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राजनीतिः शिक्षा का स्वरूप और सवाल

शिक्षा किसी भी पूर्वाग्रह और भेदभाव के बिना उन मूल्यों से परिचित कराती है जो विकास का खाका तैयार करते हैं। अगर वर्तमान शिक्षण संस्थान पूर्वाग्रह और भेदभाव युक्त शिक्षा दे रहे हैं तो विकास विरोधी परिणामों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रत्येक नागरिक को हर क्षेत्र में उदारता और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाएं, ताकि वह भय मुक्त हो सके और शोषण बनाम समानता के मध्य आधारभूत विभाजन कर सके।

Author Published on: January 29, 2020 2:15 AM
अब यह सोचना पड़ेगा कि शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए, धर्म केंद्रित या धर्मनिरपेक्ष? इस घटना को स्वीकृति मिलने का मतलब तो यह हुआ कि संस्कृत भाषा को केवल हिंदू, विशेष रूप से ब्राह्मण, पढ़ा सकते हैं, उर्दू भाषा मुसलमान, अंग्रेजी भाषा ईसाई और गुरमुखी भाषा सिख ही पढ़ा सकते हैं। (REUTERS)

ज्योति सिडाना

शिक्षा का उद्देश्य खाली दिमाग को खुले दिमाग में परिवर्तित करना है। नेल्सन मंडेला ने कहा था कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसे आप दुनिया बदलने के लिए प्रयोग कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस तरह की शिक्षा होगी, समाज में वैसा ही बदलाव आएगा। अब सवाल यह है कि हम शिक्षण संस्थानों में किस प्रकार की शिक्षा दे रहे हैं? छात्रों को धर्म केंद्रित शिक्षा दी जा रही है या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा। मार्गरेट मीड कहती हैं कि बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि कैसे सोचें, न कि क्या सोचें। बच्चों की सोच को बंधक मस्तिष्क नहीं बनाना है, अपितु उन्हें संकुचन के दायरे से बाहर रहते हुए सोचने के लिए प्रेरित करना है, ताकि वे अपनी कल्पनाशक्ति, सृजनशीलता और नवाचार के माध्यम से एक सभ्य और विकसित समाज का निर्माण कर सकें।

पिछले दिनों जिस तरह की कुछ घटनाएं देखने को मिलीं, वे एक शिक्षित समाज को झकझोरने वाली हैं। लखनऊ में सरकार की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना को बीच में ही रोक दिया गया था क्योंकि वे एक कव्वाली पर नृत्य करने वाली थीं। कुछ महीने पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में डॉ. फिरोज खान को संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिलने के बावजूद सिर्फ इसीलिए उनका विरोध शुरू हो गया था कि एक मुसलिम शिक्षक धर्म विज्ञान संकाय में नहीं पढ़ा सकता। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या शैक्षणिक और सांस्कृतिक दायित्वों का निर्वाह धार्मिक अस्मिता के आधार पर होगा? ये घटनाएं देखने और सुनने में भले छोटी लगती हों, लेकिन इनके परिणाम समूची शिक्षा प्रणाली के लिए इतने खतरनाक हैं कि हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।

पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में विद्यार्थियों द्वारा ऐसा धरना-प्रदर्शन सर्वथा निंदनीय है, क्योंकि वे संविधान के मूल्यों का उल्लंघन कर रहे थे और उसे प्रशासन सहन कर रहा था। जबकि भारतीय संविधान के भाग तीन में सम्मिलित अनुच्छेद-15 कहता है कि राज्य अपने किसी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, लिंग, नस्ल और जन्म स्थान या इनमें से किसी भी आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा। तो फिर विश्वविद्यालय प्रशासन इस तरह के छात्र आंदोलन या विरोध प्रदर्शन को कैसे बर्दाश्त करता रहा? क्या यह उसकी मौन स्वीकृति नहीं थी?

अब यह सोचना पड़ेगा कि शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए, धर्म केंद्रित या धर्मनिरपेक्ष? इस घटना को स्वीकृति मिलने का मतलब तो यह हुआ कि संस्कृत भाषा को केवल हिंदू, विशेष रूप से ब्राह्मण, पढ़ा सकते हैं, उर्दू भाषा मुसलमान, अंग्रेजी भाषा ईसाई और गुरमुखी भाषा सिख ही पढ़ा सकते हैं। दूसरी तरफ पद्मावत फिल्म का विरोध इसलिए किया गया था कि उन्हें लगता है कि राजपूतों के साथ अन्याय हो रहा है। फिल्म पानीपत का विरोध इसलिए हो रहा है कि उन्हें लगता है कि जाटों के साथ अन्याय हो रहा है। अब ऐसा लगने लगा है कि इतिहास को निर्धारित करने का दायित्व केवल कुछ लोगों ने ले लिया है। इसी तरह शिक्षण संस्थानों में कौन क्या पढ़ाएगा, यह दायित्व भी कुछ लोगों तक सीमित हो गया है।

आज समाज में धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की जिस तरह से अनदेखी हो रही है, वह गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। अधिकांश घटनाओं को धर्म का चोला पहना कर प्रस्तुत किया जाने लगा है, जिनका मूल चरित्र ही धर्मनिरपेक्ष होता है या कहें कि बहु-सांस्कृतिक होता है। इस तरह का विभाजन किसी भी धर्मनिरपेक्ष और बहु-सांस्कृतिक परिवेश के लिए बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। धर्म और भाषा के आधार पर शिक्षा का विभाजन राष्ट्र को किस ओर ले जाएगा, यह विचारणीय विषय है।

