राजनीतिः दिव्यांगों को सहानुभूति नहीं, सहयोग चाहिए- People with disabilities need respect & work, not sympathy - Jansatta
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राजनीतिः दिव्यांगों को सहानुभूति नहीं, सहयोग चाहिए

दिव्यांगों के प्रति लोगों द्वारा व्यक्त सहानुभूति कई तरह की होती है। कुछ मामलों में सहानुभूतिवश दिव्यांगों के प्रयत्नों की अतिरंजित सराहना कर दी जाती है तो कुछ मामलों में उनकी क्षमताओं का बेहद कम आकलन कर सहानुभूति जताई जाने लगती है। ये दोनों तरीके दिव्यांग व्यक्तियों के मन-मस्तिष्क पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

Author December 1, 2017 3:14 AM
सरकार द्वारा दिव्यांगों को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए विभिन्न योजनाएं व कार्यक्रम चलाए तो जा रहे हैं, पर उनके क्रियान्वयन में अभी कई समस्याएं हैं, जिनसे पार पाने की जरूरत है।

पीय़ूष द्विवेदी

दिव्यांगजनों की हमारे समाज में क्या स्थिति है तथा उनके प्रति समाज की क्या मानसिकता है? दरअसल, न केवल भारत में बल्कि समूची दुनिया में एक समय तक दिव्यांगता को सिर्फ चिकित्सा संबंधी समस्या समझा जाता था, लेकिन समय के साथ सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंस आदि दिव्यांग व्यक्तियों द्वारा जिस तरह से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के नए सोपान गढ़े गए, उन्होंने समाज की मानसिकता को बदलने का काम किया। समाज ने समझा कि दिव्यांगता सिर्फ व्यक्ति की कुछ शक्तियों को सीमित कर सकती है, उसकी प्रगति की समस्त संभावनाओं को अवरुद्ध नहीं कर सकती। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि दिव्यांगजनों को उचित संबल, समान अवसर और समुचित सहयोग प्रदान किया जाए। कहने का अर्थ है कि दिव्यांग व्यक्तियों की सफलताओं ने समाज के दिमाग से दिव्यांगता को सिर्फ चिकित्सीय समस्या समझने की मानसिकता को खत्म कर दिव्यांगता के विकासात्मक मॉडल की दिशा में सोचने पर विवश कर दिया और इसी के परिणामस्वरूप अब दिव्यांगता के इस मॉडल का समूची दुनिया द्वारा अनुसरण किया जाने लगा है। दिव्यांगता के इस विकासात्मक मॉडल के फलस्वरूप ही दिव्यांग व्यक्तियों की बहुआयामी शिक्षा से लेकर सामाजिक भागीदारी आदि को सुनिश्चित करने के लिए दुनिया भर में विभिन्न प्रकार की नीतियां और कायदे-कानून बनाए गए हैं।

संयुक्त राष्ट्र की तरफ से 2007 में हुए दिव्यांगता अधिकार सम्मेलन में दिव्यांग व्यक्तियों को भिन्न क्षमताओं या भिन्न सामर्थ्य वाले व्यक्ति के रूप में परिभाषित करते हुए उनके हितों के संरक्षण के लिए विभिन्न नियम-कायदे निर्धारित किए गए। भारत की बात करें तो सन 2011 की जनगणना के अनुसार यहां दो करोड़ से अधिक दिव्यांग हैं। भारत संयुक्त राष्ट्र के उपर्युक्त दिव्यांगता अधिकार सम्मेलन में दिव्यांगों के अधिकारों की रक्षा आदि के संबंध में निर्धारित किए गए कानूनों का समर्थन करने वाले देशों में शामिल है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के दिव्यांगता अधिकार सम्मेलन में पारित नियम-कायदों के समर्थन से काफी पूर्व सन 1995 में ही भारत द्वारा दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा, अवसर की समानता और समाज में पूर्ण भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की पहल पर एक कानून (दिव्यांग व्यक्ति अधिनियम, 1995) बना दिया गया था।

इसके अतिरिक्त सन 2006 की दिव्यांग व्यक्तियों से संबंधित देश की राष्ट्रीय नीति में यह मत भी प्रकट किया गया कि दिव्यांग व्यक्ति भी देश के लिए अत्यंत मूल्यवान मानव संसाधन हैं। गौर करना होगा कि यह सिर्फ एक मत नहीं है, बल्कि दिव्यांग व्यक्तियों को वाकई में मूल्यवान मानव संसाधन बनाने के लिए उनके उद्यम कौशल को उन्नत करने के उद््देश्य से देश की पूर्व सरकारों द्वारा विभिन्न प्रकार की योजनाएं या कार्यक्रम चलाए गए हैं और वर्तमान सरकार द्वारा भी चलाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम स्किल इंडिया में भी दिव्यांगजनों की शेष क्षमताओं के अनुरूप कौशल विकास के संबंध में विभिन्न प्रावधान किए गए हैं।

