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राजनीतिः अपने-अपने गांधी

हाथ से कार्य कर कौशल सीखने की सार्वभौमिक आवश्यकता गांधी की शिक्षा संकल्पना का मूल आधार थी। कितनी देर लगी इसे पहचानने में! पांच वर्ष पहले देश में पहली बार कौशल विकास मंत्रालय बना। यदि कृषि के महत्त्व को स्वीकार किया गया होता, कौशल विकास को अपनाया गया होता, ग्राम समाज की मूलभूत आवश्यकताओं को पहचाना गया होता, तो आज देश में बेरोजगारी बढ़ नहीं रही होती, गांव खाली नहीं हो रहे होते और शहरों में झुग्गियां लगातार बढ़ नहीं रही होतीं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

जगमोहन सिंह राजपूत

उत्तर प्रदेश के अपने गांव में लगभग पांच वर्ष की आयु में मैंने जो अप्रत्याशित गतिविधियां देखी थीं, उनका कुछ स्मरण आज भी है। सभी दुखी और परेशान दिखाई देते थे। दूर से उनकी बातों में मुझे तब दो-तीन शब्द बार-बार सुनाई दे ही जाते थे: गांधी, महात्मा, गोली, हत्या! यह सब तो बाद में समझ में आया कि गांधी जी की हत्या ने हर घर और व्यक्ति को दहला दिया था। देश का बंटवारा हिंदू-मुसलमान के ही कारण हुआ था, दोनों संप्रदायों नें अप्रत्याशित दुख झेले थे, मगर गांधी के अवसान का दुख सारा देश साथ-साथ ही झेल रहा था। ग्यारह वर्ष की आयु में स्कूल में एक नाटक में मुझे गांधी की पोषक पहनाकर चार-पांच पंक्तियों का भाषण याद कराया गया। मुझे सिखाया गया था कि ‘स’ के स्थान पर ‘श’ ही बोलना है! अपेक्षित ही था कि मेरे सहपाठी इसके बाद मुझे बार-बार गांधी जी की याद दिलाते रहे। मेरे जैसों का समवयस्क ऐसा कौन भारतवासी होगा जो गांधी को कभी भुला पाया हो!

आज से पांच-छह दशक पहले मैं इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ता था कि गांधी की वाणी, खादी और चरखा गांव-गांव तक उस समय कैसे पहुंचे, जब संचार, साक्षरता, प्रसारण, टीवी सभी सीमित थे। उस व्यक्तिगत खोज का निष्कर्ष यही था कि इसमें सबसे बड़ी भागीदारी स्कूलों के अध्यापकों की थी। वर्ष 2003-04 में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने ऐसे बाईस अध्यापकों से व्यक्तिगत साक्षात्कार के बाद एक पुस्तक तैयार की- कैसे गांधी ने उनके जीवन को बदल दिया! उन्हें भी बदला जो कभी उनसे मिले नहीं थे, देखा नहीं था। गांधी हर घर परिवार में प्रविष्ट हो गए थे और ‘अपने’ बन गए थे। स्वतंत्रता के बाद भी उनके कितने अनुयायी त्याग और तपस्या के अद्भुत उदाहरण बने। उन्होंने सत्ता में रह कर जनसेवा के नए मापदंड स्थापित किए। लोगों नें डा. राजेंद्र प्रसाद जैसे लोगों को देखा था, जो बारह वर्ष राष्ट्रपति पद पर रहने के बाद पटना में कांग्रेस कार्यालय में एक सीलन भरे कमरे में रहे, जिनके बैंक खाते में कुछ सौ रुपए ही थे। देश का दुर्भाग्य था कि ऐसे लोग अपवाद बन गए।

समय के साथ गांधी के सहयोगियों की पीढ़ी भी ओझल होती गई। सामने वे आए जो अपने को उनका अनुयायी घोषित करते रहे, लोगों ने उन पर विश्वास किया, उन्हें सर आंखों पर लिया, बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं कीं। अधिकांश ने बापू की ओर से मुंह मोड़ लिया। सत्ता के अपने प्रभाव होते हैं, लोगों ने देखा कि गांधी की मूर्तियां बन रही हैं, जन्मदिन मनाया जाता है, चित्र लगाए जाते हैं, मगर बहुत कुछ खोता भी जा रहा था। असमानता लगातार बढ़ती ही रही है। दस फीसद अमीर भारतीयों का देश की सतहत्तर फीसद से ज्यादा संपत्ति पर अधिकार है। साठ फीसद गरीब के पास केवल साढ़े चार फीसद संपत्ति है। यह स्थिति भी बहुतों को गांधी की याद दिलाती है। देश के युवाओं से जब मेरे जैसे लोग गांधी के मूल्यों और आदर्शो पर चर्चा करते हैं, तब वे अनेक ऐसे तर्क आंकड़ों सहित प्रस्तुत करते हैं, जो अकाट्य होते हैं। वे पूछते हैं- किसने गांधी को याद रखा है? कहां हैं वे लोग जो कह सकें कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है!

