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राजनीतिः पद्मावती का कॉपीराइट

असली मुद्दा ‘पद्मावती’ के ‘कापीराइट’ और उसकी वसूली जाने वाली ‘रायल्टी’ का है, न कि सिर्फ ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का! कापीराइट और रायल्टी का मुद्दा सिर्फ पैसे का मुद्दा नहीं है बल्कि ‘अपनी पद्मावती’ बरक्स ‘उनकी पद्मावती’ की ‘सामुदायिक स्मृति’ और ‘निर्मिति’ का मामला है जो सैकड़ों बरसों से ‘मल्टीप्लाई’ होती रही है।

Author November 28, 2017 2:12 AM

पद्मावती को लेकर उठे विवाद ने कुछ बातें साफ कर दी हैं। पहली यह कि पद्मावती के कई पाठ संभव हैं जो एक दूसरे से टकराते हैं। दूसरी यह कि आॅनलाइन रिलीज के जमाने में भंसाली की ‘पद्मावती’ रिलीज होगी कि नहीं, यह सवाल बेमानी है। तीसरी बात यह कि आजकल ‘कलात्मक सांस्कृतिक उद्यम’ भी अब राजनीतिक गणित का विषय बनने लगे हैं! चौथी बात यह कि यों तो विरोध प्रायोजित करके भी बॉलीवुड अपनी फिल्मों का प्रोमो करने के लिए कुख्यात है लेकिन समकालीन विरोध एक ‘नई सांस्कृतिक राजनीति’ की अपरिमित संभावनाओं को खोलने वाला बन गया है! पांचवीं बात यह कि कॉरपोरेट कला के रूप में बनाई गई फिल्म पद्मावती का उग्र विरोध अपने डरावने और धमकी-भरे आयामों के साथ स्मृतियों में रह जाना है और यह भी इतिहास में दर्ज हो जाना है कि अब सिर्फ ‘लिंच मॉब्स’ अकेली नहीं होती, उनके पीछे दल भी खडे़ होते हैं जो जन-रुचियों और जन-आस्वादों को परिभाषित करते हैं, जबकि संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की बात सिर्फ ‘लिखी’ रह जाती है।

पद्मावती को लेकर हो रहे विवाद और हत्यारी धमकियों-भरे विरोध ने समकालीन सांस्कृतिक विमर्शों के कई नए पहलू भी खोल दिए हैं जिनको ‘कलाभिव्यक्ति की आजादी की मांग’ और ‘फासिस्ट समूहों के उत्पात’ के आसान ‘विलोमों’ (बाइनरीज) के जरिए नहीं समझा जा सकता, क्योंकि बड़ी पूंजी संचालित ‘पापूलर सांस्कृतिक निर्मिति’ (जैसे कि यह फिल्म) का कोई ‘एक आयाम’ और ‘एक मानी’ नहीं होता।

मौजूदा विवाद ने जिस तत्त्व को प्रकट किया है वह है एक सामुदायिक विरोध यानी सामुदायिक आलोचना जिसे भद्र पदावली में ‘कम्यूनिटी क्रिटीक’ या ‘पब्लिक क्रिटीक’ कहा जा सकता है। पद्मावती अगर सबसे लंबे विमर्श और पब्लिक आलोचना का विषय बनी है तो इसीलिए कि एक तो वह ‘पापूलर कल्चर’ की भंसाली छाप महाकाव्यात्मक निर्मिति है, दूसरी ओर वह ‘बाहुबली’ की भव्यता की टक्कर में कमाई करने वाली फिल्म हो सकती है! पापूलर कल्चर की कोई भी निर्मिति (फिल्म या नाच गाना) किसी न किसी बंद समाज और उसके तत्त्ववाद को तंग करने वाली होती है और इसी मानी में वह ‘पब्लिक क्रिटीसिज्म’ के लिए खुली होती है क्योंकि हर पापूलर रचना अपनी खास ‘उपभोक्ता-जनता’ बनाती है।

फिल्म पद्मावती का सौभाग्य/दुर्भाग्य यह है कि उसे देखा (कंज्यूम) भी नहीं गया है और सिर्फ (कल्पित) आशंकाओं के कारण उसकी एक खास तरह की ‘आलोचनात्मक जनता’ तैयार हो गई है और बिना देखे अपने तरीके से उसका ‘पाठ’ कर रही है यानी अपने खास ‘मानी’ (अर्थ) बना रही है! ये ‘मानी’ एक जातिगत समुदाय बना रहा है जिसके समर्थन में भाजपा की कई राज्य सरकारें और कांग्रेस की एक सरकार खड़ी है और भाजपा-कांग्रेसी नेता भी खडेÞ हैं। इस वजह से ये ‘मानी’ भी खासे ‘मानीखेज’ हो गए हैं! यह ‘समुदाय’ और उनकी ‘उन्मादित भीड़ों’ (मॉब्स) और ‘राज्यसत्ताओं’ का पहला बड़ा और खुला ‘सहकार’ है!

