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राजनीति: काकेशस की आग

आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच छिड़े संघर्ष में अब यह भी तथ्य सामने आया है कि तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ने वाले कई लड़ाके भी अजरबैजान की ओर से युद्ध के मैदान में झोंक दिए गए हैं। तुर्की रणनीतिक रूप से जिस प्रकार इस समूचे युद्ध में सहायता कर रहा है, उससे मध्यपूर्व की पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता का असर भी इस इलाके पर पड़े बिना नहीं रह पाएगा।

लॉस एंजिल्स में अर्मेनियाई यूथ फेडरेशन की ओर से अजरबैजान की आक्रामकता के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन। (कीथ बर्मिंघम फोटो SCNG एपी)

ब्रह्मदीप अलूने

हजारों साल पहले भौगोलिक अरबी प्लेट और यूरेशियाई प्लेट की टकराहट से बने काकेशस पर्वत का राजनीतिक और धार्मिक इतिहास बेहद रक्तरंजित रहा है। ईसाई और इस्लाम समुदाय के बीच खूनी संघर्ष से लगातार जूझने वाली इन पहाड़ियों में सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विभिन्नताएं बिखरी पड़ी हैं। यूरोप और एशिया के कई देशों को छूने वाले दुर्गम काकेशस से रूस, तुर्की और ईरान का गहरा जुड़ाव है। भौगोलिक और खनिज संपदा से परिपूर्ण इस क्षेत्र से तेल और गैस की पाइप लाइनें गुजरती हैं। इसलिए इनका रणनीतिक महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यही कारण है कि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां इस इलाके पर आधिपत्य को लेकर सतर्क रहती हैं। पिछले कुछ दिनों से काकेशस से जुड़े विवादित इलाके नागोर्नो-काराबाख पर कब्जे को लेकर आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच जारी लड़ाई रूस की मध्यस्थता से फिलहाल रुकी तो गई है, लेकिन दोनों देशों के बीच किसी भी समय फिर से संघर्ष छिड़ जाने का खतरा टला नहीं है।
कभी अविभाजित सोवियत संघ का भाग रहे ये दोनों देश अब अपनी अलग पहचान बना चुके हैं।

आर्मेनिया ईसाई बहुल देश होकर फ्रांस का करीबी है, जबकि अजरबैजान मुसलिम बाहुल्य देश है और ईरान व तुर्की का मित्र देश है। इन देशों पर रूस का प्रभाव तो है, लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप आर्दोआन के कथित रूप से अजरबैजान का समर्थन करने की घोषणा से स्थितियां खराब हो गई हैं। अजरबैजान इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआइसी) का सदस्य राष्ट्र है और इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने का आर्दोआन का सपना दुनिया के लिए विध्वंसकारी बनता जा रहा है। जिस नागोर्नो-काराबाख को लेकर आर्मेनिया और अजरबैजान में संघर्ष हो रहा है, वह करीब साढ़े चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला इलाका है, जहां आर्मेनियाई ईसाई और तुर्की नस्ल के मुसलिम रहते हैं।

नब्बे के दशक में भी इस इलाके में ईसाइयों और तुर्क मुसलमानों के बीच भीषण संघर्ष में हजारों लोग मारे गए थे और लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। इस इलाके को अजरबैजान अपना बताता है। 1994 में खत्म हुई लड़ाई के बाद से इस इलाके पर आर्मेनिया का कब्जा है, लेकिन तुर्की अजरबैजान को समर्थन देकर इस क्षेत्र को आर्मेनिया से छीनना चाहता है।

यूरोप के एकमात्र मुसलिम बहुल देश तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोआन अपने देश में कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देकर सत्ता पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं और यह उनकी विदेश नीति में लगातार प्रतिबिंबित भी हो रहा है। सोवियत संघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए अजरबैजान को तुर्की ने 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार करते हुए उसे अपना भाई बताया था, जबकि आर्मेनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं।

1993 में जब आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अजरबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मेनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी थी। आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच छिड़े संघर्ष में अब यह भी तथ्य सामने आया है कि तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ने वाले कई लड़ाके भी अजरबैजान की ओर से युद्ध के मैदान में झोंक दिए गए हैं। तुर्की रणनीतिक रूप से जिस प्रकार इस समूचे युद्ध में सहायता कर रहा है, उससे मध्यपूर्व की पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता का असर भी इस इलाके पर पड़े बिना नहीं रह पाएगा।

अजरबैजान एशिया का भाग माना जाता है और इसकी सीमाओं से लगे देश ईरान, रूस, आर्मेनिया, तुर्की और जार्जिया हैं और यह कैस्पियन सागर से जुड़ा है। धीरे-धीरे यह देश सत्तावादी लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है। यहां के राष्ट्रपति अलीयेव, आर्दोआन की तर्ज पर सत्ता पर अपना नियंत्रण मजबूत करना चाहते हैं और युद्ध को राष्ट्रीय भावनाओं और अस्मिता से जोड़ रहे हैं। अजरबैजान में शिया मुसलमानों कि भी खासी तादाद है और उनकी सुरक्षा की चिंता ईरान को है।