आज के युवाओं को बढ़ती असमानता, संवेदनहीनता और अधिकाधिक भौतिक संग्रहण का प्रवाह रुकने की कोई संभावनाएं दृष्टिगोचर नहीं हो रही हैं। उनकी सोच का आधार कमजोर नहीं होता है। गांधी जी ने जब यह कहा था कि प्रकृति में सभी की आवश्यकता पूर्ति के संसाधन हैं मगर किसी के भी लालच की पूर्ति के लिए नहीं हैं, तब वे प्राचीन भारत की संस्कृति की उन अवधारणाओं को ही दोहरा रहे थे, जो मनुष्य और प्रकृति के संबंधों की संवेदनशील और पारस्परिकता को बनाए रखने का उत्तरदायित्व मनुष्य के ऊपर डालती हैं। गूढ़तम ज्ञान को समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचा देने की परंपरा इस देश ने हजारों साल पहले ही विकसित कर ली थी। गोष्ठी, परिषद्, शास्त्रार्थ से चल कर ज्ञान प्रवाह परिव्राजक साधु-संत, कथावाचक द्वारा हर घर-हर गांव तक पहुंचता था। इसका एक उदाहरण गांधी ने अपने उस पत्र में दिया था, जो उन्होंने यूनेस्को के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल को 1947 में लिखा था। उसका सार यह था कि ‘यदि प्रत्येक व्यक्ति अपन कर्तव्य करे, तो किसी के अधिकारों का हनन नहीं होगा।’ इतना सशक्त वाक्य कहीं अन्य नहीं मिलेगा। इस पत्र में गांधी ने यह बताया था कि उन्हें यह सीख ‘मेरी अनपढ़ किंतु समझदार मां’ ने दी थी।

गांधी जब गोपाल कृष्ण गोखले से मिले और भारत में कार्य करने की इच्छा व्यक्त की, तो गोखले ने उन्हें कहा कि अभी वे इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। उन्हें भारत भ्रमण करना होगा, उसकी विविधता और एकता को समझ कर आत्मसात करना होगा। मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अक्षरश: स्वीकार किया। भारत की जो समझ गांधी ने इसके बाद प्राप्त की, वह अद्भुत थी। उन्होंने शिक्षा की सार्वभौमिक महत्ता को समझा। भारत के लिए उसका एक प्रारूप तैयार किया, उसकी उपयोगिता को लागू कर के दिखाया। ऐसा कोई विकल्प आज तक मेरे सम्मुख नहीं आया है, जिसमें अवसरों की समानता और सफलता की समानता की इतनी अधिक संभावना उभरी हो। गांधी के शैक्षिक चिंतन में भी पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति ही केंद्र बिंदु था। शिक्षा में ही उन्हें उसके जीवन को सम्माननीय स्तर तक लाने की संभावनाएं दिखाई दी थीं।

हाथ से कार्य कर कौशल सीखने की सार्वभौमिक आवश्यकता गांधी की शिक्षा संकल्पना का मूल आधार थी। कितनी देर लगी इसे पहचानने में! पांच वर्ष पहले देश में पहली बार कौशल विकास मंत्रालय बना। यदि कृषि के महत्त्व को स्वीकार किया गया होता, कौशल विकास को अपनाया गया होता, ग्राम समाज की मूलभूत आवश्यकताओं को पहचाना गया होता, तो आज देश में बेरोजगारी बढ़ नहीं रही होती, गांव खाली नहीं हो रहे होते और शहरों में झुग्गियां लगातार बढ़ नहीं रही होतीं।

गांधी को समझने के प्रयास में बहुत कुछ नया तो हर बार मिलता ही है, एक तत्व बार-बार उभरता है कि किसी भी देश की विकास और प्रगति की अवधारणा उस देश की संस्कृति और ज्ञानार्जन की परंपरा को आधार मान कर ही विकसित की जा सकती है। गांधी इसके महत्त्व को स्थानीयता, क्षेत्रीयता और राष्ट्रीयता के स्तर पर क्रमिक रूप से उभारने के पक्ष में थे। किसी भी देश के स्वतंत्रता संग्राम में शिक्षा को इतना अधिक महत्त्व नहीं दिया गया था, जितना गांधी के कारण भारत में दिया गया था। शिक्षा व्यक्ति को व्यक्तित्व में परिवर्तित कर देती है, सही शिक्षा व्यक्ति के सामने वृहत आकाश खोल देती है, जिसमें वह अपनी सृजनात्मकता का सदुपयोग करे, ज्ञानार्जन करे, और विवेक के साथ उसका उपयोग करे।

आज के भारत को गांधी को एक संवेदनशील महामानव के रूप में समझाना होगा, जिसने मनुष्य और मानवता के लिए अपना जीवन लगाया, जिसने माना कि विभिन्न धर्म एक वास्तविकता हैं और उनमें बराबरी के आधार पर सामंजस्य आवश्यक है, क्योंकि ‘एक धर्म को छोड़ कर दूसरे धर्म को अंगीकार करने और प्रतिस्पर्धी का खंडन करने से ही परस्पर घृणा की भावना ही पैदा होती है।’ आज की सबसे बड़ी आवश्यकता सामजिक एकता और पंथिक सद्भाव की है। उनके ही शब्दों में-‘सांप्रदायिक समस्या के समाधान की कुंजी यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म की सर्वोत्कृष्ट बातों को माने और अन्य धर्मों तथा उनके मानने वालों को उतना ही सम्मान दे।’ गांधी हर भारतवासी को अपने जीवन का एक अंश दे गए हैं। यह हमारे हृदय में बसता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसे कितना प्रस्फुटित कर पाते हैं!

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