पद्मावती के ‘आपत्तिनक मानी’ जातिगत आग्रहों और विश्वासों से उपजे हैं। अब तक बन चुकी तीन फिल्मों में बनी पद्मावती सबका ‘आइकन’ (आदर्श मूर्ति) थी, अब वह एक खास समुदाय का एक ‘आइकन’ है, एक देवी है और अब एक ‘राष्ट्रमाता’ है और अगर वह ‘इतिहास’ में दर्ज नहीं है तो क्या? यह इतिहास तो अंग्रेजों ने लिखा है या लिबरलों ने लिखा है या कम्यूनिस्टों ने लिखा है जो जातीय इतिहास को नकारते हैं, जो लिखित इतिहास को ही इतिहास मानते हैं, और पुराणों को, जातीय आख्यानों (नेरेटिवों) को शुद्ध ‘कल्पना’ या ‘मिथक’ कह कर नकारते हैं। ये हिंदुत्व के हर आइकन को नीचा दिखाते हैं। पद्मावती आस्था का सवाल है, तर्क का नहीं है।

पद्मावती के दावेदारों ने मीडिया की तमाम बहसों में ऐसे ही तर्क दिए हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन भावनात्मक तर्कों के लिए फिल्म देखना जरूरी नहीं। जब भावना आहत होने की बात हो और आस्थाएं अपना आख्यान रचने को बेचैन हों, तब इतिहास के ‘तथ्य’ या ‘तर्क’ बेमानी हो जाते हैं। पद्मावती की बहसें क्लासीकल इतिहास के बाहर की बहसें हैं। इतिहास में ‘बहुस्वरता’ की बात मानने वाला ‘इतिहासवाद’ (हिस्टरीसिज्म) तो ‘वाचिक इतिहास’ को या ‘साहित्यिक कृति’ को भी इतिहास मानता है लेकिन क्लासीकल इतिहास शास्त्र ‘पद्मावती’ को इतिहास नहीं मानता!

अपने अनपढ़पन और अज्ञान में भी इन उग्र विरोधियों ने क्लासीकल इतिहास शास्त्र की इन सीमाओं को उजागर कर दिया है। इस उन्मद हिंसक विरोध की हिंसा की निंदा की जा सकती है लेकिन इस ‘कामना’ की नहीं कि वे अपने लिए ‘नया इतिहास’ बनाना चाहते हैं। इन दिनों वे यही कर रहे हैं। वे अपना ‘सबाल्टर्न’ इतिहास रच रहे हैं। हम कुछ देर ‘डेविल्स एडवोकेसी’ करें: इन भावनात्मक तर्कों के लिए फिल्म देखना जरूरी नहीं। जब भावना आहत होने की बात हो तब इतिहास के तथ्य या ऐतिहासिक तर्क बेमानी हो जाते हैं। वकील और कलाकार, कानून और आजादी की बात कर सकते हैं लेकिन पद्मावती के आख्यान में अपनी पहचान खोजने और बनाने वाले लोग अपनी आस्था की आजादी की बात का ही दावा कर सकते हैं, अपने इतिहास की बात कर सकते हैं।
जब हल्दीघाटी के अब तक ज्ञात इतिहास को ‘पलटने’ की बातें हो रही हों, जब हर ‘हार’ को ‘जीत’ में बदलने की बातें की जा रही हों और जब इतिहास एक ‘कंस्ट्रक्ट’ ही हो तब दूसरा, तीसरा, चौथा और हजारवां इतिहास क्यों नहीं बन सकता? चूंकि इतिहास, एक नेरेटिव यानी एक आख्यान या कहानी ही है इसलिए वे अपना नेरेटिव अपना आख्यान आप लिखना चाहते हैं और आपसे लिखवाना चाहते हैं! आप अपना लिखें वो अपना लिखें यह बराबर का जनतंत्र है, इसे वे नहीं मानते!