दूसरी ओर आर्मेनिया की सीमा तुर्की, ईरान, जार्जिया और अजरबैजान से लगी है। तुर्की और अजरबैजान की सीमाओं पर आर्मेनिया के साथ अक्सर तनाव रहता है और यह बंद रहती हैं। ईसाई बाहुल्य आर्मेनिया में यजीदियों की भी आबादी रहती है जिन पर सीरिया-इराक के गृहयुद्ध में आइएसआइएस ने कहर बरपाया था। यजीदी कुर्दों का एक उपसमुदाय है, जिनका अपना अलग यजीदी धर्म है। तुर्की कुर्दों का विरोध करता रहा है और उस पर कुर्दों के नरसंहार के कई आरोप लग चुके हैं। ऐसे में नागोर्नो-काराबाख पर आधिपत्य को लेकर तुर्की द्वारा भेजे गए लड़ाके यजीदीयों को भी निशाना बना सकते है और इसका व्यापक असर मध्यपूर्व में पड़ सकता है।

इस पूरे संघर्ष और विवाद में रूस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसके अजरबैजान और आर्मेनिया दोनों ही देशों से अच्छे रिश्ते हैं। लेकिन आर्मेनिया में उसका सैन्य अड्डा है और दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सहयोग संधि भी है। इस समूचे क्षेत्र में नाटो के प्रभाव को लेकर रूस शुरू से चौकन्ना रहा है। तुर्की नाटो का सदस्य देश है। कई वर्षों तक जूझने के बाद जार्जिया और चेचन्या के इस्लामिक चरमपंथ पर बड़ी मुश्किल से काबू पाने वाले रूस के लिए यह स्वीकार्य नहीं हो सकता की मध्यपूर्व के लड़ाके इस क्षेत्र में आकर अपनी पकड़ मजबूत करें, क्योंकि इन लड़ाकों का जेहाद के नाम पर प्रशिक्षण पूरे क्षेत्र में चरमपंथ की समस्या को बढ़ा सकती है और रूस इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है। तुर्की और पाकिस्तान के संबंध भी काफी मजबूत हैं। माना जा रहा है कि तुर्की की ओर से नागोर्नो-काराबाख में भेजे गए लड़ाके पाक-प्रशिक्षित हैं।

इस सबके बीच सुरक्षा परिषद ने कहा है कि आर्मेनिया और अजरबैजान में शांति स्थापना में मिन्स्क समूह को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। इस समूह में फ्रÞांस, रूस और अमेरिका शामिल हैं। इस समूह का गठन 1992 में आर्गनाइजेशन फॉर सिक्योरिटी एंड कोआॅपरेशन इन यूरोप नामक संगठन ने आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच मध्यस्थता के उद्देश्य से किया था। मिन्स्क ग्रुप के साझा प्रयास अभी शुरू हुए नहीं हैं, लेकिन तुर्की को लेकर ये सभी देश अलग अलग कारणों से मुखर हो सकते हैं।

रूस इस इलाके में तुर्की की धार्मिक रणनीति से आशंकित है। जबकि फ्रांस भूमध्य सागर में तुर्की की हिमाकत से नाराज है। तुर्की और ग्रीस की खींचतान में फ्रांस तुर्की के सामने कड़ा विरोध जता चुका है। फ्रांस में बड़ी संख्या में आर्मेनियाई मूल के लोग रहते है, इसलिए वह आर्मेनिया के साथ खड़ा है। इस संबंध में वह तुर्की को चेतावनी भी दे चुका है। दूसरी ओर, अमेरिका और तुर्की के संबंध अच्छे रहे हैं लेकिन आर्दोआन की नीतियों से दोनों देशों के बीच अब संबंध सामान्य नहीं है।

तुर्की नाटो के भीतर अमेरिका की सीरिया और अन्य जगहों को लेकर नीतियों के खिलाफ रहा है। ट्रंप तुर्की के राष्ट्रपति की धर्मनिरपेक्ष विरोधी नीतियों को यूरोप के लिए खतरा मानते हैं। अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हमा अलीयेव ने कहा है कि इस लड़ाई को रोकने के लिए आर्मेनिया को नागोर्नो-काराबाख और उसके आसपास के इलाकों से अपनी सेना हटानी होगी। आर्मेनिया के पक्ष में कई बड़े देश हैं और इसकी संभावना बहुत कम है कि नागोर्नो-काराबाख को अजरबैजान को सौंप दिया जाए। इस विवादित क्षेत्र में आर्मेनियाई मूल के लोगों की आबादी ज्यादा है और वे नागोर्नो-काराबाख में अजरबैजान के निर्णायक प्रभाव को कभी स्वीकार नहीं कर सकते।

आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच कुछ समय के लिए संघर्षविराम तो हुआ है, लेकिन तुर्की पर बिना दबाव डाले यह युद्ध और संकट टलेगा, इसकी फिलहाल संभावना बहुत कम नजर आ रही है। बहरहाल, काकेशस क्षेत्र में अशांति बड़े टकराव की आशंका को बढ़ा रही है। नागोर्नो-काराबाख का यह संघर्ष विश्व शांति के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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