ताज़ा खबर
 

राजनीतिः गरिमा बढ़ी और विश्वास भी

अब हर पार्टी के सांसदों-नेताओं को दोनों सदनों में सावधान रहना पड़ेगा। सत्तर साल देश की जनतांत्रिक राजनीति में युगांतकारी परिवर्तन हुए हैं। उसका ताजा उदाहरण 2019 का आम चुनाव रहा है। इस लोकसभा चुनाव में जनता स्वयं आगे आकर चुनाव लड़ी। जनता समझती है कि देश कहां सुरक्षित है, किसके हाथ में सुरक्षित है, किसे चुनना चाहिए।

Author Published on: August 10, 2019 2:23 AM
भारतीय संसद भवन, फोटो सोर्स: द इंडियन एक्सप्रेस

 प्रभात झा

पिछले दो दशकों से संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानसभाओं के सत्रों की अवधि चर्चा का विषय बनी रही है। एक चलन-सा बन गया था कि सत्र ही कम दिनों का बुलाया जाए जिससे हो-हल्ला न हो और हो भी तो कम समय में विधायिका या संसदीय कार्य तत्काल पूरा कर लिया जाए। आम नागरिकों में भी इस बात की चर्चा चल पड़ी थी कि लोकतंत्र के इन मंदिरों में लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा, जब यहां पक्ष-विपक्ष दोनों के बीच देश और राज्यों के प्रमुख विषयों पर खुले मन से राष्ट्र या राज्य हित में चर्चा हो।  पिछले यानी सत्रहवीं लोकसभा के गठन के बाद लोकसभा और राज्यसभा में जो कार्य हुए, वे देश के नागरिकों में विश्वास ही नहीं बल्कि लोकतंत्र की भावना को मजबूत करते हैं। वर्षों से लंबित बिलों का पारित होना यह दर्शाता है कि देश का मन-मस्तिष्क बदल रहा है। लोगों ने अब अपने अलावा देश के बारे में भी सोचना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि सत्रहवीं लोकसभा और राज्यसभा के सैंतीस दिनों की कुल बैठकों में बत्तीस विधेयक लोकसभा और सैंतीस बिल राज्यसभा में पारित हुए। 17 जून 2019 से 6 अगस्त 2019 तक चली लोकसभा में शून्यकाल के दौरान पहली बार एक हजार से अधिक मुद्दे उठाए गए। सन 1952 के बाद यह पहला मौका है जब सैंतीस बैठकों के बावजूद एक दिन भी कार्यवाही बाधित नहीं रही। और 1952 के बाद भी पहली बार ऐसा हुआ है जब सदन का व्यवधान शून्य रहा और इसमें सदन के सदस्यों की अहम भूमिका रही। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर तेरह घंटे से अधिक चर्चा हुई और एक सौ तिरासी तारांकित प्रश्न पूछे गए। सबसे अच्छी बात तो यह रही कि ज्यादा से ज्यादा नए सदस्यों को बोलने का मौका दिया गया। इस सत्र में शून्यकाल में दो सौ पैंसठ नए सदस्यों में से दो सौ उनतीस सदस्यों को अपनी बात कहने का मौका मिला। छियालीस नई महिला सांसदों में बयालीस को शून्यकाल के दौरान बोलने का अवसर मिला। लोकसभा में लगभग एक सौ सैंतीस प्रतिशत काम हुआ, जबकि राज्यसभा में एक सौ तीन प्रतिशत। राज्यसभा की सत्ताईस बैठकों में बत्तीस विधेयक पारित हुए। पिछले सत्रह साल में उच्च सदन में यह सबसे सफल सत्र रहा।

देश आश्चर्यचकित था जब राज्यसभा में तीन-तलाक बिल पारित हुआ। लोगों को भरोसा नहीं हो रहा था। लोकसभा में तो भाजपा और एनडीए की संख्या दो-तिहाई से अधिक है। वहां पर विधेयकों का पास होना लगभग तय ही होता है। पर राज्यसभा जहां भाजपा या एनडीए के पास अभी बहुमत नहीं है, से भी तीन तलाक बिल के पास हो जाने से सभी हैरत में रह गए। कांग्रेसी सदस्य मान कर चल रहे थे कि लोक सभा में इनकी संख्या बल है पर राज्यसभा में तो विधेयक पास नहीं होने देंगे। लेकिन प्रधामंत्री और गृहमंत्री की कुशल रणनीति से जब राज्यसभा में भी विपक्ष चौरासी और सत्ता पक्ष सौ मतों से तीन तलाक विधेयक को मंजूरी मिल गई तो सभी को लगा कि अब राज्यसभा में कांग्रेस और विपक्ष में कोई एकता नहीं है। तीन तलाक पर अच्छी बहस हुई। चर्चा के दौरान कुछ दलों ने बहिष्कार किया पर अधिकतर दलों ने मतदान किया।

