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राजनीति: शांति की कठिन डगर

अफगान महिलाओं की तालिबान से मांग है कि दूसरे मुसलिम बहुल देशों की तर्ज पर वह भी अफगान महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करे। खुद तालिबान के भीतर मौजूद युवा कमांडरों और वरिष्ठ कमांडरों की सोच में फर्क महसूस किया जा रहा है। युवा तालिबान कमांडरों का महिलाओं के प्रति नजरिया उतना रूढ़िवादी नहीं है। लेकिन तालिबान के वरिष्ठ कमांडरों की सोच आज भी वही है जो 1990 के दशक में थी।

कतर की राजधानी दोहा में अफगान सरकार और तालिबान विद्रोहियों के बीच बातचीत के दौरान हाथ मिलाते प्रतिनिधि। (रॉयटर्स फोटो: इब्राहिम अल ओमारी)

अफगान तालिबान और अफगान सरकार के प्रतिनिधियों के बीच कतर की राजधानी दोहा में बातचीत का दौर चल पड़ा है। हालांकि उम्मीदों के मुताबिकों बातचीत की गति धीमी है, इसलिए नतीजे आने में समय लगेगा। अच्छे परिणाम को लेकर संदेह भी व्यक्त किए जा रहे हैं। अमेरिका के अफगानिस्तान मामलों के विशेष प्रतिनिधि जलमई खलीलजाद ने अमेरिकी सदन की राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित उपसमिति को बताया है कि अगर अफगानिस्तान में शांति वार्ता विफल होती है तो अफगानिस्तान को भारी नुकसान होगा। खलीलजाद का कहना है कि अमेरिका अफगानिस्तान के हितों की रक्षा आगे भी करता रहेगा।

अमेरिका अफगानिस्तान में मौजूद सैनिकों की संख्या घटा कर चार से पांच हजार के बीच करेगा। लेकिन इसके बाद संख्या कम की जाए या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि तालिबान अमेरिका को किए गए वादों को कितना पूरा करता है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता के दौरान तालिबान ने अमेरिका से जो वादे किए हैं, उन्हें तालिबान पूरा करेगा, इस पर खुद खलीलजाद को भी शक है। यही वह कारण है जिसे लेकर शांति वार्ता के नतीजों को लेकर संदेह कायम है।

अफगान सरकार के प्रतिनिधियों और तालिबान के बीच चल रही शांति वार्ता में कई अहम मसलों को लेकर टकराव की आशंका है। इसमें एक अहम मसला है अफगान महिलाओं को मिले अधिकारों को जारी रखना। हकीकत तो यह है कि तालिबान अफगान महिलाओं को मिले अधिकारों को खत्म करने की कोशिश करेगा। 1996 से 2001 के बीच काबुल में तालिबान शासन के दौरान महिलाओं के अधिकार खत्म कर दिए गए थे। अफगान महिलाएं सार्वजनिक स्थलों पर पुरुष सदस्यों के बिना नहीं जा सकती थीं, लड़कियों को स्कूली शिक्षा से वंचित कर दिया गया था और महिलाओं की नौकरियों पर पाबंदी लगा दी गई थी।

वे सार्वजनिक जगहों पर भाषण नहीं दे सकती थीं और राजनीति नहीं कर सकती थी। महिलाओं को एक तरह से घर में कैद कर दिया गया था। तालिबान शासन के अंत के बाद अफगान महिलाओं को कई अधिकार मिले। आज अफगान संसद के दोनों सदनों में महिलाओं की भागीदारी है। संसद के निचले सदन में सत्ताईस प्रतिशत महिला सदस्य हैं। उच्च सदन में भी महिलाओं की भागीदारी तय है। सुप्रीम कोर्ट जज और काबीना मंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पदों तक महिलाओं की पहुंच का रास्ता साफ हुआ है।

इस वक्त अफगानिस्तान की न्यायिक सेवा में लगभग तीन सौ महिला जज हैं। हालांकि हामिद करजई और अशरफ गनी के शासनकाल में महिलाओं की समस्याएं पूरी तरह से खत्म नहीं हुईं। स्कूल जाने का अधिकार मिलने के बाद भी अस्सी प्रतिशत अफगान महिलाएं अशिक्षित हैं। लगभग साठ प्रतिशत अफगान ल़ड़कियां स्कूल नहीं जा पा रही हैं, क्योंकि देश के पचास प्रतिशत इलाके को आज भी तालिबान नियंत्रित कर रहा है।

अस्सी प्रतिशत महिलाओं को जबरन विवाह का सामना करना पड़ता है। नब्बे प्रतिशत अफगान महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं। इसके बावजूद मौजूदा अफगान शासन ने कानूनी तौर पर ने महिलाओं को अधिकार देने का साहस दिखाया। लेकिन अब अफगान महिलाओं को डर है कि अगर तालिबान भविष्य में सत्ता में भागीदारी करता है तो उन्हें मिले कानूनी और संवैधानिक अधिकार कहीं खत्म न कर दे। यही कारण है कि अफगानिस्तान के कुछ महिला संगठनों ने तालिबान से मांग की है कि तालिबान महिलाओं को मिले अधिकारों को बहाल रखने का वादा करे।

