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राजनीति: शहरी नियोजन और वैकल्पिक ऊर्जा

शहरों को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने के लिए शहरी गैस वितरण तंत्र के समांतर अन्य योजनाओं में व्यापक पैमाने पर निवेश करना होगा। सरकार ने प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में आधारभूत संरचना विकसित करने के लिए नीतिगत स्तर पर कई अहम निर्णय किए हैं।

Gass pipe lineसांकेतिक फोटो।

अरविंद मिश्रा

झारखंड के कोडरमा शहर के लोगों को जल्द ही रसोई गैस के लिए न तो सिलेंडर की बुकिंग करानी पड़ेगी और न ही उसका इंतजार करना पड़ेगा। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड की मंजूरी के बाद वहां शहरी गैस वितरण प्रणाली (सीजीडी) के जरिए गैस पाइप लाइन बिछाने का काम रफ्तार पकड़ रहा है।

कोडरमा की तरह ही देश के चार सौ से अधिक गैर-महानगरीय और छोटे शहरों में सीएनजी गैस पाइपलाइन बिछाने का काम प्रगति पर है। किसी भी शहर के विकास को टिकाऊ बनाने के लिए ऊर्जा की उपलब्धता सबसे प्रमुख कारक होती है।

ऊर्जा ही वह संसाधन है, जिस पर लगभग हर छोटी-बड़ी मानवीय गतिविधियां टिकी होती हैं। शहरी नियोजन के नजरिए से देखें तो पिछले दो दशक में भारत में शहरीकरण जिस रफ्तार से बढ़ा है, वह अभूतपूर्व है।

विश्व आर्थिक मंच की ताजा रिपोर्ट ने पुन: इस बात को दोहराया है कि कई वर्षों तक भारत के विकास की धुरी शहर बने रहेंगे। संयुक्त राष्ट्र की वह रिपोर्ट इसी बात की पुष्टि करती है, जिसमें कहा गया है कि 2050 तक भारत की आधी आबादी शहर केंद्रित हो जाएगी।

यही कारण है कि शहरी नियोजन वर्तमान में केंद्र सरकार की प्राथमिकता बन गया है। इसे इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि 2004 से 2014 के बीच 1.57 लाख करोड़ रुपए शहरी नियोजन पर खर्च किए गए। जबकि पिछले छह साल में ही 10.57 लाख करोड़ रुपए का भारी भरकम बजट शहरों को व्यवस्थित करने पर खर्च किया जा चुका है। शहरीकरण के विस्तार के साथ ऊर्जा की मांग बढ़ेगी। हम पहले ही विश्व में ऊर्जा के चौथे बड़े उपभोक्ता हैं।

ऐसे में नीति नियोजकों को ऊर्जा की आपूर्ति के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की दोहरी जिम्मेदारी को साधना होगा। शहरी नियोजन से जुड़ा यह दायित्वबोध यूरोप में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुए गार्डन सिटी मूवमेंट की याद दिलाता है।

शहरी नियोजन का यह एक ऐसा अभियान था, जिसके अंतर्गत यूरोप और अमेरिका में पर्यावरण अनुकूल और ऊर्जा की आत्मनिर्भरता से युक्त शहर बसाए गए। संयोग से इसी ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भारत गैस आधारित अर्थव्यवस्था के जरिए धीरे-धीरे ही सही, कदम बढ़ा रहा है। देश में सीएनजी नेटवर्क का तेजी से विस्तार हो रहा है।

राज्यों की राजधानी से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित शहरों में भी शहरी गैस वितरण प्रणाली का प्रस्तावित विस्तार वहां के ऊर्जा अर्थशास्त्र के साथ सामाजिक जीवन को भी स्पंदित कर रहा है। इन प्रयासों से देश के बड़े महानगरों और राज्यों की राजधानी से बाहर सीजीडी का नेवटर्क विकसित होगा, लेकिन इसके लिए हमारे छोटे शहर और वहां के स्थानीय निकाय कितने तैयार हैं, इसकी समीक्षा करनी होगी।

शहरी नियोजन के जानकारों की मानें तो ऊर्जा आत्मनिर्भरता के प्रयास शहरों की मौजूदा बुनियादी अवसंरचना को व्यवस्थित किए बिना संभव नहीं हैं। आज शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां अवैध कॉलोनियां और अतिक्रमण की गंभीर चुनौती मौजूद न हो।

देश में चंड़ीगढ़, बंगलुरू, गांधीनगर, पंचकूला, जमशेदपुर, गौतम बुद्ध नगर और नवी मुंबई जैसे शहरों में ऊर्जा की उपलब्धता और उसमें अक्षय ऊर्जा की भागीदारी एक अनुकरणीय पहल है। इन शहरों में किसी भी कम जनसंख्या घनत्व वाले शहर के मुकाबले अधिक हरित क्षेत्र मौजूद है।
शहरों को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने के लिए शहरी गैस वितरण तंत्र के समांतर अन्य योजनाओं में व्यापक पैमाने पर निवेश करना होगा। इससे शहरों में रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में आधारभूत संरचना विकसित करने के लिए नीतिगत स्तर पर कई अहम निर्णय किए हैं।