पर विडंबनाहै कि दिव्यांगों को कौशलयुक्त कर रोजगार-योग्य बनाने के सरकार के इन तमाम प्रयासों के बावजूद देश की अधिकांश दिव्यांग आबादी आज भी रोजगारहीन होकर जीने को विवश है। एक आंकड़े पर गौर करें तो देश की कुल दिव्यांग आबादी में से लगभग 1.34 करोड़ लोग 15 से 59 वर्ष की आयु अर्थात उत्पादक आयु वर्ग के हैं, लेकिन इनमें से तकरीबन 99 लाख लोग अब भी बेरोजगार या सीमांत कार्मिक हैं। पहले से ही कई तरह की परेशानियां उठा रहे लोगों को आर्थिक असुरक्षा और मुश्किल में डाल देती है। इस स्थिति के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण तो यह है कि सरकार द्वारा संचालित उपर्युक्त समस्त योजनाओं-कार्यक्रमों की पहुंच शहरों तक है, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार यदि आकलन करें तो देश की अधिकांश दिव्यांग आबादी के गांवों में होने की संभावना है। एक अन्य समस्या सरकार द्वारा चलाए जा रहे कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम में गुणवत्ता के अभाव की है। साथ ही, बहुत सारी जगह तो ये प्रशिक्षण सिर्फ कागजों पर होकर रह जाते हैं। कहीं अधकचरा प्रशिक्षण दिया जाता है, तो कहीं बस औपचारिकता पूरी की जाती है।

कहने का अर्थ है कि सरकार द्वारा दिव्यांगों को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए विभिन्न योजनाएं व कार्यक्रम चलाए तो जा रहे हैं, पर उनके क्रियान्वयन में अभी कई समस्याएं हैं, जिनसे पार पाने की जरूरत है। संतोषजनक बात यह है कि सरकार की नई कौशल विकास एवं उद्यमिता नीति में इन समस्याओं को समझते हुए इनके समाधान के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं।

वैसे, दिव्यांगों के प्रति समस्त दायित्व केवल सरकार के नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज को भी उनके प्रति अपनी मानसिकता को तनिक और संवेदनशील, सहयोगी और सजग करने की आवश्यकता है। यह सही है कि समाज में अधिकतर लोग दिव्यांगों के प्रति सहयोगी भावना रखते हैं, पर तमाम लोग इन सहयोगों में न केवल दया का भाव मिला देते हैं, बल्कि उसका प्रदर्शन भी कर देते हैं, जिससे दिव्यांगों के मन में हीन ग्रंथि पैदा होती है। इसके फलस्वरूप वे सहजता से सबके साथ घुलने-मिलने के बजाय स्व-केंद्रित होने लगते हैं।
दरअसल, सहानुभूति की भावना को समाज में एक अच्छी भावना के रूप में स्थान मिला हुआ है और कुछ स्थितियों में यह अच्छी होती भी है, पर जब किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति, जो आत्मविश्वास अर्जित करने का प्रयत्न कर रहा हो, इस तरह की भावना दिखाई जाती है तो यह उसके प्रयत्नों को क्षति पहुंचाने का ही कार्य करती है। दिव्यांगों के संदर्भ में सहानुभूति के भाव का यही प्रभाव होता है।

दिव्यांगों के प्रति लोगों द्वारा व्यक्त सहानुभूति कई तरह की होती है। कुछ मामलों में सहानुभूतिवश दिव्यांगों के प्रयत्नों की अतिरंजित सराहना कर दी जाती है तो कुछ मामलों में उनकी क्षमताओं का बेहद कम आकलन कर सहानुभूति जताई जाने लगती है। ये दोनों तरीके दिव्यांग व्यक्तियों के मन-मस्तिष्क पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
इस बात को उदाहरण से समझें तो मान लीजिए कि कोई दिव्यांग बच्चा किसी सरकारी नौकरी के लिए सामान्य लोगों की तरह ही जी-तोड़ परिश्रम कर रहा है, तभी कोई व्यक्ति उसके परिश्रम की बढ़ा-चढ़ा कर सराहना भी करे और साथ में यह भी जोड़ दे कि उसे तो नौकरी मिल ही जाएगी, क्योंकि सरकार ने दिव्यांगों को कई तरह की रियायतें दे रखी हैं। यह बात कही तो सहानुभूतिवश ही जाएगी, मगर इसका प्रभाव यह होगा कि उस बच्चे को अपना सारा परिश्रम व्यर्थ लगने लगेगा और उसके अंदर यह भावना घर करने लगेगी कि वह समाज के अन्य लोगों से कटा हुआ है। अत: आदर्श स्थिति यह है कि सहानुभूतिवश न तो दिव्यांगों के सामान्य प्रयत्नों की बढ़ा-चढ़ा कर सराहना ही की जाए और न ही उनकी क्षमताओं को जाने-समझे बिना उनकी स्थिति पर चिंता ही प्रकट की जाए। सहानुभूति की समस्या से इतर, बहुत-से असंवेदनशील लोग तो अब भी दिव्यांगों का मजाक बनाने और उन्हें हतोत्साहित करने से नहीं चूकते। यों तो ये भिन्न-भिन्न मानसिकताएं हैं, पर इनमें एक बात समान है, ये दिव्यांगों को आत्मविश्वास अर्जित करने और समाज में सहजता से घुलने-मिलने में बाधक बनती हैं।
हमें समझना होगा कि दिव्यांगजनों की कुछ क्षमताएं सीमित भले हों, पर अगर उन्हें समाज और सरकार दोनों से संबल और सहयोग मिले तो वे न केवल जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित कर सकते हैं बल्कि अपने देश और समाज की प्रगति में सक्रिय भागीदार भी बन सकते हैं।

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