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राजनीति: नेपाल में सत्ता संघर्ष

नेपाल के राजनीतिक दलों के नेता काठमांडू स्थित अमेरिकी और चीनी दूतावास के बीच फंसे हुए हैं। यह सच्चाई है कि ताकतवर मुल्कों और वैश्विक संस्थाओं से मिलने वाले कर्ज, आर्थिक सहायता और अनुदानों से गरीब और विकासशील देशों के राजनीतिक दलों और नेताओं के अपने हित सधते हैं। यही हाल नेपाल का है।

नेपाल में गहरात सियासी संकट के बीच पार्टी के दो वरिष्ठ नेता पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ और वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के बीच तलवारें खिंची हुई हैं।

नेपाल में सताधारी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का आतंरिक संकट दूर नहीं हुआ है। पार्टी के दो वरिष्ठ नेता पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ और वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के बीच तलवारें खिंची हुई हैं। फिलहाल सताधारी दल में आंतरिक कलह जारी है। हालांकि काठमांडो में मौजूद चीन की राजदूत हाओ यांकी इन नेताओं के बीच विवाद को खत्म करने की पूरी कोशिश कर रही हैं और इसके लिए वे नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से मिल रही हैं। पर प्रचंड ओली के इस्तीफे को लेकर अड़े हैं।

यही सबसे बड़ा गतिरोध बना हुआ है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी समिति की बैठकें भी हुईं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। सताधारी दल में यह राजनीतिक संकट तब आया है, जब नेपाली संसद ने नेपाल के राजनीतिक मानचित्र में बदलाव को मंजूरी दी। बदले हुए मानचित्र में भारत के कुछ हिस्से नेपाल में दिखाए गए हैं। इन परिस्थितियों में राजनीतिक उठापठक को लेकर भारत पर आरोप लगना तय है। प्रधानमंत्री ओली ने भारत पर दखलंदाजी का आरोप भी लगाया। पर सारे घटनाक्रम के बीच यही कहा जा सकता है कि नेपाली लोकतंत्र शैशवास्था में ही कमजोर हो रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि नेपाल की राजनीति में भारत का प्रभाव 1950 के दशक से ही रहा है। लेकिन वर्तमान की सच्चाई यह है कि चीन नेपाल की राजनीति के आंतरिक मामलों में खुल कर दखल दे रहा है। नेपाल के संकट को दूर करने के लिए चीनी राजदूत हाओ यांकी ने जिस तरह से सक्रियता दिखाई है, उससे इस बात की पुष्टि हो जाती है। यांकी का नेपाल में काफी प्रभाव है और उन्हें चतुर कूटनीतिक के रूप में देखा जाता है।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के बीच समझौते के लिए वे लगातार बैठकें कर रही हैं। कभी प्रचंड से मिल रही हैं, तो कभी ओली से। चीनी राजदूत की गतिविधियां बताती हैं कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को चीन से सीधा निर्देश मिल रहा है। यही का?ण है कि नेपाल के नेताओं को इस समय दूसरी एशियाई ताकतों के साथ संतुलन बनाए रखने में भारी दिक्कतें पेश आ रही हैं।

वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति में किसी देश की अंदरूनी राजनीति में पड़ोसी मुल्क की दखलंदाजी सामान्य तौर पर होती रहती है। द्वितीय विश्वयुद के बाद की नई व्यवस्था में एशिया से लेकर यूरोप, लैटिन अमेरिका तक के देशों की अंदरूनी राजनीति में बाहरी हस्तक्षेप होते रहे हैं। खाड़ी के देशों में कई ताकतवर देश पड़ोसी मुल्क की अंदरूनी राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं।

एक वक्त में सोवियत रूस दक्षिण एशिया के कई देशों, कई यूरोपीए देशों और लैटिन अमेरिकी देशों तक की राजनीति में दखल देता था। इसलिए नेपाल को इसका अपवाद नहीं कहा जा सकता। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि किसी देश के अंदर की हर राजनीतिक घटना को बाहरी ताकतें प्रभावित करती हैं। अगर देश का आंतरिक राजनीतिक ढांचा मजबूत है तो बाहरी हस्तक्षेप का प्रभाव काफी कम रहता है। लेकिन सच्चाई यह है कि नेपाली लोकतंत्र अभी काफी कमजोर है। नेपाल में नया संविधान बन तो गया और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होने के बाद नई सरकार भी बन गई। लेकिन इसके बावजूद नेपाली लोकतंत्र शैशवास्था में ही कई बुराइयों से ग्रस्त हो गया।

नेपाली लोकतंत्र को नष्ट करने की कोशिश वहां के राजनीतिक दल कर रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी समिति की बैठक में ओली पर गंभीर आरोप लगाते हुए प्रचंड ने यहां तक कह डाला कि ओली नेपाल में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसा शासन मॉडल लाना चाहते हैं। इससे अंदाजा लगायाजा सकता है कि नेपाली कम्युनिस्ट किस तरह के अंदरूनी संकट से जूझ रही है।

