत्पन्न होने वाले संकटों से निपटने के लिए मुस्तैद नहीं होता?

Author नई दिल्ली | Published on: August 9, 2019 2:53 AM
political opinion, politics, political opinion flood, bihar flood, flood across countryसांकेतिक तस्वीर।

योगेश कुमार गोयल

कुछ दिनों पहले तक देश के जिन राज्यों में सूखे और जल संकट को लेकर हाहाकार मचा था, आज वही राज्य बाढ़ से निपटने के स्थायी प्रबंध न होने के कारण बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों सहित बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के कई इलाके बाढ़ के पानी से लबालब हैं। कहीं बांध या तटबंध टूट कर बाढ़ से होती तबाही को विकराल रूप दे रहे हैं तो कहीं नदियां पहले ही रेत या गाद से भरी होने के कारण वर्षा का जल उनमें समाने की जगह न बचने से बाढ़ की स्थिति बनी है।

माना कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता, किंतु उच्च स्तर की तकनीक और बेहतर प्रयासों से उसके प्रभावों को न्यूनतम अवश्य किया जा सकता है। इस साल कई महीने पहले ही सामान्य मानसून के साथ ही बाढ़ की आशंका भी व्यक्त की गई थी। लेकिन बाढ़ की आशंका वाले राज्यों में वहां की सरकारों ने इस आपदा से निपटने के लिए ऐसी तैयारियां नहीं कीं जिनसे लोगों को उफनती नदियों के प्रकोप से काफी हद तक बचाया जा सकता था।

चिंता की बात है कि विश्वभर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में ही होता है और बाढ़ की वजह से हर साल देश को हजारों करोड़ का नुकसान होता है। बाढ़ जैसी आपदाओं के चलते जान-माल के नुकसान के साथ-साथ लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों के बर्बाद होने से देश की अर्थव्यवस्था पर इतना बुरा प्रभाव पड़ता है कि उस राज्य का विकास सालों पीछे चला जाता है।

पंजाब में पिछले दिनों घग्गर नदी पर बना बांध टूट जाने से करीब दो हजार एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई। बिहार के दरभंगा और मधुबनी में भी कमला बलान बांध कई जगहों से टूट गया और बड़े हिस्से को अपनी जद में ले लिया। सरकारी तंत्र द्वारा हर साल बाढ़ जैसे हालात पैदा होने के बाद बांधों या तटबंधों की कामचलाऊ मरम्मत कर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है और अगले साल फिर बाढ़ का तांडव सामने आने पर उसे प्राकृतिक आपदा की संज्ञा देने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बार भी बिहार में आई बाढ़ को प्राकृतिक आपदा बता कर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन वे यह भूल गए कि बिहार की उफनती नदियों के कहर से बचने के लिए उत्तरी बिहार में लोगों ने वर्षों पहले श्रमदान करके कई मजबूत तटबंध बनाए थे, जो अनेक वर्षों तक कारगर भी साबित हुए। इनमें से कई तटबंध अब इतने कमजोर हो चुके हैं कि थोड़ी-सी बारिश में ही उनमें जगह-जगह दरारें आ जाती हैं और हर समय उनके टूटने और भारी तबाही का बड़ा खतरा मंडराता रहता है। तटबंधों में इन्हीं बड़ी-बड़ी दरारों के कारण इस साल बाढ़ की चपेट में आए दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण, सुपौल, शिवहर आदि जिलों में तबाही मची।

बांधों के टूटने और उनमें आई दरारों के कारण हर साल बाढ़ का जो विकराल रूप सामने आता है, उसके मद्देनजर यह सवाल बहुत अहम है कि बाढ़ को प्राकृतिक आपदा का नाम देकर पल्ला झाड़ने के बजाय ऐसे बांधों की मानसून से पहले ही ईमानदारी से जांच करा कर उनकी मजबूती और मरम्मत के लिए समुचित कदम क्यों नहीं उठाए जाते? प्रशासन क्यों मानसून से पहले ही भारी वर्षा से उत्पन्न होने वाले संकटों से निपटने के लिए मुस्तैद नहीं होता? क्यों हमारी संपूर्ण व्यवस्था हर साल मानसून के दौरान आपदाओं और चुनौतियों के समक्ष बौनी और असहाय नजर आती है?