यह नया ‘जन विमर्श’ (पब्लिक डिस्कोर्स) है जिसके पीछे एक समुदाय और उसके द्वारा सक्रिय एक बड़ी जमात और कई दलों और सरकारों की ताकतें खड़ी हैं जो वोट की ताकत तो हैं ही, आवाज की ताकत भी हैं, जिससे मीडिया उनको सादर जगह देता है।  टीवी की बहसों में अपनी राजपूती पगड़ी बांध कर, ‘कल्पित’ पद्मावती के सम्मान को चोट पहुंचने की आशंका से उत्तेजित होकर सामने तलवार रख कर, पद्मावती फिल्म का पक्ष लेने वालों को ‘देख लेने’ और सिर नाक काटने के लिए पांच-दस करोड़ देने की धमकी देना ‘पद्मावती’ की ‘ओनरशिप’ (स्वामित्व) के सवाल को केंद्र में ला देता है!
असली मुद्दा ‘पद्मावती’ के ‘कापीराइट’ और उसकी वसूली जाने वाली ‘रायल्टी’ का है, न कि सिर्फ ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का! कापीराइट और रायल्टी का मुद्दा सिर्फ पैसे का मुद््दा नहीं है बल्कि ‘अपनी पद्मावती’ बरक्स ‘उनकी पद्मावती’ की ‘सामुदाियक स्मृति’ और ‘निर्मिति’ का मामला है जो सैकड़ों बरसों से ‘मल्टीप्लाई’ होती रही है। यह पद्मावती की इस छवि के ऊपर ‘कंट्रोल’ करने का मुद्दा है।

और यह अब ‘टूरिस्ट इंडस्ट्री’ का बनाया एक नेरेटिव भी है। चित्तौड़गढ़ के किले और पद्मावती के आख्यान को वहां के अनेक गाइड किस भाषा में बताते होंगे और अपनी जीविका कमाते होंगे? वे शायद उसी वीरगाथा की भाषा में बताते होंगे जिसमें ‘राजूपती आन बान शान’ और पद्मावती की ‘कुर्बानी’ (जौहर) का बोलबाला रहता होगा। ‘लव जिहाद’ के इन दिनों में, अलाउद्दीन खिलजी का पद्मावती को दर्पण में देखना एक तरह का ‘लव जिहाद’ नहीं तो और क्या है?
‘पद्मावत’ की पद्मावती का कापीराइट सिर्फ महाकवि जायसी का नहीं है बल्कि पद्मावती को देवी मानने वालों और उन तमाम गाइडों का है जिसे वे आए दिन बनाते और बताते आए हैं। यह पद्मावती एक ‘मिथ’है, एक लेजेंड है। इतिहास में इसे इतिहासकार गढ़ते हैं लेकिन वाचिक पंरपरा में पद्मावती को इन सबने मिलकर गढ़ा है। इस मानी में उसके चिह्न, उसके मानी (अर्थ) सतत तरल एवं अस्थिर हैं और इसी मानी में अनंत व्याख्याओं के लिए खुले हुए भी हैं! यह ‘सामुदायिक स्मृति’ है जिसे अनेक इतिहासकार ‘पब्लिक मेमोरी’ या ‘लोक स्मृति’ कहते हैं।

‘लोक स्मृति’ ‘लोक कथा’ ‘पुराण कथा’ एक दूसरे में गड्ड-मड्ड होती रहती हैं। इस तरह पद्मावती की अनेक कथाएं हो सकती हैं जो राजस्थान के घरों में, लोकगायकों में, गाइडों में, किताबों में, फिल्मों में बनी हो सकती हैं। पद्मावती के मिथक का निर्माण करने वाला एक तत्त्व है उसका अप्रतिम सौंदर्य! एक तोते के मुंह से उसके ‘रूप’ का वर्णन सुनते ही राजा रतनसेन मूर्छित  हो जाता है और उससे विवाह करने के लिए सिंहल द्वीप कूच कर जाता है। जब वहां एक शिवमंदिर में पद्मिनी को देखता है तो फिर मूर्छित त हो जाता है और दर्पण में एक झलक देख क र यही हाल खिलजी का भी होता है। इस सूफी प्रेमकथा के समकालीन पाठ बेहद इकहरे पाठ हैं और इसीलिए उनमें टकराव है, जबकि यह ‘प्रेमकथा’ अपनी ‘अन्योक्ति’ के सहारे अनेक अर्थ रखने वाली है। लेकिन समकालीन लठमार विमर्शों में ‘अन्योक्ति’ संचालित अनेकार्थों और सूफी प्रेमाभिव्यक्ति को जगह कहां? यह तो पद्मावत के मुक्त ‘कापीराइट’ का एक खास जाति द्वारा हड़पने का मसला है!

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