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राजनीतिः किसान का संकट

सरकार ने किसान सम्मान निधि योजना के तहत किसानों को सालाना छह हजार रुपए देने का ऐलान किया। साथ ही, किसानों के लिए पेंशन योजना भी घोषित की गई। लेकिन बुनियादी सवाल यही है कि इससे किसानों की दशा कैसे सुधरेगी। छह-आठ हजार रुपए से किसानों की बदहाली कैसे दूर होगी, यह सोचने वाली बात है। किसानों की दशा सुधरने का मतलब है कि वे किसी कर्ज या आर्थिक मदद के लिए मोहताज न हों।

Author Updated: September 23, 2019 1:56 AM
कृषि का महत्त्व कम नहीं हुआ है। हमारी अर्थव्यवस्था इसी से चल रही है। लेकिन सबसे दुखद पहलू यह है कि किसानों को ध्यान में रख कर शोध और तकनीकी तैयार नहीं की जा रही।

किसान गरीब क्यों है? किसान आत्महत्या करने पर मजबूर क्यों है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका दशकों से जवाब ढूंढ़ा जा रहा है। बड़ी-बड़ी रिपोर्टें आ चुकी हैं। इनमें से कई लागू भी हुईं, तो कई दबा दी गईं। लेकिन दुख की बात यह है कि किसानों की दशा सुधारने के लिए जो उपाय किए गए, उनका अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। अहम सवाल है कि क्या हम किसानों की समस्याओं का सही कारण नहीं खोज पाए या खोजना नहीं चाहते? हालांकि सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का संकल्प किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के विकास के लिए प्रयास कर रही है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि निर्यात बढ़ाना बहुत जरूरी है। लेकिन कृषि निर्यात के मामले में स्थिति संतोषजनक नहीं रही है। इसका नतीजा यह है कि किसानों की आर्थिक दशा में सुधार के आसार नजर नहीं आते।

आर्थिक मानकों पर किसान बेहद असुरक्षित हैं। कम आय, बढ़ती लागत और नीतिगत दुर्व्यवहार ने कृषि संस्कृति को संकट में डाल रखा है। पिछले कई सालों से खेती करने की लागत जिस तेजी से बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में किसानों को मिलने वाले फसलों के दाम बहुत ही कम बढ़े हैं। इससे किसान बीच में पिस जाता है। इसका नतीजा हम सब किसान पर कभी न खत्म होने वाले बढ़ते कर्ज के रूप में देखते हैं।

भारत में सबको अन्न देने वाले किसान की हालत अच्छी नहीं है। बड़ी संख्या में किसान खासतौर से छोटे किसान भारी कर्ज में दबे हैं और कर्ज की वजह से उत्पीड़न इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि किसान को आत्महत्या करने के सिवाय कोई और रास्ता नजर नहीं आता। पुरानी कहावत है कि भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में ही पूरा जीवन रहता है और कर्ज में ही मर जाता है। यह आज भी सही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक घाटे का सौदा होने की वजह से रोजाना ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं और हर दिन पचास किसान मौत को गले लगा रहे हैं। और तो और, देश में अभी किसानों की कोई एक परिभाषा भी नहीं है। वित्तीय योजनाओं में, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और पुलिस की नजर में किसान की अलग-अलग परिभाषाएं हैं। यह उस देश के लिए बहुत दुर्भाग्य की बात है जहां की साठ फीसद आबादी खेती-किसानी से गुजारा करती है।

कृषि का महत्त्व कम नहीं हुआ है। हमारी अर्थव्यवस्था इसी से चल रही है। लेकिन सबसे दुखद पहलू यह है कि किसानों को ध्यान में रख कर शोध और तकनीकी तैयार नहीं की जा रही। वहीं, कृषि जगत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि युवा खेती जैसे पारंपरिक काम से मुंह मोड़ चुके हैं। यह गंभीर संकट की स्थिति है। इसकी वजह यह है कि नौजवान पीढ़ी गांव में नहीं रहना चाहती और पढ़ाई-लिखाई व रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है। इसलिए हमारे सामने बड़ी चुनौती किसानों की अगली पीढ़ी तैयार करने की है। अगर युवा इसमें नहीं आएंगे तो हम भविष्य के किसान कहां से लाएंगे। ये पूरे देश के नीति-नियंताओं को सोचना चाहिए।