नेपाल में पिछले साढ़े चार साल में चार प्रधानमंत्री बन चुके हैं। नेपाल में वैसे तो कई राजनीतिक दल हैं, लेकिन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाली कांग्रेस सबसे मजबूत राजनीतिक दल हैं। इन दोनों दलों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। खुद प्रचंड और ओली भी इस तरह के आरोपों में घिरे हैं। लोकतांत्रिक नेपाल में विकास की गति धीमी है, क्योंकि नेपाल के राजनीतिक दलों के नेता अपनी पूरी ऊर्जा सरकार बनाने और गिराने में लगाते रहे हैं। नेपाल में स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली की स्थिति खराब है। उर्जा के लिए जरूरी संसाधनों के मामले में अमीर नेपाल बाहर से बिजली आयात करता है।

नेपाल की अंदरूनी राजनीति की उठापटक में भारत और चीन का नाम न आए, ऐसा हो नहीं सकता। ओली के खिलाफ प्रचंड और दूसरे कम्युनिस्ट नेताओं ने बगावत की है। लेकिन ओली ने इसमें भारत की साजिश देखी। जबकि ओली किसी जमाने में खुद भारत के नजदीक रहे हैं। एक वक्त प्रचंड भारत के घोर विरोधी थे। ओली आज खुल कर चीन के समर्थन में हो गए हैं। भारतीय हिस्सों को नेपाल के मानचित्र में दिखा कर उन्होंने नए विवाद को जन्म दिया है। इसके पीछे भी चीन का ही दिमाग है।

ऐसे में जब ओली पर राजनीतिक संकट आया तो उन्हें भारत की साजिश दिखी। दूसरी ओर, प्रचंड की अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं हैं। प्रचंड खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। प्रचंड का तर्क है कि ओली ढाई साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं, इसलिए अब ढाई साल उन्हें प्रधानमंत्री रहने का मौका दिया जाए। प्रचंड की प्रधानमंत्री बनने की इस महत्त्वाकांक्षा के पीछे ओली को भारत का हाथ नजर आ रहा है।

भारत पर तमाम आरोपों को लगाने से पहले ओली को इस बात का जवाब देना चाहिए कि जब वे भारत के नजदीक थे तो उन्होंने भारत से क्या मदद ली थी? ओली को यह भी बताना चाहिए कि आज वे खुद चीन की पहली पसंद क्यों हैं? ओली का रवैया पाकिस्तानी हुक्मरानों की तरह है। पाकिस्तान हुक्मरान पाकिस्तान के अंदर की घटनाओं के लिए कई बार भारत को जिम्मेवार ठहरा देते हैं।

इस समय नेपाल में दो बड़ी आर्थिक शक्तियों का टकराव बढ़ा है। एक तरफ अमेरिका है और दूसरी तरफ चीन। ये टकराव नेपाल में निवेश और विकास के लिए मिलने वाली सहायता राशि, अनुदान और कर्ज को लेकर हो रहा है। इस कारण नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता भी आपस में बंट गए हैं।

एक तरफ चीन की बेल्ट एवं रोड परियोजना है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सरकार की विदेशी अनुदान एजेंसी मिलेनियम चैलेंज कारपोरेशन है। चीन ने बेल्ट एवं रोड पहल की तहत नेपाल में ढांचागत क्षेत्र में विकास का काम शुरू कर दिया है। दूसरी तरफ अमेरिका के मिलेनियम चैलेंज कारपोरेशन ने भी नेपाल में विकास योजनाओं के लिए पचास करोड़ डालर की योजनाओं पर सहमति दी है। लेकिन अमेरिकी सहायता से बनने चलने वाली योजनाओं को लेकर नेपाली संसद की मंजूरी अभी नहीं मिली है। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में मौजूद चीन समर्थक नेता चीन के इशारे पर अमेरिकी विकास योजनाओं का विरोध कर रहे हैं।

दरअसल विदेशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता, वित्तीय कर्ज आदि ने नेपाल की अंदरूनी राजनीति पर खासा असर डाला है। इससे नेपाल की राजनीति में भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। नेपाल के राजनीतिक दलों के नेता काठमांडू स्थित अमेरिकी और चीनी दूतावास के बीच फंसे हुए हैं। यह सच्चाई है कि ताकतवर मुल्कों और वैश्विक संस्थाओं से मिलने वाले कर्ज, आर्थिक सहायता और अनुदानों से गरीब और विकासशील देशों के राजनीतिक दलों और नेताओं के अपने हित सधते हैं। यही हाल नेपाल का है। ऐसे में नेपाल का अंदरूनी सत्ता संघर्ष देश को किस दिशा में ले जाएगा, इसकी आकलन कर पाना आसान नहीं है।

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