शिक्षा प्रणाली की मुख्य भूमिका सांस्कृतिक पुनरुत्पादन करना है और वह भी प्रभुत्व वर्ग की संस्कृति का पुनरुत्पादन करना। इसलिए इस समूह / वर्ग के पास संस्कृति को अर्थ देने, वैधता प्रदान करने और उसे दूसरों पर थोपने की शक्ति होती है। संभवत: इसलिए हिटलर ने भी कहा था कि ‘मुझे पाठ्य पुस्तकों पर नियंत्रण करने दो, तो मैं जर्मनी को कब्जे में कर लूंगा।’ इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि धर्म मानव में विनम्रता, सहनशीलता, आत्म-नियंत्रण और त्याग जैसे गुण विकसित करने में सहायक होता है। एक उपयुक्त शिक्षा प्रणाली मानव में उन्हीं आदर्शों और मूल्यों को विकसित करती है जो विश्व के समस्त धर्मों की शिक्षा पर आधारित होते हैं। परंतु क्या आज की शिक्षा प्रणाली ऐसा कर पाने में सक्षम है संभवत: नहीं। अगर ऐसा होता तो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में डॉ. फिरोज खान का विरोध नहीं होता। शिक्षा तो धर्म, समुदाय, भाषा और जाति से परे बहु-संस्कृतिवाद और धर्मनिरपेक्षता को छात्रों के व्यक्तित्व का हिस्सा बनाती है। अगर शिक्षा इस भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रही है तो फिर शिक्षा संदेह के घेरे में है।

इस तरह की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि हम बच्चों को न औपचारिक शिक्षा ठीक से दे पा रहे हैं, न ही अनौपचारिक शिक्षा देने में सफल हुए हैं। इस संदर्भ में परिवार, समाज और स्कूल सभी के समक्ष बड़ी चुनौती है। यहां कुछ सवाल किए जा सकते हैं, जैसे- शिक्षक जो पढ़ा रहे हैं, क्या उसे उन्होंने अपने जीवन में उतारा है? चूंकि बच्चे अधिकांश समय स्कूल और शिक्षक के साथ बिताते हैं, उन्हें जैसा व्यवहार करते देखते हैं, वैसा सीखते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो वे विरोधाभास का शिकार होते हैं यानी पढ़ाते कुछ हैं और दिखाते कुछ हैं। क्या हम केवल सूचना दे रहे हैं? अगर ऐसा कर रहे हैं तो गलत कर रहे हैं। आज समस्या मत-भिन्नता की नहीं है, बल्कि विचार शून्यता की है। नील पोस्टमैन के अनुसार आज की पीढ़ी विचारहीन और नकलची है, उसके पास जुमले हैं, पर चिंतन नहीं है। एक तरफ हम दावा करते हैं कि हम ‘ज्ञान समाज’ की ओर बढ़ रहे हैं, पर क्या ‘विचारहीनता’ के साथ ऐसा करना संभव है?

शिक्षा किसी भी पूर्वाग्रह और भेदभाव के बिना उन मूल्यों से परिचित कराती है जो विकास का खाका तैयार करते हैं। अगर वर्तमान शिक्षण संस्थान पूर्वाग्रह और भेदभाव युक्त शिक्षा दे रहे हैं तो विकास विरोधी परिणामों की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रत्येक नागरिक को हर क्षेत्र में उदारता और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाएं, ताकि वह भय मुक्त हो सके और शोषण बनाम समानता के मध्य आधारभूत विभाजन कर सके। उदार, स्वतंत्र और खुले मस्तिष्क वाले व्यक्ति ही सच्चे लोकतंत्र की स्थापना में सहायक हो सकते हैं। शिक्षण संस्थानों में हर किस्म का ज्ञान दिया जाना चाहिए, लेकिन उस ज्ञान का दायरा लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के अंतर्गत सुनिश्चित करने की जरूरत है। तभी लोग गणतंत्र के वास्तविक अर्थ को समझ पाएंगे।

समाज में उत्पन्न इन संकटों का सामना करने के लिए बुद्धिजीवियों, विशेष रूप से समाज विज्ञानियों का यह दायित्व है कि वे स्वयं एक नागरिक के रूप में लोकतांत्रिक, उदारवादी एवं समतामूलक व्यवहार प्रणाली का हिस्सा बनें, ताकि लोकतांत्रिक, उदारवादी, समतामूलक समाज व्यवस्था के प्रति उसकी प्रतिबद्धताएं सुनिश्चित हों। साथ ही, उन्हें इस बात पर ध्यान देना होगा कि उनकी प्रत्येक व्याख्या संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था, विचारधारा और संबंधों के ढांचे के अंतर्गत हो, क्योंकि स्वाधीनता के इतने वर्षों के बाद भी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता को अपनी जीवन पद्धति में शामिल नहीं कर पाया है। शायद इसका एक बड़ा कारण उपयुक्त शिक्षा प्रणाली का न होना है। अत: भारतीय समाज में होने वाला यह परिवर्तन न केवल चिंताजनक है, अपितु भारतीय समाज की साझा संस्कृति और विविधता की विरासत के लिए खतरा हो सकता है।

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