राज्यसभा में कांग्रेस सहित विपक्ष की पोल तब खुली जब सूचना के अधिकार का बिल आया। इस बिल पर कांग्रेस ने विरोध जताया। उनका साथ कुछ विपक्षी दलों ने भी दिया। पर जब मत विभाजन हुआ तो राजग को एक सौ सत्रह और कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों को पचहत्तर मत मिले। इसके बाद राज्यसभा में भाजपा के हौसले बुलंद हो गए। भाजपा को यह विश्वास हो गया कि यदि अब कोई भी कठिन से कठिन विधेयक यदि देश हित में लाया जाएगा तो भाजपा मत विभाजन में जीत सकती है। यही कारण था कि जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक लाया गया। संकल्प सबसे पहले राज्यसभा में लाने का निर्णय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने लिया। देश में किसी ने नहीं सोचा था कि धारा 370 और 35ए को समाप्त करने वाला विधेयक लाया जाएगा। राज्यसभा में पांच अगस्त को जैसे ही गृहमंत्री ने जम्मू कश्मीर में दस फीसद आरक्षण और जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक प्रस्तुत किया, सता पक्ष की बांछे खिल गई और विपक्ष में सन्नाटा छा गया था। सदन हतप्रभ था। कांग्रेसी और टीएमसी सहित डीएमके और सपा ने विरोध के स्वर उठाए। राज्यसभा में सभी सदस्यों के द्वारा उठाए गए एक-एक सवाल का जवाब गृहमंत्री ने दिया। इसी बीच प्रधानमंत्री भी सदन में आ गए। विपक्षियों ने मत विभाजन मांगा। मत विभाजन में कांग्रेस सहित विपक्षियों को मात्र इकसठ और भाजपा को एक सौ पच्चीस मत मिले।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार से संबंधित चार विधेयक-राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक-2019, होम्योपैथी केंद्रीय परिषद (संशोधन) विधेयक-2019, भारतीय चिकित्सा परिषद (संशोधन) विधेयक-2019 और दंत चिकित्सक (संशोधन) विधेयक-2019 दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिए गए। विशेष रूप से राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक, 2019 चिकित्सा क्षेत्र में एक क्रांतिकारी सुधार है जो चिकित्सा शिक्षा, चिकित्सा व्यवसाय और चिकित्सा संस्थानों से संबंधित सभी पहलुओं के विकास और विनियमन के लिए एक राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के गठन तथा आयोग को सलाह देने और सिफारिश करने के लिए एक चिकित्सा सलाहकार परिषद के गठन का प्रावधान करता है।

देश में सामाजिक और लैंगिक न्याय प्रणाली को और मजबूती प्रदान करने के लिए भी कुछ विधेयकों को इस सत्र में पारित किया गया। यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (संशोधन) विधेयक-2019 पोर्नोग्राफी में बच्चे के चित्रण को अपराध घोषित करने के अलावा बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों के लिए ज्यादा कठोर सजा का प्रावधान करता है जो बीस साल तक या कुछ मामलों में शेष जीवन के लिए कारावास तक बढ़ाई जा सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने और राष्ट्रीय सुरक्षा पहलुओं और मानवाधिकारों के बीच संतुलन कायम करने के लिए इस सत्र के दौरान राष्ट्रीय जांच एजेंसी (संशोधन) विधेयक-2019, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) संशोधन विधेयक-2019 और मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक-2019 पारित किए गए। इसके साथ ही वेतन अधिनियम 1936, न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 और सामान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 को आपस में मिला कर वेतन संहिता विधेयक, 2019 को कानून का रूप दिया गया है। उपभोक्ता संरक्षण विधेयक-2019 पहले के कानून को रद्द करके और उपभोक्ता अधिकारों के प्रोत्साहन, संरक्षण और उन्हें लागू करने के लिए केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान करके उपभोक्ता संरक्षण तंत्र में आमूल-चूल परिवर्तन लाने का प्रावधान करता है। मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक-2019 का उद्देश्य सड़क सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को सुलझाना, नागरिकों को सहूलियत देना, सार्वजनिक परिवहन, स्वचालन एवं कंप्यूटरीकरण को सुदृढ़ करना, अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन पर जुर्माना राशि बढ़ाना है।
पिछले पांच-छह वर्षों के दौरान राज्यसभा और लोकसभा चैनल को लेकर जनता की रुचि बढ़ी है।

इन दोनों चैनलों के माध्यम से देश के नेताओं, सांसदों का आकलन शुरू हुआ है। इसीलिए अब हर पार्टी के सांसदों-नेताओं को दोनों सदनों में सावधान रहना पड़ेगा। सत्तर साल देश की जनतांत्रिक राजनीति में युगांतकारी परिवर्तन हुए हैं। उसका ताजा उदाहरण 2019 का आम चुनाव रहा है। इस लोकसभा चुनाव में जनता स्वयं आगे आकर चुनाव लड़ी। जनता समझती है कि देश कहां सुरक्षित है, किसके हाथ में सुरक्षित है, किसे चुनना चाहिए। जनतंत्र की परीक्षा में जनता अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुई। अब देश के जनप्रतिनिधियों को भी अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते रहना चाहिए। अब देश में जहां दोनों सदनों पर पुन: देश का अटूट विश्वास जागेगा, वहीं राज्य विधानसभाओं को कामचलाऊ सत्रों के बजाय उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिक दिनों का सत्र चलाना ही होगा। लोकतंत्र संवाद और बहस से मजबूत होता है न कि इससे भागने से।
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीतिः बाढ़ में तैरते सवाल
2 राजनीतिः शराबबंदी से कतराती सरकारें
3 राजनीतिः इलाज को तरसते गांव