यही वजह है कि आज भी हमारे किसान हाशिये पर जीने के लिए मजबूर हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि अट्ठावन फीसद से अधिक किसान हर रात को भूखे सोते हैं। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि देश के लिए अनाज पैदा करने वाले खुद भूखे सो रहे हैं। वर्ष 2016 के आर्थिक सर्वे के मुताबिक, भारत के सत्रह राज्यों में (लगभग आधे देश में) खेतिहर परिवारों की औसत आमदनी सालाना बीस हजार रुपए से कम है। नीति आयोग ने बताया कि वर्ष 2010 से 2015 के बीच देश भर में किसानों की वास्तविक आय में वार्षिक वृद्धि दर आधा प्रतिशत से कम (वास्तव में 0.44 फीसद) रही। दूसरे शब्दों में पिछले चालीस वर्षों में किसानों की आय स्थिर रही है। दूसरी तरफ, भारत में खेती अप्रभावी होने का मुख्य कारण खेतों का लगातार छोटा होना है। दुनिया में सबसे ज्यादा छोटे खेत भारत में ही होते हैं। इन सिकुड़ते खेतों पर अधिक लोगों की निर्भरता है।

वैश्विक औसत जमीन धारक आकार साढ़े पांच हेक्टेयर है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1951 के बाद से प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता में सत्तर फीसद की गिरावट हुई है। ये आंकड़े वर्ष 2011 में 0.5 हेक्टेयर से 0.15 हेक्टेयर तक हुए हैं और भविष्य में और भी कम होने की आशंका है। स्पष्ट है, कृषि की हालत में सुधार के बिना न तो देश की हालत में सुधार संभव है और न ही किसानों की स्थिति सुधर सकती है। यही वजह है कि ग्रामीण भारत में सबको अन्न देने वाला भूखा मर रहा है। आजादी के बाद विकास की योजनाएं शहरों को केंद्र में रख कर तैयार की गईं। किसान और कृषि प्रधान देश का नारा संसद तक ही सीमित रहा। किसानों की समस्या का एक ही समाधान है और वह यह कि कृषि लागत पर नियंत्रण और कृषि उपज की वाजिब कीमतें सुनिश्चित करना। किसानों के प्रति सरकारों का जो रवैया है, उसे देखते हुए किसान खुद नहीं समझ पाता है कि वह कृषि उपज की खेती करता है या घाटा पैदा करने वाली खेती करता है।

कृषि क्षेत्र की अनदेखी कर विकास को स्थायित्व प्रदान करने की कल्पना नहीं की जा सकती। यह बात सही है कि सरकार ने 2022 तक देश के किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को ठोस कार्य योजना से ही हासिल किया जा सकता है। सरकार को कृषि क्षेत्र की मजबूती के लिए संवेदनशीलता के साथ कार्य करना चाहिए। विकास दर में उछाल को बरकरार रखने के लिए विकास के सभी क्षेत्रों की ओर समान ध्यान देने की जरूरत है। सरकार ने किसान सम्मान निधि योजना के तहत किसानों को सालाना छह हजार रुपए देने का ऐलान किया। साथ ही, किसानों के लिए पेंशन योजना भी घोषित की गई। लेकिन बुनियादी सवाल यही है कि इससे किसानों की दशा कैसे सुधरेगी। छह-आठ हजार रुपए से किसानों की बदहाली कैसे दूर होगी, यह सोचने वाली बात है। किसानों की दशा सुधरने का मतलब है कि वे किसी कर्ज या आर्थिक मदद के लिए मोहताज न हों। खेती के लिए उन्हें इतनी सुविधाएं मिलें कि वे खेती को बोझ न समझें।

ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डवलपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2000-2017 के बीच में किसानों को पैंतालीस लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, क्योंकि उन्हें उनकी फसलों का समुचित मूल्य नहीं मिल पाया। स्पष्ट है, सत्ता में जितनी भी सरकारें आई और गईं, उनमें से ज्यादातर ने किसानों को राजनीति का जरिया बना कर सियासत चमकाने में ही दिलचस्पी ली। किसान को लेकर राजनीति होती रही। लेकिन दुर्भाग्य है कि उसको लेकर कोई कारगर नीति अभी तक नहीं बनी है। किसानों के हित और उनकी आर्थिक तरक्की के लिए व्यावहारिकता के धरातल पर जितना काम होना चाहिए था, उसका एक चौथाई हिस्सा भी नहीं हुआ। इसीलिए किसान आज बदहाल है। सरकारों की उपेक्षा के चलते वह निराशा में घिरा है। है। किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए कई स्तरों पर नए सिरे से सुधार की जरूरत है। तभी कृषि क्षेत्र में रौनक और किसानों के चेहरे पर चमक दिखेगी।

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