दरअसल, केंद्र सरकार ने 2030 तक अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी 6.2 प्रतिशत से बढ़ा कर पंद्रह प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने में अगले गैस के बुनियादी ढांचा क्षेत्र में छियासठ अरब डॉलर का निवेश प्रस्तावित है। 2016 में प्रारंभ हुई ऊर्जा गंगा जैसी परियोजनाएं इस लक्ष्य को हासिल करने में सहायक सिद्ध होंगी।

हाल ही में बंगाल के उत्तर चौबीस परगना जिले में स्थापित बंगाल का पहला तेल एवं गैस रिजर्व राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया है। अशोक नगर तेल एवं गैस रिजर्व से उत्पादन शुरू होने के साथ ही बंगाल भी उन राज्यों में शामिल हो गया है, जहां से तेल निकाला जाता है।

शहरी गैस वितरण प्रणाली के अतिरिक्त शहरों को ऊर्जा नियोजन हेतु ठोस अपशिष्ट से बायोमास बनाने की योजना को लोकप्रिय बनाना होगा। महाराष्ट्र और गुजरात में कई सहकारी समितियों ने ग्रामीण और शहरी इलाकों में ठोस अपशिष्ट से बायोगैस प्लांट सफलतापूर्वक स्थापित कर ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया है।

शहरों को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का विचार नया नहीं है। दुनिया के कई देश इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। ब्रिटेन और जर्मनी जैसी महाशक्तियां ही नहीं, तेल से संपन्न सऊदी अरब जैसे देश भी इस दिशा में प्रभावी कदम बढ़ा चुके हैं।

सऊदी अरब में तो बकायदा नियोम नामक एक ऐसा शहर बसने जा रहा है, जो हाइड्रोजन इकोनॉमी और अक्षय ऊर्जा संसाधनों से पूरी तरह आत्मनिर्भर होगा। हाइड्रोजन और आॅक्सीजन के अणुओं को अलग कर तैयार होने वाला कार्बन मुक्त र्इंधन हमारे शहरों में एक नई परिवहन क्रांति ला सकता है।

केंद्र सरकार इसी क्रम में देश भर में ग्रीन सिटी की अवधारणा को भी प्रोत्साहित कर रही है। ये ऐसे शहर होंगे, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरी तरह अक्षय ऊर्जा संसाधनों से पूर्ण करेंगे। ग्रीन सिटी में घरों में सौर ऊर्जा के अनुप्रयोग बढ़ाने के लिए उन्हें विभिन्न प्रकार की सब्सिडी देने की कार्ययोजना को नया रूप दिया जा रहा है।

इस तरह शहर के बाहर सोलर पार्क स्थापित किए जाएंगे। नवीनीकृत ऊर्जा मंत्रालय की योजना के अनुसार फिलहाल हर राज्य में एक ग्रीन सिटी स्थापित करने की तैयारी है। हमारे नीति निर्धारकों को शहरी और ग्रामीण भारत के बुनियादी ढांचे को गढ़ते समय उसे ऐसा स्वरूप देना होगा, जिससे वे एक-दूसरे के पूरक बनें।

केंद्र सरकार ने हाल ही में एथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए इस दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके लिए एथेनॉल उत्पादन इकाइयों को 4,573 करोड़ रुपए की ब्याज सब्सिडी देने की योजना है। इससे एथेनॉल उत्पादन में लगे छोटे और मझोले उद्योगों को तो राहत मिलेगी ही, गन्ना किसानों को भी अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

एथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जिसे पेट्रोल में मिलाकर गाड़ियों में ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है। वैसे तो एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने की फसल से होता है, लेकिन शर्करा वाली कई अन्य फसलों से भी इसे तैयार किया जा सकता है।

जाहिर है, ऐसी योजनाओं से शहर और ग्रामीण भारत के बीच ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर तैयार करने के प्रयास भी मजबूत होंगे। विकास की कोई भी योजना आर्थिक संसाधनों के बिना सफल नहीं हो सकती है। मिश्रित अर्थव्यवस्था के रूप में हमने सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी से बड़े-बड़े लक्ष्य हासिल किए हैं।

हाल ही में देश के नौ बड़े नगर निगमों ने म्यूनिसिपल बांड जारी करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इससे छोटे शहर ऊर्जा समेत अपनी दूसरी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आर्थिक संसाधन जुटा सकेंगे। अगर हम शहरों का नियोजन करते समय ऊर्जा के विविध रूपों की स्थानीय स्तर पर उत्पादकता के साथ उपलब्धता के प्रयासों को प्राथमिकता देंगे, तो इसका लाभ शहर ही नहीं, हमारी भावी पीढ़ियों के साथ पर्यावरण को भी मिलेगा।

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