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राजनीतिः चीन का संकट बना हांगकांग

चीन से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि वह हांगकांग में ‘एक देश दो व्यवस्था’ को खत्म करने पर क्यों तुला है? हांगकांग के लोगों को मिली स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अधिकारों को क्यों छीना जा रहा है? हांगकांग के लोगों को उस न्यायिक व्यवस्था में लाने की कोशिश क्यों हो रही है जो एक पार्टी के नियंत्रण में है? चीन ने हांगकांग के लोगों से लोकतांत्रिक प्रणाली को लेकर वादे किए थे, उसे पूरी तरह से लागू क्यों नहीं किया गया?

Author Updated: August 22, 2019 2:05 AM
हांगकांग के आंदोलन में शामिल लोग परेशान हैं। हांगकांग की अर्थव्यवस्था उन्हें एक बेहतर जिंदगी नहीं दे रही है। पढ़े-लिखे युवाओं को उनकी योग्यता के हिसाब से पर्याप्त वेतन वाली नौकरी नहीं मिल रही है। रोजगार के अवसर तो उपलब्ध हैं लेकिन उम्मीद के मुताबिक वेतन नहीं है।

चीन को इस वक्त फिर एक बड़े आंदोलन का सामना करना पड़ रहा है। पिछले दो महीनों से हांगकांग की सड़कों पर जिस तरह से जनसमूह उमड़ रहा है उससे चीन के हाथ-पैर फूलने लगे हैं। चीनी सरकार के खिलाफ इस विद्रोह का मूल कारण कई अपराधों में संलिप्त अपराधियों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति देने वाला विधेयक है जिसका हांगकांग में जोरदार विरोध हो रहा है। हांगकांग सरकार के इस प्रत्यर्पण विधेयक के पीछे चीन है। दरअसल, चीन और ताइवान के साथ हांगकांग की अभी तक कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं है। प्रस्तावित प्रत्यर्पण विधेयक के पारित होने के बाद हांगकांग, ताइवान और चीन के बीच अपराधियों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति मिल जाएगी।

हांगकांग के लोग इसे अपने देश की स्वायत्तता खत्म करने के कदम के रूप में देख रहे हैं। इसीलिए दो महीने से इसका जोरदार विरोध हो रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह विधेयक उस चीनी न्यायिक व्यवस्था में स्थानीय लोगों को भेजने का रास्ता है जो एक राजनीतिक पार्टी के नियंत्रण में है। हालांकि विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि प्रत्यर्पण बिल से बड़े वित्तीय और मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों को रोकने में मदद मिलेगी। हालांकि भारी विरोध के बाद हांगकांग की मुख्य कार्यकारी कैरी लैम ने फिलहाल इस विधेयक को निलंबित कर दिया है, लेकिन इसे वापस नहीं लिया है। दूसरी तरफ आंदोलनकारियों पर चीनी सैन्य कार्रवाई की आशंका जताई जा रही है। लेकिन अमेरिकी के साथ व्यापार युद्ध के मोर्चे पर फंसी चीन अगर हांगकांग में सैन्य कार्रवाई जैसा कदम उठाती है तो इससे उसकी मुश्किलें और बढे़गी।

हांगकांग के आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया है। पहले आंदोलन में छात्र ही शामिल थे। लेकिन बाद में छात्र संघ, सामाजिक कार्यकर्ता, यूनियन कार्यकर्ता, अलग-अलग क्षेत्रों के कर्मचारी और शिक्षक भी आंदोलन में शामिल हो गए। आंदोलन को पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियों ने हांगकांग सरकार के प्रस्तावित प्रत्यर्पण संधि विधेयक की आलोचना की है। ब्रिटेन ने भी हांगकांग के आंदोलनकारियों के प्रति समर्थन जताया है। ब्रिटेन का समर्थन महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि हांगकांग उसका उपनिवेश रहा है। पश्चिमी देशों का भी तर्क है कि प्रस्तावित प्रत्यर्पण कानून लागू होने के बाद चीन की न्यायिक व्यवस्था में हांगकांग के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा। हांगकांग एशिया का एक बड़ा व्यावसायिक केंद्र है। यही कारण है कि इस आंदोलन को हवा दे पश्चिमी देश चीन को दबाव में लाना चाहते हैं ताकि अपने व्यापारिक हितों को सुरक्षित रख सकें। हांगकांग का आंदोलन ऐसे वक्त में तेज हुआ है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध चरम पर है। चीन पर इस व्यापार युद्ध का असर दिखने भी लगा है। इस साल अप्रैल-जून तिमाही में चीन की विकास दर पिछले सत्ताईस साल में सबसे कम रही है।