हालात इतने खराब हो चुके हैं कि जब भी औसत से ज्यादा बारिश हो जाती है तो बाढ़ आ जाती है। दरअसल हम अभी तक वर्षा जल संचयन के लिए कोई कारगर योजना नहीं बना सके हैं। हम समझना ही नहीं चाहते कि सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं पूरी तरह एक-दूसरे से ही जुड़ी हैं और इनका स्थायी समाधान जल प्रबंधन की कारगर योजनाएं बना कर और उन पर ईमानदारीपूर्वक काम करके ही संभव है।

जहां तक असम में बाढ़ से हो रही तबाही की बात है तो 1986 के बाद वहां पहली बार बाढ़ के इतने भयावह हालात बने हैं जब राज्य के सभी जिलों में जल प्रलय जैसी स्थिति पैदा हुई है, जिससे साढ़े चार हजार से भी अधिक गांवों के करीब साठ लाख लोग प्रभावित हुए हैं। गैंडों के लिए विख्यात काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का नब्बे फीसद हिस्सा पानी में डूबा है। असम हर साल इस मौसम में ब्रह्मपुत्र सहित सभी प्रमुख नदियों के उफान से इसी तरह बाढ़ से जूझता रहा है। हर साल आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए राज्य सरकार ने 1980 में ब्रह्मपुत्र बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन भी किया गया था। लेकिन करीब चार दशक बीत जाने के बाद भी इस बोर्ड की क्या उपलब्धियां हैं, यह बाढ़ से इस साल पैदा हुए भयावह हालात बयां कर रहे हैं।

बिहार हो या असम अथवा देश के अन्य राज्य, हर साल जब भी किसी राज्य में बाढ़ जैसी आपदा एक साथ करोड़ों लोगों के जनजीवन को प्रभावित करती है तो केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, मुख्यमंत्री बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के हवाई दौरे करते हैं और सरकारों द्वरा बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत राशि देने की घोषणाएं की जाती हैं। लेकिन जैसे ही बाढ़ का पानी उतरता है, सरकारी तंत्र बाढ़ के कहर को बड़ी आसानी से भुला देता है। देखा जाए तो करोड़ों लोगों की जीवनरेखा को प्रभावित करती बाढ़ जैसी आपदा सरकारी तंत्र के लिए ‘सरकारी खजाने की लूट के उत्सव’ जैसी बन कर रह गई हैं।

देश में आजादी के कुछ वर्षों बाद राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की स्थापना की गई थी। इसके जरिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों के सहयोग से राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत देशभर में बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करने के लिए तटबंध, लंबी नालियां और गांवों को ऊंचा करने जैसे काम करती है। पिछले पचास सालों में बाढ़ पर ही सरकारों ने एक सौ सत्तर हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा धनराशि खर्च कर डाली। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी अगर हालात सुधरने के बजाय साल दर साल बदतर होते जा रहे हैं तो समझा जा सकता है कि कमी आखिर कहां है! सीधा-सा अर्थ है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम को संचालित करने वाले लोग अपना काम जिम्मेदारी, ईमानदारी और मुस्तैदी के साथ नहीं कर रहे थे।

आज देश के पर्वतीय क्षेत्र भी प्रकृति का प्रकोप झेलने को अभिशप्त हैं। लेकिन हम तमाम कारण जानते हुए भी जान-बूझकर अनजान बने रहते हैं और जब एकाएक तबाही का कोई मंजर सामने आता है तो हाय-तौबा मचाने लगते हैं। प्रकृति ने तो पहाड़ों की संरचना ऐसी बनाई है कि तीखे ढलानों के कारण वर्षा का पानी आसानी से निकल जाता था।

किंतु पहाड़ों पर भी अनियोजित विकास, नदियों के करीब पहाड़ों पर होती खुदाई और बढ़ते अतिक्रमण के कारण बड़े पैमाने हो रहे वनों के विनाश ने पहाड़ी क्षेत्रों में भी प्रकृति को कुपित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बहरहाल, यदि हम चाहते हैं कि देश में हर साल ऐसी आपदाएं भारी तबाही न मचाएं तो हमें कुपित प्रकृति को शांत करने के सकारात्मक उपाय करने होंगे और इसके लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों जंगल, पहाड़, वृक्ष, नदी, झीलों इत्यादि की महत्ता समझनी होगी।

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