तालिबान बदलती हुई इस्लामिक दुनिया को किस अंदाज में देख रहा है, यह शांति वार्ता में साफ हो जाएगा। लंबे समय से तालिबान पर पाकिस्तान का हाथ है, और दिलचस्प यह कि उसी पाकिस्तान में महिलाओं को तमाम अधिकार हासिल हैं। पाकिस्तान में महिलाएं राजनीति करती हैं, सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री पद तक पहुंची हैं। सऊदी अरब भी महिलाओं के अधिकारों को लेकर अब उदार हो रहा है। सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नजरिए को तालिबान देख रहा है। कई अन्य मुसलिम बहुल देश में महिलाओं को तमाम राजनीतिक और आर्थिक आजादी मिली हुई है।

अफगान महिलाओं की तालिबान से मांग है कि दूसरे मुसलिम बहुल देशों की तर्ज पर वह भी अफगान महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करे। खुद तालिबान के भीतर मौजूद युवा कमांडरों और वरिष्ठ कमांडरों की सोच में फर्क महसूस किया जा रहा है। युवा तालिबान कमांडरों का महिलाओं के प्रति नजरिया उतना रूढ़िवादी नहीं है। लेकिन तालिबान के वरिष्ठ कमांडरों की सोच आज भी वही है जो 1990 के दशक में थी।

अफगान सरकार के प्रतिनिधि और अफगान तालिबान के बीच शांति वार्ता में कुछ और मुद्दों पर गतिरोध पैदा होने का खतरा है। इसमें एक अफगान नेशनल आर्मी है। तालिबान अफगान नेशनल आर्मी से भारी नफरत करता है और इसे भंग करना चाहता है। जबकि अफगानिस्तान ने काफी मशक्कत और अमेरिकी मदद से सेना खड़ी की है। अफगान नेशनल आर्मी से तालिबान की नफरत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता होने के बाद अफगान तालिबान के हमले में अफगान फौज के पैंतीस सौ से ज्यादा सैनिक मारे गए हैं।

दरअसल, अफगान नेशनल आर्मी की जातीय संरचना तालिबान को परेशान करती है। अफगान नेशनल आर्मी में तालिबान विरोधी ताजिक, उजबेक और हजारा जातियां खासी मजबूत हैं। अफगान नेशनल आर्मी में चालीस से पैंतालीस प्रतिशत पश्तून हैं। वहीं तीस से पैंतीस प्रतिशत ताजिक और दस से बारह प्रतिशत हजारा हैं। आठ से दस प्रतिशत उजबेक जाति के लोग भी अफगान नेशनल आर्मी में हैं।

अफगानिस्तान की दो प्रमुख जनजातियां ताजिक और उजबेक को अभी भी शांति वार्ता पर संदेह है। एक तर्क यह दिया जा रहा है कि अमेरिकी दबाव में शांति वार्ता को सफल बनाने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि तालिबान के मूल चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया है। दोहा में शांति वार्ता शुरू होने से पहले अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह पर तालिबान ने जानलेवा हमला किया था, जिसमें वे बाल-बाल बच गए। सालेह ताजिक जनजाति के हैं और कट्टर पाकिस्तान विरोधी हैं और तालिबान को बिल्कुल पसंद नहीं करते है। इस हमले से यह साफ हो गया कि अफगानिस्तान के अंदर जातीय टकराव आसानी से खत्म नहीं होने वाला है।

अफगानिस्तान में पाकिस्तान और ईरान जैसी क्षेत्रीय शक्तियां अपने हिसाब से इस शांति वार्ता पर नजर रखे हुए हैं। चीन और रूस जैसी दो बड़ी शक्तियां भी अफगानिस्तान को लेकर अपने हिसाब से रणनीति बना रही हैं। पाकिस्तान किसी भी कीमत पर तालिबान को अफगान शासन प्रणाली में मजबूत करना चाहता है। अमेरिका तालिबान पर पाकिस्तानी के गहरे को समझता है। यही कारण है कि अमेरिका अफगानिस्तान शांति वार्ता में पाकिस्तान का उपयोग कर रहा है।

जलमई खलीलजाद लगातार पाकिस्तान के संपर्क में हैं। शांति वार्ता में पाकिस्तानी सेना की भूमिका अहम बनी हुई है, क्योंकि ज्यादातर अफगान तालिबानी कमांडर पाकिस्तान के देबवंदी मदरसा जामिया हक्कानिया से निकले हैं। देवबंदी मदरसों पर पाकिस्तानी सेना का खासा प्रभाव है। उधर, अफगान शांति वार्ता में चीन भी सक्रिय है। चीन की सक्रियता पाकिस्तान के माध्यम से है। चीन और तालिबान के संबंध 1990 के दशक से हैं और इन्हें बनाने में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है।

इसीलिए तालिबान ने अफगानिस्तान में चीन के आर्थिक हितों पर कभी हमला नहीं किया। ईरान और रूस भी इस शांति वार्ता पर नजर रखे हुए हैं। शांति वार्ता में शामिल कई तालिबानी कमांडरों के ईरान और रूस से अच्छे रिश्ते हैं। अफगानिस्तान में रूस के अपने हित हैं और अफगानिस्तान के पड़ोसी मुल्कों ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान में रूस का गहरा दखल है। ऐसे में रूस कभी नहीं चाहेगा कि उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़े।

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