हांगकांग के आंदोलन का असर चीन द्वारा विकसित किए जा रहे ग्वांगडोंग-हांगकांग-मकाऊ बृहतर खाड़ी क्षेत्र पर भी पड़ेगा। इस प्रस्तावित बृहतर खाड़ी क्षेत्र से चीन, हांगकांग और मकाऊ की अर्थव्यवस्था को भारी लाभ मिलेगा। चीन की योजना के मुताबिक बृहतर खाड़ी क्षेत्र के विकास के तहत हांगकांग, मकाऊ और ग्वांगडोंग प्रांत को एकीकृत करने की योजना है। इससे पूरे क्षेत्र में और विकास होगा। चीन को शक है कि इस योजना को नुकसान पहुंचाने का खेल भी पश्चिमी ताकतें कर रही हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि हांगकांग के आंदोलन में शामिल लोग परेशान हैं। हांगकांग की अर्थव्यवस्था उन्हें एक बेहतर जिंदगी नहीं दे रही है। पढ़े-लिखे युवाओं को उनकी योग्यता के हिसाब से पर्याप्त वेतन वाली नौकरी नहीं मिल रही है। रोजगार के अवसर तो उपलब्ध हैं लेकिन उम्मीद के मुताबिक वेतन नहीं है। जो वेतन इस समय हांगकांग में लोगों को मिल रहा है उससे युवा अपने लिए एक घर नहीं खरीद सकता है। चीन के मीडिया ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है। ग्लोबल टाइम्स के अनुसार आंदोलन में शामिल युवाओं के सामने बेहतर वेतन और रोजगार एक समस्या है। आंदोलन तेज होने के बाद हांगकांग की अर्थव्यवस्था पर भी चोट पहुंची है। व्यापार ठप पड़ा है। पर्यटन से लेकर खुदरा कारोबार को नुकसान पहुंचा है। यही नहीं, हांगकांग शेयर बाजार को भारी नुकसान हुआ है। अभी तक हांगकांग के शेयर बाजार को पांच सौ अरब डालर का नुकसान हो चुका है। संपतियों की बिक्री में पैंतीस फीसद तक की गिरावट आई है।

चीन एक तरह से कई मोर्चों पर फंसा हुआ है। हाल में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म कर देने के बाद चीन भी भड़का हुआ है। चीन की नाराजगी लद्दाख को केंद्र शासित राज्य बनाने को लेकर है। अभी तक लद्दाख को भी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा होने के कारण विशेष दर्जा मिला हुआ था। चीन की नजरों में लद्दाख विवादास्पद क्षेत्र है। इसकी सीमा अक्साइ चीन से मिलती है जिस पर भारत का दावा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन ने भारी निवेश कर रखा है। यहां पर चीन बिजली परियोजनाएं लगा रहा है। सड़कों का नेटवर्क खड़ा कर रहा है। जाहिर है चीन कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के साथ खड़ा होगा। लेकिन जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म किए जाने को लेकर चीन की नाराजगी और नीतियों का भारी विरोधाभास हांगकांग में नजर आता है। जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को लेकर चिंता जता रहा चीन हांगकांग के विशेष दर्जे को समाप्त करने की योजना बना रहा है। हांगकांग को लेकर चीन ने जो वादा वहां के लोगों से किया था, उसे आज तक पूरा नहीं किया। और तो और लोकतांत्रिक तरीके से हांगकांग की स्वायत्तता को बचाए रखने के लिए आंदोलन कर रहे युवाओं को चीन अब आतंकी घोषित करने की योजना बना रहा है। हांगकांग के आंदोलन का सैन्य दमन की धमकी भी दे रहा है।

चीन से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि वह हांगकांग में ‘एक देश दो व्यवस्था’ को खत्म करने पर क्यों तुला है? हांगकांग के लोगों को मिली स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अधिकारों को क्यों छीना जा रहा है? हांगकांग के लोगों को उस न्यायिक व्यवस्था में लाने की कोशिश क्यों हो रही है जो एक पार्टी के नियंत्रण में है? चीन ने हांगकांग के लोगों से लोकतांत्रिक प्रणाली को लेकर वादे किए थे, उसे पूरी तरह से लागू क्यों नहीं किया गया? हांगकांग के लोग पश्चिमी देशों की तर्ज पर लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं। लेकिन चीन ने इसे मंजूर नहीं किया। हांगकांग के मुख्य कार्यकारी को सीधे हांगकांग की जनता द्वारा चुना जाना चीन को मंजूर नहीं है। हांगकांग विशेष प्रशासनिक क्षेत्र का सबसे बड़ा मुखिया या मुख्य कायर्कारी का चुनाव एक चुनाव समिति करती है जिसमें सिर्फ बारह सौ सदस्य हैं।

सच्चाई तो यही है कि भारतीय कूटनीति चीन के दबाव में है। ओसाका में हाल ही में हुए जी-20 की बैठक में हांगकांग के आंदोलनकारी नेताओं ने जी-20 के नेताओं को ज्ञापन देकर हांगकांग के आंदोलन के लिए समर्थन मांगा था। आंदोलनकारियों ने ओसाका की बैठक में पहुंचे राष्ट्राध्यक्षों को ज्ञापन देकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने आंदोलनकारियों का पक्ष रखने की अपील की थी। दिलचस्प बात यह थी कि भारत और इंडोनेशिया ने आंदोलनकारी नेताओं का ज्ञापन स्वीकार नहीं किया। जबकि बाकी देशों के नेताओं ने आंदोलनकारी नेताओं का ज्ञापन भी स्वीकार किया और चीन के सामने हांगकांग के आंदोलनकारियों का मुद्दा भी उठाया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हांगकांग के आंदोलनकारियों की मांगों को लेकर चिंता जताई।

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